nazmKuch Alfaaz

पैरों की मेहँदी मैं ने किस मुश्किल से छुड़ाई थी और फिर बैरन ख़ुश्बू की कैसी-कैसी विनती की थी प्यारी धीरे-धीरे बोल सावन, भरा घर जाग उठेगा लेकिन जब उस के आने की घड़ी हुई सुब्ह से ऐसी झड़ी लगी उम्र में पहली बार मुझे बारिश अच्छी नहीं लगी बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की उसे बुला जिस की चाहत में तेरा तन-मन भीगा है प्यार की बारिश से बढ़कर क्या बारिश होगी और जब उस बारिश के बा'द हिज्र की पहली धूप खुलेगी तुझ पर रंग के इस्म खुलेंगे

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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मैं क्यूँँ उस को फ़ोन करूँँ! उस के भी तो इल्म में होगा कल शब मौसम की पहली बारिश थी!

Parveen Shakir

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मुसाहिब-ए-शाह से कहो कि फ़क़ीह-ए-आज़म भी आज तस्दीक़ कर गए हैं कि फ़स्ल फिर से गुनाहगारों की पक गई है हुज़ूर की जुम्बिश-ए-नज़र के तमाम जल्लाद मुंतज़िर हैं कि कौन सी हद जनाब जारी करें तो तामील-ए-बंदगी हो कहाँ पे सर और कहाँ पे दस्तार उतारना अहसन-उल-अमल है कहाँ पे हाथों कहाँ ज़बानों को क़त्अ कीजिए कहाँ पे दरवाज़ा रिज़्क़ का बंद करना होगा कहाँ पे आसाइशों की भूखों को मार दीजे कहाँ बटेगी लुआन की छूट और कहाँ पर रज्म के अहकाम जारी होंगे कहाँ पे नौ साला बच्चियां चहल साला मर्दों के साथ संगीन में पिरोने का हुक्म होगा कहाँ पे इक़बाली मुलज़िमों को किसी तरह शक का फ़ाएदा हो कहाँ पे मासूम दार पर खींचना पड़ेगा हुज़ूर अहकाम जो भी जारी करेंगे फ़क़त इल्तिजा ये होगी कि अपने इरशाद-ए-आलिया को ज़बानी रखें वगरना कानूनी उलझनें हैं!

Parveen Shakir

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अंदेशों के दरवाज़ों पर कोई निशान लगाता है और रातों रात तमाम घरों पर वही सियाही फिर जाती है दुख का शब ख़ूँ रोज़ अधूरा रह जाता है और शनाख़्त का लम्हा बीतता जाता है मैं और मेरा शहर-ए-मोहब्बत तारीकी की चादर ओढ़े रौशनी की आहट पर कान लगाए कब से बैठे हैं घोड़ों की टापों को सुनते रहते हैं हद-ए-समाअत से आगे जाने वाली आवाज़ों के रेशम से अपनी रू-ए-सियाह पे तारे काढ़ते रहते हैं अँगुश्ता ने इक इक कर के छलनी होने को आए अब बारी अंगुश्त-ए-शहादत की आने वाली है सुब्ह से पहले वो कटने से बच जाए तो!

Parveen Shakir

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सो अब ये शर्त-ए-हयात ठहरी कि शहर के सब नजीब अफ़राद अपने अपने लहू की हुरमत से मुन्हरिफ़ हो के जीना सीखें वो सब अक़ीदे कि इन घरानों में उन की आँखों के रंगतों की तरह तसलसुल से चल रहे थे सुना है बातिल क़रार पाए वो सब वफ़ादारियाँ कि जिन पर लहू के वा'दे हलफ़ हुए थे वो आज से मस्लहत की घड़ियाँ शुमार होंगी बदन की वाबस्तगी का क्या ज़िक्र रूह के अहद-ना में तक फ़स्ख़ माने जाएँ ख़मोशी-ओ-मस्लहत-पसंदी में ख़ैरियत है मगर मिरे शहर-ए-मुन्हरिफ़ में अभी कुछ ऐसे ग़य्यूर-ओ-सादिक़ ब-क़ैद-ए-जाँ हैं कि हर्फ़-ए-इंकार जिन की क़िस्मत नहीं बना है सो हाकिम-ए-शहर जब भी अपने ग़ुलाम-ज़ादे उन्हें गिरफ़्तार करने भेजे तो साथ में एक एक का शजरा-ए-नस्ब भी रवाना करना और उन के हमराह सर्द पत्थर में चुनने देना कि आज से जब हज़ार-हा साल बा'द हम भी किसी ज़माने के टेक्सलाया हड़प्पा बन कर तलाशे जाएँ तो उस ज़माने के लोग हम को कहीं बहुत कम-नसब न जानें

Parveen Shakir

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रुत बदली तो भंवरो ने तितली से कहा आज से तुम आज़ाद हो परवाजों की सारी सम्तें तुम्हारे नाम हुईं जाओ जंगल की मग़रूर हवा के साथ उड़ो बादल के हमराह सितारे छू आओ ख़ुशबू के बाज़ू थामो और रक़्स करो रक़्स करो कि इस मौसम के सूरज की किरनों का ताज तुम्हारे सर है लहराओ कि इन रातों का चाँद तुम्हारी पेशानी पर अपने हाथ से दुआ लिखेगा गाओ इन लम्हों की हवाएँ तुम को तुम्हारे गीतों पर संगीत देंगी पत्ते कड़े बजाएँगे और फूलों के हाथों में दफ़ होगा तितली मा'सूमाना हैरत से सरशार सियह शाख़ों के हल्क़े से निकली सदियों के जकड़े हुए रेशमी पर फैलाए और उड़ने लगी खुली फ़ज़ा का ज़ाइक़ा चक्खा नर्म हवा का गीत सुना अन-देखे कोहसारों की क़ामत नापी रौशनियों का लम्स पिया ख़ुशबू के हर रंग को छू कर देखा लेकिन रंग हवा और ख़ुशबू का विज्दान अधूरा था कि रक़्स का मौसम ठहर गया रुत बदली और सूरज की किरनों का ताज पिघलने लगा चाँद के हाथ दुआ के हर्फ़ ही भूल गए हवा के लब बर्फ़ीले सुमों में नीले पड़ कर अपनी सदाएँ खो बैठे पत्तों की बाँहों के सर बे-रंग हुए और तन्हा रह गए फूलों के हाथ बर्फ़ की लहर के हाथों तितली को लौट आने का पैग़ाम गया भौंरे शबनम की ज़ंजीरें ले कर दौड़े और बेचैन परों में अन-चखी परवाजों की आशुफ़्ता प्यास जला दी अपने काले नाख़ूनों से तितली के पर नोच के बोले अहमक़ लड़की घर वापस आ जाओ नाटक ख़त्म हुआ ख़्वातीन का आलमी साल

Parveen Shakir

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