nazmKuch Alfaaz

दीप जिस का महल्लात ही में जले चंद लोगों की ख़ुशियों को ले कर चले वो जो साए में हर मस्लहत के पले ऐसे दस्तूर को सुब्ह-ए-बे-नूर को मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता मैं भी ख़ाइफ़ नहीं तख़्ता-ए-दार से मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़्यार से क्यूँँ डराते हो ज़िंदाँ की दीवार से ज़ुल्म की बात को जहल की रात को मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता फूल शाख़ों पे खिलने लगे तुम कहो जाम रिंदों को मिलने लगे तुम कहो चाक सीनों के सिलने लगे तुम कहो इस खुले झूट को ज़ेहन की लूट को मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता तुम ने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फ़ुसूँ चारा-गर दर्दमंदों के बनते हो क्यूँँ तुम नहीं चारा-गर कोई माने मगर मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती

Abrar Kashif

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ये एक अहद-ए-सज़ा है जज़ा की बात न कर दुआ से हाथ उठा रख दवा की बात न कर ख़ुदा के नाम पे ज़ालिम नहीं ये ज़ुल्म रवा मुझे जो चाहे सज़ा दे ख़ुदा की बात न कर हयात अब तो इन्हीं महबसों में गुज़रेगी सितमगरों से कोई इल्तिजा की बात न कर उन्हीं के हाथ में पत्थर हैं जिन को प्यार किया ये देख हश्र हमारा वफ़ा की बात न कर अभी तो पाई है मैं ने रिहाई रहज़न से भटक न जाऊँ मैं फिर रहनुमा की बात न कर बुझा दिया है हवा ने हर एक दया का दिया न ढूँड अहल-ए-करम को दया की बात न कर नुज़ूल-ए-हब्स हुआ है फ़लक से ऐ 'जालिब' घुटा घुटा ही सही दम घटा की बात न कर

Habib Jalib

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गोलियों से ये जवाँ आग न बुझ पाएगी गैस फेंकोगे तो कुछ और भी लहराएगी ये जवाँ आग जो हर शहर में जाग उट्ठी है तीरगी देख के इस आग को भाग उट्ठी है कब तलक इस से बचाओगे तुम अपने दामाँ ये जवाँ आग जला देगी तुम्हारे ऐवाँ ये जवाँ ख़ून बहाएा है जो तुम ने अक्सर ये जवाँ ख़ून निकल आया है बन के लश्कर ये जवाँ ख़ून सियह-रात का रहने देगा दुख में डूबे हुए हालात न रहने देगा ये जवाँ ख़ून है महलों पे लपकता तूफ़ाँ उस की यलग़ार से हर अहल-ए-सितम है लर्ज़ां ये जवाँ फ़िक्र तुम्हें ख़ून न पीने देगी ग़ासिबो अब न तुम्हें चैन से जीने देगी क़ातिलो राह से हट जाओ कि हम आते हैं अपने हाथों में लिए सुर्ख़ अलम आते हैं तोड़ देगी ये जवाँ फ़िक्र हिसार-ए-ज़िन्दाँ जाग उट्ठे हैं मिरे देस के बेकस इंसाँ

Habib Jalib

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हरियाली को आँखें तरसें बगिया लहू-लुहान प्यार के गीत सुनाऊँ किस को शहर हुए वीरान बगिया लहू-लुहान डसती हैं सूरज की किरनें चाँद जलाए जान पग पग मौत के गहरे साए जीवन मौत समान चारों ओर हवा फिरती है ले के तीर कमान बगिया लहू-लुहान छलनी हैं कलियों के सीने ख़ून में लत-पत पात और न जाने कब तक होगी अश्कों की बरसात दुनिया वालो कब बीतेंगे दुख के ये दिन-रात ख़ून से होली खेल रहे हैं धरती के बलवान बगिया लहू-लुहान

Habib Jalib

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क़ौम की बेहतरी का छोड़ ख़याल फ़िक्र-ए-तामीर-ए-मुल्क दिल से निकाल तेरा परचम है तेरा दस्त-ए-सवाल बे-ज़मीरी का और क्या हो मआल अब क़लम से इज़ार-बंद ही डाल तंग कर दे ग़रीब पर ये ज़मीं ख़म ही रख आस्तान-ए-ज़र पे जबीं ऐब का दौर है हुनर का नहीं आज हुस्न-ए-कमाल को है ज़वाल अब क़लम से इज़ार-बंद ही डाल क्यूँँ यहाँ सुब्ह-ए-नौ की बात चले क्यूँँ सितम की सियाह रात ढले सब बराबर हैं आसमाँ के तले सब को रजअत-पसंद कह कर टाल अब क़लम से इज़ार-बंद ही डाल नाम से पेशतर लगा के अमीर हर मुसलमान को बना के फ़क़ीर क़स्र-ओ-ऐवाँ में हो क़याम-पज़ीर और ख़ुत्बों में दे 'उमर' की मिसाल अब क़लम से इज़ार-बंद ही डाल आमरिय्यत की हम-नवाई में तेरा हम-सर नहीं ख़ुदाई में बादशाहों की रहनुमाई में रोज़ इस्लाम का जुलूस निकाल अब क़लम से इज़ार-बंद ही डाल लाख होंटों पे दम हमारा हो और दिल सुब्ह का सितारा हो सामने मौत का नज़ारा हो लिख यही ठीक है मरीज़ का हाल अब क़लम से इज़ार-बंद ही डाल

Habib Jalib

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दिन-भर कॉफ़ी-हाउस में बैठे कुछ दुबले-पतले नक़्क़ाद बहस यही करते रहते हैं सुस्त अदब की है रफ़्तार सिर्फ़ अदब के ग़म में ग़लताँ चलने फिरने से लाचार चेहरों से ज़ाहिर होता है जैसे बरसों के बीमार उर्दू-अदब में ढाई हैं शाइ'र 'मीर' ओ 'ग़ालिब' आधा 'जोश' या इक-आध किसी का मिस्रा या 'इक़बाल' के चंद अश'आर या फिर नज़्म है इक चूहे पर हामिद-'मदनी' का शहकार कोई नहीं है अच्छा शाइ'र कोई नहीं अफ़्साना-निगार 'मंटो' 'कृष्ण' 'नदीम' और 'बेदी' इन में जान तो है लेकिन ऐब ये है इन के हाथों में कुंद ज़बाँ की है तलवार 'आली' अफ़सर 'इंशा' बाबू 'नासिर' 'मीर' के बर-ख़ुरदार 'फ़ैज़' ने जो अब तक लिक्खा है क्या लिक्खा है सब बे-कार उन को अदब की सेह्हत का ग़म मुझ को उन की सेह्हत का ये बेचारे दुख के मारे जीने से हैं क्यूँँ बे-ज़ार हुस्न से वहशत इश्क़ से नफ़रत अपनी ही सूरत से प्यार ख़ंदा-ए-गुल पर एक तबस्सुम गिर्या-ए-शबनम से इनकार

Habib Jalib

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