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"धीमा ज़हर" उम्मीद-ओ-ख़्वाहिशें ज़िन्दगी जीने को अहम तो हैं मगर ये धीमा ज़हर होती हैं गर हो जाएँ ज़्यादा तो ख़त्म कर देती हैं धीरे-धीरे ख़ुशियों को पालने वाले इंसान को आख़िरश मैं ने भी मेरी जानाँ तुम से रखी थीं उम्मीदें तुम से पाली थीं ख़्वाहिशें अव्वल दर्ज़े की उम्मीदें अव्वल दर्ज़े की ख़्वाहिशें और अब ये हाल है जानाँ ख़ुशियों की राख पर ज़िन्दगी रोती-रोती धीमी मौत मर रही है जानाँ तुम ने मुझ को सिखलाया है उम्मीद-ओ-ख़्वाहिशें ज़हर होती हैं

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"तशवीश" मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा आज का दिन निकला है जैसे यूँँॅं कल का भी निकल जाएगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा मेरी सालों की मेहनत पर ये क़िस्मत पानी फेरेगी मैं अल्हड़-पन से निकलूॅंगा और ज़िम्मेदारी घेरेगी कॉलेज ख़त्म हो जाएगा फिर नौकरी करूँॅंगा मैं और दस पंद्रह हज़ार के ख़ातिर दिन और रात मरूॅंगा मैं दिन दफ़्तर में जाएगा और रात ख़यालों में जाएगी फिर इस सोच में दिन निकलेंगे अपनी बारी आएगी मगर नहीं आएगी इक इतवार ज़रूर आएगा छह दिन बा'द कहीं जा कर के एक महीने की तनख़्वाह इक हफ़्ते में ख़त्म फिर दूर-दूर तक नहीं दिखेंगे नाज़ ग़ज़ल और नज़्म शौक़ दबाता जाऊॅंगा फ़र्ज़ निभाता जाऊॅंगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा शादी की बातें होंगी दिन दफ़्तर में जाएगा साथ किसी के रातें होंगी जो शाख-ए-उम्मीद पकड़ के बैठा हूँ ये भी इक दिन जल जाएगी फिर धीरे-धीरे क्या होगा नाज़ जवानी ढल जाएगी मुझ को कुछ करना था मुझ को कुछ बनना था मगर नहीं कर पाया मैं बाक़ी सब तो कर लेंगे कुछ अपना ही रह जाएगा ये दुनिया घूमने का सपना सपना ही रह जाएगा फिर हर रोज़ पशेमाँ हो के मैं बीती बातें सोचूॅंगा और ख़ुद को कोसूॅंगा ये भी किया जा सकता था वो भी किया जा सकता था यूँँॅं ज़िन्दगी गुज़ार दी है खुल के जिया जा सकता था और फिर अपनी नज़्म पढूॅंगा उम्र निकलती जाएगी मौत का ख़ौफ़ रहेगा फिर धीरे-धीरे क्या होगा इक दिन इन सब से तंग आके मैं शायद ख़ुद-कुशी करूँॅंगा शे'र लिखा होगा दीवार-ओ-दर पर एक बहुत अच्छा सा लगता है हर रोज़ यही इक ऐसा दिन भी आएगा मुझ को ये डर है कि शायद ये सब कुछ सच हो जाएगा

Naaz ishq

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"परिचय ग़रीबी का" चुप-चाप दर्द को समेट कर चेहरे पर मुस्कान ले जाता है घर पर पहुँचकर ,अपने बच्चों के साथ ठेले पर बैठ कर, प्यारी सी मुस्कान देता है कोमल से हाथ को पकड़ कर बाप उस की उँगलियाँ हाथों में ले कर नाख़ून काट कर एक सीध में लाता है इसे डर नहीं घर में चोरी होने का , साँझ ढलते ही वो सो जाता है , ये मेहनत की कमाई करता है , किसी का हक़ नहीं मरता , केवल अपने हक का खाता है , न बँगला है न गाड़ी है , फिर भी पूरा शहर घूम लेता है , न पेट्रोल, न डीज़ल , न कोई ईंधन , चार पहिए के उड़न खटोले पर , प्रकृति से रोमांस करता है, न पोल्यूशन, न गंदगी , स्वच्छता का प्रतीक बना, शहर-का-शहर भ्रमन करता है इस का ठेला ही इस की ज़िन्दगी है , पूजा है, व्रत है, बंदगी है , एक छोटा सा परिवार है , बच्चा ही संसार है , ये मुस्कुराता हुआ चेहरा , साहब ये तो , एक गुपचुप बेचने वाला है, एक ठेला ठेलने वाला है

Navneet krishna

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"उस सेे कहना" उस सेे कहना बिछड़ गए तो क्या याद तो अब भी आती है उस के लौट आने की उम्मीद अब भी नज़र आती है आधी रात को चाँद जब खिड़कियों से झाँकता है मैं कुछ भी लिखने बैठता हूँ मगर मेरा हाथ काँपता है पता नहीं क्यूँ एक कमी-सी रहती है ये निगाहें उस एक तस्वीर पर थमी-सी रहती है पुराने मैसेज में लबालब भरी मोहब्बत देख कर पिघल जाता है पत्थर वरना तो इस दिल पे बर्फ जमी-सी रहती है गुलज़ार से कहना जैसी उस की एक रात थी वैसी यहाँ हर रोज़ आँख में नमी-सी रहती है मेरी तन्हाई और उस की बे-ए'तिनाई मेरी अधूरी छूटी पड़ी ग़ज़लें और नज़्में वैसे कुछ हिज्र के मुकम्मल शे'र हैं बुझे पड़े दिए हैं जली हुई अँधेर है उस के नाम लिखे गए ख़त मेरे घर की वीरान पड़ी छत तस्वीर से उस की ठोड़ी का तिल और मेरा बिखरा हुआ दिल और वो याद है एक मुरझाया हुआ गुलाब था ना मेरा एक टूटा हुआ ख़्वाब है ना ये सभी रोज़ मेरे बगल में आ कर खड़े हो जाते हैं और मुझ सेे कहते हैं उस सेे कहना दिल टूट गया तो क्या अब भी धड़कता है एक शख़्स तेरे शहर की गलियों में भटकता है ये आँखें उस की मुंतज़िर हैं आज भी जैसे कल थे मुहाजिर हैं आज भी 'इश्क़-ए-सादिक़ तो लापरवाह है ना इश्क़-ए-ना-मुराद ही सही मगर ख़ुदा गवाह है ना इश्क़-ए-मजाज़ी ब-निस्बत इश्क़-ए-इलाही 'अज़ीम है क्या तुम सेे मोहब्बत करना जुर्म-ए-'अज़ीम है उस सेे पूछना था उस सेे पूछना था बहुत कुछ उस सेे कहना था बहुत कुछ कह नहीं पाया उस सेे कहना उस सेे बिछड़ के मैं रह नहीं पाया ऐसा नहीं है भुलाना नहीं चाहता हूँ चाहता हूँ ऐसा नहीं उस के सिवा किसी से मिलना मिलाना नहीं चाहता हूँ चाहता हूँ ऐसा भी नहीं दिखावा करने का शौक़ है मोहब्बत में आशिक़ बनने का शौक़ है मैं तो चाहता हूँ हर फूल को मसल देना मगर बस दिल नहीं करता उस सेे कहना उस के बिना चाँद तारे जुगनू फूल ख़ुशबू क्या उस मह-रू के सामने कोई ख़ुश-रू क्या सब मुक़द्दस होता है मोहब्बत में इश्क़ में बा-वज़ू क्या एक उसी की ख़्वाहिश थी इस दिल को जो पूरी न हो सकी अब तो जो मिल जाए ठीक अब हस्ब-ए-आरज़ू क्या उस सेे कहना मगर फिर भी दिल के एक छोटे से कोने में एक ख़्वाहिश ज़िंदा है उस को अपना कह के पुकारने की हर शब उस की नज़र उतरने की कहने की उस से कि तुम सेे मोहब्बत है मुझे तुम्हारी ज़रूरत है मुझे उस सेे कहना मैं ही नहीं उस को खिड़की दर-ओ-दीवार सब याद करते हैं उस के बारे में रात-रात भर पागल बात करते हैं मुझ सेे ज़्यादा क़लम टेबल पंखा रस्सी सब रोते हैं वो भी उसी की यादों में अक्सर खोए हुए होते हैं वो शर्ट जो उसे पसंद थी, नहीं शर्ट को वो पसंद थी, उस के जाते ही रंग छोड़ दिया इसने वो इत्र जो उस ने दिया था लगाने को कहती थी अब कहीं लगा के जाता हूँ तो ख़ुशबू नहीं आती वो ख़ुशबू इत्र की नहीं थी वो बहाना था महकती तो वो थी मेरे बदन में वो घड़ी जो उस ने दी थी रुक गई उसी दिन जिस दिन मैं वो बिछड़े थे ये दिल-घर उस का जो उस ने सजाया था और फिर तोड़ कर गई थी उस सेे कहना उसे देखने कई किराए दार आए थे काफ़ी अच्छी रक़म दे रहे थे मगर रहने ही नहीं दिए इस की दीवारें चिल्ला पड़ी मुझ पर हर एक मेरी चीज़ मेरी नहीं है अब उस सेे कहना सब उस का है अब सब उसी को चाहते हैं मुझ सेे ज़्यादा इन्हें उस की आदत लग गई है उस सेे कहना आज भी उस की तलाश रहती है वो नहीं मगर उस की याद पास रहती है किसी नए जोड़े को देख कर वो यहाँ होती मेरे कहने से पहले मेरी तन्हाई काश कहती है उस सेे कहना ये कोई इमोशनल ब्लैकमेलिंग नहीं है बस बताना था आज-कल मेरी तबीयत भी बहुत ख़राब रहती है आँखों में प्यास और होंठों पर शराब रहती है बहन तो गुज़र ही गई याद होगा पिताजी थोड़े टूट गए हैं घुटने जाम हो जाते हैं मम्मी का जी थोड़ा और कच्चा हो गया है और तो बस थोड़ी ख़राश रहती है कुछ अच्छा नहीं बनाया सालों से तब से बस जीने के लिए खाते हैं मुझे बड़े डरावने ख़्वाब आते हैं तुम तो कभी निकलती ही नहीं ज़ेहन से पूछना था मैं, बहन, माँ, भाई कोई भी, कभी भी याद आते हैं? उस सेे कहना किसी रोज़ कहीं भी कभी भी अगर मिलने आए तो लौट के मत जाना अगर जाना हो तो मत आना मेरे ये दिल के ज़ख़्म भर भी सकते हैं मगर एक और चोट से हम मर भी सकते हैं कोई पस-ओ-पेश ही नहीं इस बात पर तेरा दीदार ज़रूरी है तेरे साथ से इस लिए ही तो तेरी तस्वीर है आज भी आँसू-ओ-ख़लिश तक़दीर थे कल भी तक़दीर हैं आज भी कभी याद आए तो हाल पूछ लेना बुरा ही सही मेरे बारे में सोच लेना वैसे तो मैं ख़ुद ही जब याद बन जाऊॅंगा तब देखना बहुत याद आऊॅंगा उस सेे कहना बिछड़ गए तो क्या याद तो अब भी आती है लो फिर उस की याद आ गई

Chhayank Tyagi

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"दिवाली" मिरी साँसों को गीत और आत्मा को साज़ देती है ये दिवाली है सब को जीने का अंदाज़ देती है हृदय के द्वार पर रह रह के देता है कोई दस्तक बराबर ज़िंदगी आवाज़ पर आवाज़ देती है सिमटता है अँधेरा पाँव फैलाती है दिवाली हँसाए जाती है रजनी हँसे जाती है दिवाली क़तारें देखता हूँ चलते-फिरते माह-पारों की घटाएँ आँचलों की और बरखा है सितारों की वो काले काले गेसू सुर्ख़ होंट और फूल से आरिज़ नगर में हर तरफ़ परियाँ टहलती हैं बहारों की निगाहों का मुक़द्दर आ के चमकाती है दिवाली पहन कर दीप-माला नाज़ फ़रमाती है दिवाली उजाले का ज़माना है उजाले की जवानी है ये हँसती जगमगाती रात सब रातों की रानी है वही दुनिया है लेकिन हुस्न देखो आज दुनिया का है जब तक रात बाक़ी कह नहीं सकते कि फ़ानी है वो जीवन आज की रात आ के बरसाती है दिवाली पसीना मौत के माथे पे छलकाती है दिवाली सभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या उजाला हर तरफ़ है इस किनारे उस किनारे क्या गगन की जगमगाहट पड़ गई है आज मद्धम क्यूँँ मुंडेरों और छज्जों पर उतर आए हैं तारे क्या हज़ारों साल गुज़रे फिर भी जब आती है दिवाली महल हो चाहे कुटिया सब पे छा जाती है दिवाली इसी दिन द्रौपदी ने कृष्ण को भाई बनाया था वचन के देने वाले ने वचन अपना निभाया था जनम दिन लक्ष्मी का है भला इस दिन का क्या कहना यही वो दिन है जिस ने राम को राजा बनाया था कई इतिहास को एक साथ दोहराती है दिवाली मोहब्बत पर विजय के फूल बरसाती है दिवाली गले में हार फूलों का चरण में दीप-मालाएँ मुकुट सर पर है मुख पर ज़िंदगी की रूप-रेखाएँ लिए हैं कर में मंगल-घट न क्यूँँ घट घट पे छा जाएँ अगर परतव पड़े मुर्दा-दिलों पर वो भी जी जाएँ अजब अंदाज़ से रह रह के मस़्काती है दिवाली मोहब्बत की लहर नस नस में दौड़ाती है दिवाली तुम्हारा हूँ तुम अपनी बात मुझ से क्यूँँ छुपाते हो मुझे मालूम है जिस के लिए चक्कर लगाते हो बनारस के हो तुम को चाहिए त्यौहार घर करना बुतों को छोड़ कर तुम क्यूँँ इलाहाबाद जाते हो न जाओ ऐसे में बाहर 'नज़ीर' आती है दिवाली ये काशी है यहीं तो रंग दिखलाती है दिवाली

Nazeer Banarasi

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"छुटे हुए पुरुष" प्रेम में छुटे हुए कुछ पुरुष पुरुष नहीं रहते वो हो जाते हैं स्त्री वो ख़ुद को भर लेते हैं भावुकता और आँसू से प्रेम में छुटे पुरुष प्राप्त कर कर लेते स्त्रीत्व के उस गुण को जिस में होता है मीरा सा पागलपन राधा सा निःस्वार्थ प्रेम वो चुनते हैं मीरा या राधा हो जाना या हो जाना दोनों ही दोनों हो जाना अत्यधिक दुःखद है उसे सहन करनी होती हैं तब दोनों ही पीड़ा राधा जिस के बगैर कृष्ण नाम अधूरा है परन्तु फिर भी राधा के हिस्से आता है वियोगी जीवन और वो चुन लेती है कृष्ण की यादों के साथ जीवन निर्वाह मीरा जिस के बगैर कृष्ण कोई भगवान नहीं और मीरा को मिलता है तिरस्कृत जीवन और अंतिम स्वांस तक वो चुनती है कृष्ण भक्ति दोनों ही अनंत प्रेम की पर्याय हैं जो बताता है अथाह या निःस्वार्थ प्रेम सदैव एक तरफ़ा रहा है वो नहीं प्राप्त कर पाता रुक्मणि होना राधा की भाँति मीरा ने नहीं स्वीकार किया प्रेमिका बने रहना और उस ने कृष्ण को पति कहा राधा हो जाना दुःखद तो है मीरा हो जाना अत्यंत दुःखद मैं भी तुम्हारे प्रेम में छूटा एक पुरुष हूँ

Navneet Vatsal Sahil

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"तुम भी इक दरिया हो" ज़िन्दगी यूँ भी ख़ूब-सूरत है. किनारे पर बैठे-बैठे दरिया में जाते हुए लोगों को देखते रहना मगर दरिया में न जाना, मौजो को दूर से देखना मगर छूने की कोशिश न करना दिल लाख कहे, "चल हम भी एक बार छूते हैं ना !" मगर मैं जानता हूँ मौज आख़िर को मौज है और दरिया दरिया! तुम भी इक दरिया के जैसी हो मैं किनारे पर ही ठीक हूँ

Navneet Vatsal Sahil

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"इक जादुई लफ़्ज़" ना आप था ना तुम था ना तू था कभी नाम नहीं लिए हम ने एक दूसरे के फिर भी कितनी बातें होतीं थीं इक लफ़्ज़ था लफ़्ज़ क्या था जान जान और जान था ये लफ़्ज़ महज़ इक लफ़्ज़ नहीं था इस इक लफ़्ज़ में कितना कुछ था इस में वो सब कुछ था जो हमें एक दूसरे से चाहिए था इस में वो सारे वाइदे थे जो लोग मिलते वक़्त करते हैं वो सारी क़स में थीं जो बिछड़ते वक़्त के लिए थीं ये लफ़्ज़ महज़ इक लफ़्ज़ नहीं था इस इक लफ़्ज़ में कितना कुछ था जानते हो दोस्त ये लफ़्ज़ महज़ क़स में-ओ-वायदे ही ना था एक वाकया था पूरा हमारी मोहब्बत का ये इक ऐसा लफ़्ज़ था जिस में सांसें थीं जो अकेला सारे ठंडे लफ़्ज़ों के बीच गर्म था ज़िन्दा लफ़्ज़ था इक वही तो गवाह था हम मोहब्बत में कितने सच्चे थे एक ऐसा लफ़्ज़ जिसे बोलते हुए अपना बदन ख़ुश्बूओं की क़बा लगती पेड़ नाचते लगते और हवा बहकती लगती ये लफ़्ज़ महज़ इक लफ़्ज़ नहीं था इस इक लफ़्ज़ में कितना कुछ था एक ऐसा लफ़्ज़ जिस का सुकून बोलने से ज़्यादा सुनने में आता कानों में मिश्री घोलती उस की आवाज़ के साथ जब ये लफ़्ज़ मिलता बदन सर-सरा उठता कलियाँ ख़ुद ही भँवरो से बोसे लेने को मचल उठतीं लगता मानो ज़िन्दगी दूर तलक सिर्फ़ छाँव है मानो सारी काइ‌नात सिर्फ़ मुझ पर मेहरबान थी अब ऐसे आलम में कभी जान ना पाया ये छाँव सिर्फ़ मुझ पर मेहमान थी पर ये लफ़्ज़ हैराँ हूँ अभी तलक सुनाई देता है

Navneet Vatsal Sahil

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"नाकाम कोशिश" कभी कभी ऐसा भी होता है अक्सर सिगरेट सुलगाकर भूल जाता हूँ मैं और चला जाता हूँ उस बीते हुए वक़्त में हमारी साथ बिताई यादों को समेटने सब कुछ समेटने की नाकाम कोशिश करता हुआ मैं भूल जाता हूँ सिगरेट ! उँगली जला चुकी होती है तब तक

Navneet Vatsal Sahil

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हिज्र की रातें हिज्र की रातें रातें नहीं होतीं हिज्र की रातें साँप होती हैं सियाह काले साँप जो शाम ढले बाहर निकलते हैं यादों के बिल से और शुरू कर देते हैं डसना ज़हर जब चढ़ने लगता है जिस्म ठंडा पड़ने लगता है धड़कन कभी इतनी तेज़ कि कमरा गूँजने लग जाए कभी इतनी धीमी कि नब्ज़ टटोलनी पड़ जाए साँसें इतनी बेचैन मानो दिया बुझने को हो और आख़िरी क़तरा बाक़ी हो तेल का दर्द ऐसा दिल में ख़ून के क़तरे आँखों से निकलने लगते हैं पर मौत नहीं आती यका यक आहिस्ता आहिस्ता लाती हैं हर एक ख़्वाहिश और एहसास को मारते हुए अंदरू लाश बनाते हुए हिज्र की रातें साँप होती हैं हिज्र की रातें रातें नहीं होतीं

Navneet Vatsal Sahil

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