nazmKuch Alfaaz

सो अब ये शर्त-ए-हयात ठहरी कि शहर के सब नजीब अफ़राद अपने अपने लहू की हुरमत से मुन्हरिफ़ हो के जीना सीखें वो सब अक़ीदे कि इन घरानों में उन की आँखों के रंगतों की तरह तसलसुल से चल रहे थे सुना है बातिल क़रार पाए वो सब वफ़ादारियाँ कि जिन पर लहू के वा'दे हलफ़ हुए थे वो आज से मस्लहत की घड़ियाँ शुमार होंगी बदन की वाबस्तगी का क्या ज़िक्र रूह के अहद-ना में तक फ़स्ख़ माने जाएँ ख़मोशी-ओ-मस्लहत-पसंदी में ख़ैरियत है मगर मिरे शहर-ए-मुन्हरिफ़ में अभी कुछ ऐसे ग़य्यूर-ओ-सादिक़ ब-क़ैद-ए-जाँ हैं कि हर्फ़-ए-इंकार जिन की क़िस्मत नहीं बना है सो हाकिम-ए-शहर जब भी अपने ग़ुलाम-ज़ादे उन्हें गिरफ़्तार करने भेजे तो साथ में एक एक का शजरा-ए-नस्ब भी रवाना करना और उन के हमराह सर्द पत्थर में चुनने देना कि आज से जब हज़ार-हा साल बा'द हम भी किसी ज़माने के टेक्सलाया हड़प्पा बन कर तलाशे जाएँ तो उस ज़माने के लोग हम को कहीं बहुत कम-नसब न जानें

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता

Shariq Kaifi

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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पैरों की मेहँदी मैं ने किस मुश्किल से छुड़ाई थी और फिर बैरन ख़ुश्बू की कैसी-कैसी विनती की थी प्यारी धीरे-धीरे बोल सावन, भरा घर जाग उठेगा लेकिन जब उस के आने की घड़ी हुई सुब्ह से ऐसी झड़ी लगी उम्र में पहली बार मुझे बारिश अच्छी नहीं लगी बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की उसे बुला जिस की चाहत में तेरा तन-मन भीगा है प्यार की बारिश से बढ़कर क्या बारिश होगी और जब उस बारिश के बा'द हिज्र की पहली धूप खुलेगी तुझ पर रंग के इस्म खुलेंगे

Parveen Shakir

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अंदेशों के दरवाज़ों पर कोई निशान लगाता है और रातों रात तमाम घरों पर वही सियाही फिर जाती है दुख का शब ख़ूँ रोज़ अधूरा रह जाता है और शनाख़्त का लम्हा बीतता जाता है मैं और मेरा शहर-ए-मोहब्बत तारीकी की चादर ओढ़े रौशनी की आहट पर कान लगाए कब से बैठे हैं घोड़ों की टापों को सुनते रहते हैं हद-ए-समाअत से आगे जाने वाली आवाज़ों के रेशम से अपनी रू-ए-सियाह पे तारे काढ़ते रहते हैं अँगुश्ता ने इक इक कर के छलनी होने को आए अब बारी अंगुश्त-ए-शहादत की आने वाली है सुब्ह से पहले वो कटने से बच जाए तो!

Parveen Shakir

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वो एक लड़की कि जिस से शायद मैं एक पल भी नहीं मिली हूँ मैं उस के चेहरे को जानती हूँ कि उस का चेहरा तुम्हारी नज़्मों तुम्हारी गीतों की चिलमनों से उभर रहा है यक़ीन जानो मुझे ये चेहरा तुम्हारे अपने वजूद से भी अज़ीज़-तर है कि उस की आँखों में चाहतों के वही समुंदर छुपे हैं जो मेरी अपनी आँखों में मौजज़न हैं वो तुम को इक देवता बना कर मिरी तरह पूजती रही है उस एक लड़की का जिस्म ख़ुद मेरा ही बदन है वो एक लड़की जो मेरे अपने गए जनम की मधुर सदा है

Parveen Shakir

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मुझे मालूम था ये दिन भी दुख की कोख से फूटा है मेरी मातमी चादर नहीं तब्दील होगी आज के दिन भी जो राख उड़ती थी ख़्वाबों की बदन में यूँँही आशुफ़्ता रहेगी और उदासी की यही सूरत रहेगी मैं अपने सोग में मातम-कुनाँ यूँँ सर-ब-ज़ानू रात तक बैठी रहूँगी और मिरे ख़्वाबों का पुर्सा आज भी कोई नहीं देगा मगर ये कौन है जो यूँँ मुझे बाहर बुलाता है बड़ी नर्मी से कहता है कि अपने हुजरा-ए-ग़म से निकल कर बाग़ में आओ ज़रा बाहर तो देखो दूर तक सब्ज़ा बिछा है और हरी शाख़ों पे नारंजी शगूफ़े मुस्कुराते हैं मुलाएम सब्ज़ पत्तों पर पड़ी शबनम सुनहरी धूप में हीरे की सूरत जगमगाती है दरख़्तों में छुपी नद्दी बहुत धी में सुरों में गुनगुनाती है चमकते ज़र्द फूलों से लदी नन्ही पहाड़ी के अक़ब में नुक़रई चश्मा ख़ुशी से खिलखिलाता है परिंद-ए-ख़ुश-गुलू शाख़-ए-शगुफ़्ता पर चहकता है घने जंगल में बारिश का ग़ुबार-ए-सब्ज़ सत्ह-ए-शीशा-ए-दिल पर मुलाएम उँगलियों से मर्हबा के लफ़्ज़ लिखता है कोई आता है आ कर चादर-ए-ग़म को बड़ी आहिस्तगी से मेरे शानों से हटा कर सात रंगों का दुपट्टा खोल कर मुझ को उड़ाता है मैं खुल कर साँस लेती हूँ मिरे अंदर कोई पैरों में घुँघरू बाँधता है रक़्स का आग़ाज़ करता है मिरे कानों के आवेज़ों को ये किस ने छुआ जिस से लवें फिर से गुलाबी हो गई हैं कोई सरगोशियों में फिर से मेरा नाम लेता है फ़ज़ा की नग़्मगी आवाज़ देती है हवा जाम-ए-सेहत तज्वीज़ करती है

Parveen Shakir

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गुड़िया सी ये लड़की जिस की उजली हँसी से मेरा आँगन दमक रहा है कल जब सात समुंदर पार चली जाएगी और साहिली शहर के सुर्ख़ छतों वाले घर के अंदर पूरे चाँद की रौशनी बन कर बिखरेगी हम सब उस को याद करेंगे और अपने अश्कों के सच्चे मोतियों से सारी उम्र इक ऐसा सूद उतारते जाएँगे जिस का अस्ल भी हम पर क़र्ज़ नहीं था!

Parveen Shakir

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