मौज-ए-सहबा में तमन्ना के सफ़ीने खो कर नग़्मा ओ रक़्स की महफ़िल से जो घबरा के उठा एक हँसती हुई गुड़िया ने इशारे से कहा तुम जो चाहो तो मैं शब भर की रिफ़ाक़त बख़्शूँ जुम्बिश-ए-अबरू ने अल्फ़ाज़ की ज़हमत भी न दी नीम-वा आँखों में इक दावत-ए-ख़ामोश लिए यूँँ सिमट कर मिरी आग़ोश में आई जैसे भरी दुनिया में बस इक गोशा-ए-राहत था यही हम भी वीरान गुज़रगाहों पे चलते चलते घर तक आए तो कोई रंग-ए-तकल्लुफ़ ही न था दो बदन मिलते ही यूँँ हमदम-ए-देरीना बने तनदही-ए-शौक़ में दूरी का हर एहसास मिटा सुब्ह के साथ खुली आँख तो एहसास हुआ मेरे सीने में कोई चीज़ थी जो टूट गई देर से देख रही थी तिरी तस्वीर मुझे तेरे आरिज़ पे थी बहते हुए अश्कों की नमी तेरी ख़ामोश निगाहों में कोई शिकवा न था देखते देखते वीरानी-ए-दिल और बढ़ी तेरी तस्वीर को सीने से लगा कर पूछा किस तरब-ज़ार में आसूदा है ऐ राहत-ए-ज़ीस्त मुझे इन आग के शालों में कहाँ छोड़ गई
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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रात भर नर्म हवाओं के झोंके वक़्त की मौज रवाँ पर बहते तेरी यादों के सफ़ीने लाए कि जज़ीरों से निकल कर आए गुज़रा वक़्त का दामन था में तिरी यादें तिरे ग़म के साए एक इक हर्फ़-ए-वफ़ा की ख़ुश्बू मौजा-ए-गुल में सिमट कर आए एक इक अहद-ए-वफ़ा का मंज़र ख़्वाब की तरह गुज़रते बादल तेरी क़ुर्बत के महकते हुए पल मेरे दामन से लिपटने आए नींद के बार से बोझल आँखें गर्द-ए-अय्याम से धुँदलाए हुए एक इक नक़्श को हैरत से तकें लेकिन अब उन से मुझे क्या लेना मेरे किस काम के ये नज़राने एक छोड़ी हुई दुनिया के सफ़ीर मेरे ग़म-ख़ाने में फिर क्यूँँ आए दर्द का रिश्ता रिफ़ाक़त की लगन रूह की प्यास मोहब्बत के चलन मैं ने मुँह मोड़ लिया है सब से मैं ने दुनिया के तक़ाज़े समझे अब मेरे पास कोई क्यूँँ आए रात भर नौहा-कुनाँ याद की बिफरी मौजें मेरे ख़ामोश दर ओ बाम से टकराती हैं मेरे सीने के हर इक ज़ख़्म को सहलाती है मुझे एहसास की उस मौत पर सह दे कर सुब्ह के साथ निगूँ सार पलट जाती है
Mahmood Ayaz
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खुली आँखों को कोई बंद कर दो खुली आँखों की वीरानी से हौल आता है कोई इन खुली आँखों को बढ़ कर बंद कर दो ये आँखें इक अनोखी यख़-ज़दा दुनिया की साकित रौशनी में खो गई हैं अब इन आँखों में कोई रंग पैदा है न कोई रंग पिन्हाँ है न कोई अक्स-ए-गुल-बन है न कोई दाग़-ए-हिर्मां है न गंज-ए-शाएगाँ की आरज़ू-ए-बे-निहायत है न रंज-ए-राएगाँ का अक्स-ए-लर्ज़ां है अगर कुछ है तो बस इक यख़-ज़दा नया का नक़्श-ए-जावेदाँ है ये आँखें अब शुआ-ए-आरज़ू की हर किरन से यूँँ गुरेज़ाँ हैं कि पत्थर बन गई हैं ये आँखें मर गई हैं
Mahmood Ayaz
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तुम ने मुझ से कोई इक़रार-ए-रिफ़ाक़त न किया ये न कहा तुम से बिछड़ जाऊँ तो ज़िंदा न रहूँ मैं ने तुम्हें ज़ीस्त का सरमाया मिरा हासिल-ए-यक-उम्र-ए-तमन्ना न कहा इस क़दर झूट से दहशत-ज़दा थे हम कि कोई सच न कहा मैं ने बस इतना कहा देखो हम और तुम इस आग का हिस्सा हैं जो ख़ाशाक की मानिंद जलाती है हमें तुम ने बस इतना कहा देखो इस आग में हम दोनों अकेले भी हैं साथी भी हैं और हम करते रहे उम्र-ए-मह-ओ-साल के ज़ख़्मों का शुमार कहकशाँ फीकी है कुछ देर का मेहमान है चाँद डूबती रात में ढलते हुए साए चुप हैं मेरी शिरयानों में यख़-बस्ता लहू हैराँ है अव्वलीं क़ुर्ब की ये आँच कहाँ से आई अजनबी कैसे कहूँ तुम तो मिरे दिल के निहाँ-ख़ाने में सोए हुए हर ख़्वाब का चेहरा निकले
Mahmood Ayaz
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यूँँ रग ओ पय में अजल उतरी है हाथ साकित हैं दुआ क्या माँगे आँख ख़ामोश है, क्या देखेगी होंट ख़्वाबीदा हैं क्या बोलेंगे एक सन्नाटा अबद-ताबा-अबद जोहद-ए-यक-उम्र का हासिल ठहरे दर्द का शो'ला रग-ए-जाँ का लहू जिंस-ए-बे-माया थे बे-माया रहे तीरा ख़ाक उन की ख़रीदार बने निकहत-ए-गुल की तरह आवारा बू-ए-जाँ वुसअत-ए-आफ़ाक़ में गुम यक कफ़-ए-ख़ाक है वो भी कब तक? सुब्ह की ओस से आँखें धो लो कमरे से झाँक के बाहर देखो ऐसे मसरूफ़ तग-ओ-ताज़ हैं सब जैसे कल उन के मुक़द्दर में नहीं मैं तमाशाई हूँ हर मंज़र का जैसे कल मेरे मुक़द्दर में नहीं
Mahmood Ayaz
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गुज़रे हुए माह ओ साल के ग़म तन्हाई शब में जाग उट्ठे हैं उम्र-ए-रफ़्ता की जुस्तुजू में अश्कों के चराग़ जल रहे हैं आसाइश-ए-ज़िंदगी की हसरत माज़ी का नक़्श बन चुकी है हालात की ना-गुज़ीर तल्ख़ी एक एक नफ़स में बस गई है नाकामी-ए-आरज़ू को दिल ने तस्लीम ओ रज़ा के नाम बख़्शे मिलने की ख़ुशी बिछड़ने का ग़म क्या क्या थे फ़रेब-ए-ज़िंदगी के इक उम्र में अब समझ सके हैं ख़ुशियों का फ़ुसूँ गुरेज़ पा है अब तर्क दुआ की मंज़िलें हैं दामान-ए-तलब सिमट चुका है नाकामी-ए-शौक़ मिटते मिटते जीने का शुऊर दे गई है ये ग़म है नवाए शब का हासिल ये दर्द मता-ए-ज़िंदगी है उजड़ी हुई हर रविश चमन की देती है सुराग़ रंग ओ बू का वीरान हैं ज़िंदगी की राहें रौशन है चराग़ आरज़ू का
Mahmood Ayaz
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