'सिगरेट और मोहब्बत' वो मुझ सेे रोज़ कहती थी ये सिगरेट छोड़ दो ना तुम हमेशा ग़म में रहने कि रिवायत तोड़ दो ना तुम तो मैं हँसकर ये कहता था बड़ी नादान हो पागल कि मेरी ज़ात से तुम भी अभी अंजान हो पागल चलो माना ये आदत है इसे मैं छोड़ सकता हूँ मोहब्बत भी तो आदत है उसे भी छोड़ दूँ क्या मैं मोहब्बत का जो जज़्बा है बहुत वो ख़ास है शायद मुझे हर वक़्त लगता है वो मेरे पास है शायद मोहब्बत रोग ही तो है ये कोई जोग ही तो है जो हर दम ये उदासी है किसी का सोग ही तो है मोहब्बत की रिवायत है ये ग़म पाना इबादत है मैं अपने ज़ख़्म सीता हूँ ग़म ए माज़ी को जीता हूँ ये सिगरेट और ग़म जो हैं ये ज़रिए राब्ते के हैं धुएँ में अक्स है उस का ग़मों में रम्ज़ है उस का उसे जब याद करने में बहुत दुश्वारी होती है तो मैं सिगरेट को पीता हूँ उसे हर साँस जीता हूँ तो अब तुम ही कहो जानाँ मोहब्बत छोड़ दूँ कैसे जो मेरे ग़म की साथी है वो सिगरेट तोड़ दूँ कैसे।
Related Nazm
"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था
Divya 'Kumar Sahab'
28 likes
तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
81 likes
मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
107 likes
तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
117 likes
"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
70 likes
More from ALI ZUHRI
"बाबा" तेरे कमरे से जो आती थी हमेशा बाबा वो आवाज़ पुकारती नहीं मुझ को बाबा तेरे काँधों पर बैठ कर जो देखे थे कभी वो मेले लगते हैं अब सूने विरान बाबा ये ज़माने की निगाहें सौदागर है वहशी है ये नोच खाएगी जिस्मों को हमारे बाबा तू घर में हमारे माली-ए-गुलशन था हम तो तेरे आँगन की कली थे बाबा तेरे काँधों पर आख़िरी वक़्त रोना था हमें तेरे साए में इस घर से विदा होना था बाबा तेरी ही निशानी है तुझ सा दिखता भी है भाई भी कब बेटियों सा समझता है बाबा तू जो गया माँ के चेहरे की रंगत भी ले गया वो भी उदास है बहुत कम बोलती है बाबा दिल से अब बस यही दुआ निकलती है हमें तुम मुस्कुराते मिलो जन्नत में बाबा
ALI ZUHRI
9 likes
"जुदाई" जिन दिनों में तुम ने देखा था मुझे मैं उन दिनों किसी गुलाब जैसा खिल रहा था महक रहा था तुम्हारे इश्क़ का गुलाबी जाम मेरे नर्म चेहरे पे बह रहा था मगर अब के यूँँ है बिछड़ के तुम सेे तुम्हारे हिज्र ए मलाल से मैं उजड़ गया हूँ तुम्हारी क़िताब में रखे हुए गुलाब जैसा मैं इन दिनों सड़ रहा हूँ तुम्हारे इंतिज़ार की सर्द राहों पर पत्ती पत्ती बिखर रहा हूँ मैं जीता जागता एक लड़का साँस दर साँस मर रहा हूँ
ALI ZUHRI
1 likes
"जंग" ये जंग कभी न ख़त्म होगी चल हम दुनिया बसाएँ और कहीं इस शहर की चिड़ियाँ सहम गई हैं वो उड़ के जाती हैं और कहीं यहाँ गूँज रही है तोपों की सदाएँ चल हम गीत सुनाएँ और कहीं ये दुनिया है काँटो से भरी हम फूल खिलाएँ और कहीं यहाँ नफ़रत का बारूद जला हैं हम मोहब्बत महकाएँ और कहीं सब बस्तियाँ जल के राख हुई चल आशियाँ बनाएँ और कहीं ये लोग हैं जिस्म चबाने के लिए हम फसल उगाएँ और कहीं हर धड़कन में शोर है बरपा चल सुकून तलाशें और कहीं
ALI ZUHRI
9 likes
"बचपन" मैं जब छोटा था मैं ने चलना ना सीखा था मेरी हर बात सच्ची थी मेरा हर लफ्ज़ माँ था मेरा बिस्तर बाप का कांधा था मेरा साथी भाई था जो घर का आँगन था वो मेरी दुनिया था जो माँ के कदम थे वो मेरी जन्नत थे अब होश जब सँभाला है याद फिर वही सब आया है कितने अच्छे थे साथ थे दिल में उन्हे खोने का मलाल आया है माज़ी के वर्क़ो पर इत्र का साया है मेरी आँखों मैं वही मंज़र पुराना है मौका मिले किस्मत से तो वही बचपन दोहराना है
ALI ZUHRI
10 likes
"निसा" दुनिया के रंगीन मज़ाहिरों से हट कर,जब कभी मेरी नज़र उस सादा लिबास लड़की पे अगर पड़ती, मेरे दिल से हसरतें निकलती और उमंगें झूम उठती, उस लड़की के नाक-नक़्श बिल्कुल भी बनावटी नहीं उस के बदन के नुक़ूश में कुछ भी सजावटी नहीं, ख़ुदा की क़सम दुनिया के मज़ाहिरों में उस के सिवा कुछ भी देखने को नहीं, उसे इस दुनिया की रंगीनियों की कोई परवाह ही नहीं, मानो दुनिया से उसे कोई राब्ता ही नहीं, उसे ख़ुदा ने अपनी क़ुदरत की निशानी के लिए बनाया होगा उस का पैकर तहतुस्सरा की मिट्टी से तराशा होगा उस की बुलंदी पे फ़रिश्तों ने भी सर झुकाया होगा वो तो ऐसी चीज़ है जिसे देख कर ख़ुदा को ख़ुद अपनी कुन पे रश्क आया होगा, ख़ुदा ने, कोयल को उस की समा'अत के आशार बख़्शें हैं और पेड़ों को उस की बाँहों के हार बख़्शें हैं ये घटा उस की ज़ुल्फ़ों की छाँव में रह कर काली होती है उस के आँचल से ही शाम पर लाली होती है उस के हाथों की लकीरों पर दुनिया नक़्श है जन्नत की हूरों में भी उस का ही अक्स है उस की आँखों की बीनाई से सुब्ह,रात रौशन है उस के पहलू में सातों बर्र-ए-आज़मों के मौसम हैं उस के आरिज़ की पुरनमीं से गुलाब महकते हैं उस की मुस्कुराहट से जंगल के पंछी चहकते हैं जुगनू ने उस की ज़ीनत पाई है मेहँदी ने भी उस के हाथों पे रंगत पाई है मैं उस लड़की की वज़ाहत अपनी नज़्मों में करुँ भी तो कैसे करुँ कि मैं ने उसे देखा ही बहुत कम है, वो रब का अहसान है या तुक़ज़्ज़िबान इस पे क्या झगड़ना की वो नास है या निसा वो तो ज़िंदगी को ज़रूरी है जैसे कि निज़ाम-ए-फिज़ा
ALI ZUHRI
4 likes
Similar Writers
Our suggestions based on ALI ZUHRI.
Similar Moods
More moods that pair well with ALI ZUHRI's nazm.







