“बस यही एक सच है” बस यही एक सच है बता दो उसे उस सेे नफ़रत है मुझ को ये जुमला नहीं क्यूँ मुझे फ़िक्र हो उस के मुस्कान की जब उसे मेरी ख़ुशियों की परवा नहीं क्यूँ बताऊॅं उसे याद करता हूँ मैं क्या उसे मैं कभी याद आता नहीं मेरी ख़ातिर किया हो कभी उस ने कुछ एक पल ऐसा भी याद आता नहीं अपनी यादें वो ले जाए या जाँ मेरी एक पल भी जिया मुझ सेे जाता नहीं नाम भी उस का अब तो है चुभता मुझे कोई जा कर उसे क्यूँ बताता नहीं पढ़ता है वो अगर मेरे नज़्मों को तो क्या नज़र मेरा हाल उस को आता नहीं गर नज़र उस को आती है हालत मेरी तो भला लौट कर क्यूँ वो आता नहीं इंतिज़ार अब करूँ क्यूँ भला उस का मैं जब कि अब राह मेरी वो तकता नहीं क्यूँ मुझे फ़िक्र हो उस के मुस्कान की जब उसे मेरी ख़ुशियों की परवा नहीं बस यही एक सच है बता दो उसे
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”
Zubair Ali Tabish
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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“तवज्जोह” मैं सुनाता हूँ एक नज़्म उस पे जिस का उनवान उस का नाम ही है और इस तरह नज़्म ख़त्म हुई शुक्रिया आप की तवज्जोह का
SHIV SAFAR
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"घास" मुझे नहीं बनना है कोई छायादार वृक्ष न ही किसी सुगंधित और ख़ूब-सूरत फूल का पौधा जिसे उखाड़ के फेंका जा सके मुझे बनना है वो हरी और मुलाएम घास तुम्हारे दिल की ज़मीन पर जो मौसमों की मार से हवा से धूप से जाड़े से गर्मी से और बारिश से हर बार तुम में ही नष्ट हो और तुम में ही उगे मुझे नहीं चाहिए तुम सेे कभी कभी मुलाक़ातों वाली मौसमी सिंचाई मुझे चाहिए तुम्हारे साथ की ओस भरी बूँदें जो हर सुब्ह मुझे और ज़्यादा तुम्हारा बनाए हाँ मुझे बनना है तुम्हारे दिल की ज़मीन पर वो हरी और मुलाएम घास जो तुम्हारी और सिर्फ़ तुम्हारी ही होकर रह जाए
SHIV SAFAR
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“जन्म-दिन” ज़िंदगी का हर इक दिन हँसाता रहे जन्म-दिन आप का रोज़ आता रहे चाँद तारों के गुब्बारे कमरे में हो सब हक़ीक़त बने जो भी सपने में हो काटना केक अपने ग़मों का बना फ़िक्र की मोमबत्ती को भी फूँकना आसमाँ से फ़रिश्ते, परी आएँगे ख़ूब भर भर के वो तोहफ़े भी लाएँगे फिर बजाएँगे मिल कर सभी तालियाँ गाएँगे जुगनुएँ नाचेंगी तितलियाँ फूलों के जैसे मन मुस्कुराता रहे जन्म-दिन आप का रोज़ आता रहे
SHIV SAFAR
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"मय्यत” मुझे मालूम है तन्हा कोई छोड़े तो क्या होगा कोई अपना अगर बाँहों में दम तोड़े तो क्या होगा उसी इक पल में मानो उम्र सारी बीत जाती है हमारे आगे बैठी मौत हम पे मुस्कुराती है समझ उस पल नहीं आता कि रोएँ या कि साँसें लें या उन की लाश पर ही सर पटक कर हम भी जाँ दे दें ख़ुदा के आगे घुटने टेक कर हम गिड़गिड़ाते हैं कि अपना वास्ता देकर उन्हें वापस बुलाते हैं मगर उस रब के कानों तक न चीख़ें अपनी जाती हैं किसी बादल से टकरा कर दुआएँ लौट आती हैं हमें उस वक़्त भी ये ज़िंदगी क्या ख़ूब ठगती है न आँसू सूख भी पाते कि मय्यत उठने लगती है ये बस कहने की बातें है कि दुनिया छोड़ जाते हैं वो बनकर याद सीने में बराबर जाते आते हैं न मिट्टी में गड़े रहते न नदियों में वो बहते हैं है सच तो ये हमेशा से हमी में दफ़्न रहते हैं अगर ख़ुद मौत से रिश्ता कोई जोड़े तो क्या होगा कोई अपना अगर बाहों में दम तोड़े तो क्या होगा मुझे मालूम है तन्हा कोई छोड़े तो क्या होगा
SHIV SAFAR
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“वो ही तुम हो” मेरी शा'इरी मेरे लफ़्ज़ों में गुम हो जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो ये उजला सा पन्ना है चेहरा तुम्हारा ये नुक़्ता ये बिंदू है गहना तुम्हारा किताबों से आए तुम्हारी ही ख़ुशबू सुख़न में तुम्हीं से है लफ़्ज़ों का जादू ये मेरी क़लम उँगलियाँ हैं तुम्हारी बयाज़ों की दफ़्ती हैं बाहें तुम्हारी मेरे ज़िस्त के हर वरक़ में भी गुम हो जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो ग़ज़ल है तुम्हारे बयाँ का तरीका ये बहरों ने सीखा है तुम सेे सलीक़ा सियाही है आँखों का काज़ल तुम्हारा ये मत्ला ये मक़्ता है आँचल तुम्हारा है मिसरा–ए–ऊला तुम्हारी जवानी तुम्हारे ही लब हैं ये मिस्रा–ए–सानी तख़ल्लुस में मेरे तलफ़्फ़ुज़ सा गुम हो जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो
SHIV SAFAR
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