मैं ने सारी उम्र किसी मंदिर में क़दम नहीं रक्खा लेकिन जब से तेरी दुआ में मेरा नाम शरीक हुआ है तेरे होंटों की जुम्बिश पर मेरे अंदर की दासी के उजले तन में घंटियाँ बजती रहती हैं!
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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अंदेशों के दरवाज़ों पर कोई निशान लगाता है और रातों रात तमाम घरों पर वही सियाही फिर जाती है दुख का शब ख़ूँ रोज़ अधूरा रह जाता है और शनाख़्त का लम्हा बीतता जाता है मैं और मेरा शहर-ए-मोहब्बत तारीकी की चादर ओढ़े रौशनी की आहट पर कान लगाए कब से बैठे हैं घोड़ों की टापों को सुनते रहते हैं हद-ए-समाअत से आगे जाने वाली आवाज़ों के रेशम से अपनी रू-ए-सियाह पे तारे काढ़ते रहते हैं अँगुश्ता ने इक इक कर के छलनी होने को आए अब बारी अंगुश्त-ए-शहादत की आने वाली है सुब्ह से पहले वो कटने से बच जाए तो!
Parveen Shakir
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वो एक लड़की कि जिस से शायद मैं एक पल भी नहीं मिली हूँ मैं उस के चेहरे को जानती हूँ कि उस का चेहरा तुम्हारी नज़्मों तुम्हारी गीतों की चिलमनों से उभर रहा है यक़ीन जानो मुझे ये चेहरा तुम्हारे अपने वजूद से भी अज़ीज़-तर है कि उस की आँखों में चाहतों के वही समुंदर छुपे हैं जो मेरी अपनी आँखों में मौजज़न हैं वो तुम को इक देवता बना कर मिरी तरह पूजती रही है उस एक लड़की का जिस्म ख़ुद मेरा ही बदन है वो एक लड़की जो मेरे अपने गए जनम की मधुर सदा है
Parveen Shakir
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पैरों की मेहँदी मैं ने किस मुश्किल से छुड़ाई थी और फिर बैरन ख़ुश्बू की कैसी-कैसी विनती की थी प्यारी धीरे-धीरे बोल सावन, भरा घर जाग उठेगा लेकिन जब उस के आने की घड़ी हुई सुब्ह से ऐसी झड़ी लगी उम्र में पहली बार मुझे बारिश अच्छी नहीं लगी बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की उसे बुला जिस की चाहत में तेरा तन-मन भीगा है प्यार की बारिश से बढ़कर क्या बारिश होगी और जब उस बारिश के बा'द हिज्र की पहली धूप खुलेगी तुझ पर रंग के इस्म खुलेंगे
Parveen Shakir
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सात सुहागनें और मेरी पेशानी! संदल की तहरीर भला पत्थर के लिखे को क्या धोएगी बस इतना है जज़्बे की पूरी नेकी से सब ने अपने अपने ख़ुदा का इस्म मुझे दे डाला है और ये सुनने में आया है शाम ढले जंगल के सफ़र में इस्म बहुत काम आते हैं!
Parveen Shakir
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दिल-आज़ारी भी इक फ़न है और कुछ लोग तो सारी ज़िंदगी इसी की रोटी खाते हैं चाहे उन का बुर्ज कोई हो अक़रब ही लगते हैं तीसरे दर्जे के पीले अख़बारों पर ये अपनी यर्क़ानी सोचों से और भी ज़र्दी मलते रहते हैं माला बारी केबिन हों या पाँच सितारा होटल कहीं भी क़य करने से बाज़ नहीं आते ऊपर से इस अमल को फ़िक़रे-बाज़ी कहते हैं जिस का पहला निशाना उमूमन बिल को अदा करने वाला साथी होता है! अपने अपने कुँवें को बहर-ए-आज़म कहने और समझने वाले ये नन्हे मेंडक हर हाथी को देख के फूलने लगे हैं और जब फटने वाले हों तो हाथी की आँखों पर फबती कसने लगे हैं कव्वे भी अंडे खाने के शौक़ को अपने फ़ाख़्ता के घर जा कर पूरा करते हैं लेकिन ये वो साँप हैं जो कि अपने बच्चे ख़ुद ही चट कर जाते हैं कभी कभी मैं सोचती हूँ कि साँपों की ये ख़सलत मालिक-ए-जिंन-ओ-इन्स की, इंसानों के हक़ में कैसी बे-पायाँ रहमत है!
Parveen Shakir
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