मुझे मालूम था ये दिन भी दुख की कोख से फूटा है मेरी मातमी चादर नहीं तब्दील होगी आज के दिन भी जो राख उड़ती थी ख़्वाबों की बदन में यूँँही आशुफ़्ता रहेगी और उदासी की यही सूरत रहेगी मैं अपने सोग में मातम-कुनाँ यूँँ सर-ब-ज़ानू रात तक बैठी रहूँगी और मिरे ख़्वाबों का पुर्सा आज भी कोई नहीं देगा मगर ये कौन है जो यूँँ मुझे बाहर बुलाता है बड़ी नर्मी से कहता है कि अपने हुजरा-ए-ग़म से निकल कर बाग़ में आओ ज़रा बाहर तो देखो दूर तक सब्ज़ा बिछा है और हरी शाख़ों पे नारंजी शगूफ़े मुस्कुराते हैं मुलाएम सब्ज़ पत्तों पर पड़ी शबनम सुनहरी धूप में हीरे की सूरत जगमगाती है दरख़्तों में छुपी नद्दी बहुत धी में सुरों में गुनगुनाती है चमकते ज़र्द फूलों से लदी नन्ही पहाड़ी के अक़ब में नुक़रई चश्मा ख़ुशी से खिलखिलाता है परिंद-ए-ख़ुश-गुलू शाख़-ए-शगुफ़्ता पर चहकता है घने जंगल में बारिश का ग़ुबार-ए-सब्ज़ सत्ह-ए-शीशा-ए-दिल पर मुलाएम उँगलियों से मर्हबा के लफ़्ज़ लिखता है कोई आता है आ कर चादर-ए-ग़म को बड़ी आहिस्तगी से मेरे शानों से हटा कर सात रंगों का दुपट्टा खोल कर मुझ को उड़ाता है मैं खुल कर साँस लेती हूँ मिरे अंदर कोई पैरों में घुँघरू बाँधता है रक़्स का आग़ाज़ करता है मिरे कानों के आवेज़ों को ये किस ने छुआ जिस से लवें फिर से गुलाबी हो गई हैं कोई सरगोशियों में फिर से मेरा नाम लेता है फ़ज़ा की नग़्मगी आवाज़ देती है हवा जाम-ए-सेहत तज्वीज़ करती है
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"तर्क-ए-इश्क़" सुनो प्रेमिका ओए अनामिका मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता लिखते होंगे जो लिखते होंगे मैं नहीं लिखता मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ लिखने के लिए मैं बिकता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ बिकने के लिए मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है तुम मेरी गीत में कैसे हो तुम जानो मेरी ग़ज़ल में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी कविता में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी नज़्म में कैसे हो तुम जानो मैं क्यूँ जानूँ जब मैं तुम्हें नहीं लिखता और मैं क्यूँ लिखूँ तुम्हारे लिए क्या किया है तुम ने हमारे लिए वही समझदारी भरी बातें जो तुम हमेशा से करती आई हो जब भी मिलती समझदारी भरी बातें करती और मैं पागलों की तरह तुम्हारी हाँ में हाँ मिलता मैं अक्सर ही चुप रहता था क्योंकि कभी तो जवाब नहीं होते थे और कभी मैं संकोच जाता मगर तुम करती थी क्यूँ नहीं करोगी तेज़ थी ना करोगी ही वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि मुझे छोड़ जाने का फ़ैसला भी तुम्हारा था पता नहीं किस ने कह दिया कि मुहब्बत पागलों को पसंद करती है मुझे तो कभी नहीं किया ख़ैर इतना बड़ा फ़ैसला तुम ने किया इतना सही फ़ैसला तुम ने किया तो ये तय रहा कि तुम समझदार थी और मैं पागल तो पागल लिखा नहीं करते तुम समझदार हो तेज़ हो तुम लिखना मेरे लिए मैं पढ़ूँगा क्योंकि मैं पागल हूँ गर बे-ज़बाँ नहीं लिखूँगा नहीं मगर पढ़ूँगा और ज़रूर पढ़ूँगा
Rakesh Mahadiuree
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"ख़ुदा नाराज़" कमाल है कमाल है मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है बेहाल है बेहाल है सब मकड़ियों के जाल है दुनिया में रहना भी अब बहुत बड़ा जंजाल है बवाल है बवाल है गुज़र रही जो ज़िंदगी ये दिन है या कोई साल है मुझे आज की फ़िक्र तो है मुझे कल का भी ख़याल है नक़ाब है नक़ाब है हर चेहरे पर नक़ाब है जो शख़्स की ये ज़ात है वो साँप का भी बाप है जो दो-रुख़ा किरदार है ग़ज़ब है बे-मिसाल है दलाल है दलाल है सब सोच के दलाल है गुनाह भी उस का माफ़ है सब पैसे की ये चाल है क्या काल है क्या काल है ख़ुदा भी जो नाराज़ है 'इबादतों में मिल रहे जल्दबाज़ी के आ'माल है ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है कमाल है कमाल है
ZafarAli Memon
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा
Zubair Ali Tabish
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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पैरों की मेहँदी मैं ने किस मुश्किल से छुड़ाई थी और फिर बैरन ख़ुश्बू की कैसी-कैसी विनती की थी प्यारी धीरे-धीरे बोल सावन, भरा घर जाग उठेगा लेकिन जब उस के आने की घड़ी हुई सुब्ह से ऐसी झड़ी लगी उम्र में पहली बार मुझे बारिश अच्छी नहीं लगी बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की उसे बुला जिस की चाहत में तेरा तन-मन भीगा है प्यार की बारिश से बढ़कर क्या बारिश होगी और जब उस बारिश के बा'द हिज्र की पहली धूप खुलेगी तुझ पर रंग के इस्म खुलेंगे
Parveen Shakir
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सात सुहागनें और मेरी पेशानी! संदल की तहरीर भला पत्थर के लिखे को क्या धोएगी बस इतना है जज़्बे की पूरी नेकी से सब ने अपने अपने ख़ुदा का इस्म मुझे दे डाला है और ये सुनने में आया है शाम ढले जंगल के सफ़र में इस्म बहुत काम आते हैं!
Parveen Shakir
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सो अब ये शर्त-ए-हयात ठहरी कि शहर के सब नजीब अफ़राद अपने अपने लहू की हुरमत से मुन्हरिफ़ हो के जीना सीखें वो सब अक़ीदे कि इन घरानों में उन की आँखों के रंगतों की तरह तसलसुल से चल रहे थे सुना है बातिल क़रार पाए वो सब वफ़ादारियाँ कि जिन पर लहू के वा'दे हलफ़ हुए थे वो आज से मस्लहत की घड़ियाँ शुमार होंगी बदन की वाबस्तगी का क्या ज़िक्र रूह के अहद-ना में तक फ़स्ख़ माने जाएँ ख़मोशी-ओ-मस्लहत-पसंदी में ख़ैरियत है मगर मिरे शहर-ए-मुन्हरिफ़ में अभी कुछ ऐसे ग़य्यूर-ओ-सादिक़ ब-क़ैद-ए-जाँ हैं कि हर्फ़-ए-इंकार जिन की क़िस्मत नहीं बना है सो हाकिम-ए-शहर जब भी अपने ग़ुलाम-ज़ादे उन्हें गिरफ़्तार करने भेजे तो साथ में एक एक का शजरा-ए-नस्ब भी रवाना करना और उन के हमराह सर्द पत्थर में चुनने देना कि आज से जब हज़ार-हा साल बा'द हम भी किसी ज़माने के टेक्सलाया हड़प्पा बन कर तलाशे जाएँ तो उस ज़माने के लोग हम को कहीं बहुत कम-नसब न जानें
Parveen Shakir
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गुड़िया सी ये लड़की जिस की उजली हँसी से मेरा आँगन दमक रहा है कल जब सात समुंदर पार चली जाएगी और साहिली शहर के सुर्ख़ छतों वाले घर के अंदर पूरे चाँद की रौशनी बन कर बिखरेगी हम सब उस को याद करेंगे और अपने अश्कों के सच्चे मोतियों से सारी उम्र इक ऐसा सूद उतारते जाएँगे जिस का अस्ल भी हम पर क़र्ज़ नहीं था!
Parveen Shakir
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तुम मुझ को गुड़िया कहते हो ठीक ही कहते हो! खेलने वाले सब हाथों को मैं गुड़िया ही लगती हूँ जो पहना दो मुझ पे सजेगा मेरा कोई रंग नहीं जिस बच्चे के हाथ थमा दो मेरी किसी से जंग नहीं सोचती जागती आँखें मेरी जब चाहे बीनाई ले लो कूक भरो और बातें सुन लो या मेरी गोयाई ले लो माँग भरो सिन्दूर लगाओ प्यार करो आँखों में बसाओ और फिर जब दिल भर जाए तो दिल से उठा के ताक़ पे रख दो तुम मुझ को गुड़िया कहते हो ठीक ही कहते हो!
Parveen Shakir
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