फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूटी हों अफ़्साने हों फ़र्ज़ करो ये जी की बिपता जी से जोड़ सुनाई हो फ़र्ज़ करो अभी और हो इतनी आधी हम ने छुपाई हो फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूँढ़े हम ने बहाने हों फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सच-मुच के मय-ख़ाने हों फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूटा झूटी पीत हमारी हो फ़र्ज़ करो इस पीत के रोग में साँस भी हम पर भारी हो फ़र्ज़ करो ये जोग बजोग का हम ने ढोंग रचाया हो फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो देख मिरी जांकह गए बाहू कौन दिलों की जाने 'हूँ' बस्ती बस्ती सहरा सहरा लाखों करें दिवाने 'हूँ' जोगी भी जो नगर नगर में मारे मारे फिरते हैं कासा लिए भबूत रमाए सब के द्वारे फिरते हैं शाइ'र भी जो मीठी बानी बोल के मन को हरते हैं बंजारे जो ऊंचे दामों जी के सौदे करते हैं इन में सच्चे मोती भी हैं, इन में कंकर पत्थर भी इन में उथले पानी भी हैं, इन में गहरे सागर भी गोरी देख के आगे बढ़ना सब का झूटा सच्चा 'हूँ' डूबने वाली डूब गई वो घड़ा था जिस का कच्चा 'हूँ'
Related Nazm
"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
111 likes
क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
42 likes
"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
50 likes
दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
66 likes
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
54 likes
More from Ibn E Insha
ऐ मतवालो नाक़ों वालो देते हो कुछ उस का पता नज्द के अंदर मजनूँ नामी एक हमारा भाई था आख़िर उस पर क्या कुछ बीती जानो तो अहवाल कहो मौत मिली या लैला पाई? दीवाने का मआल कहो अक़्ल की बातें कहने वाले दोस्तों ने उसे समझाया उस को तो लेकिन चुप सी लगी थी ना बोला ना बाज़ आया ख़ैर अब उस की बात को छोड़ो दीवाना फिर दीवाना जाते जाते हम लोगों का एक संदेसा ले जाना आवारा आवारा फिरना छोड़ के मंडली यारों की देख रहे हैं देखने वाले 'इंशा' का अब हाल वही क्या अच्छा ख़ुश-बाश जवाँ था जाने क्यूँँ बीमार हुआ उठते बैठते मीर की बैतें पढ़ना उस का शिआर हुआ तौर-तरीक़ा उखड़ा-उखड़ा चेहरा पीला सख़्त मलूल राह में जैसे ख़ाक पे कोई मसला मसला बाग़ का फूल शाम सवेरे बाल बिखेरे बैठा बैठा रोता है नाक़ों वालो! इन लोगों का आलम कैसा होता है अपना भी वो दोस्त था हम भी पास उस के बैठ आते हैं इधर उधर के क़िस्से कह के जी उस का बहलाते हैं उखड़ी-उखड़ी बात करे है भूल के अगला याराना कौन हो तुम किस काम से आए? हम ने न तुम को पहचाना जाने ये किस ने चोट लगाई जाने ये किस को प्यार करे तुम्हीं कहो हम किस को ढूँडें आहें खींचे नाम न ले पीत में ऐसे जान से यारो कितने लोग गुज़रते हैं पीत में नाहक़ मर नहीं जाते पीत तो सारे करते हैं ऐ मतवालो नाक़ों वालो! नगरी नगरी जाते हो कहीं जो उस की जान का बैरी मिल जाए ये बात कहो चाक-गिरेबाँ इक दीवाना फिरता है हैराँ हैराँ पत्थर से सर फोड़ मरेगा दीवाने को सब्र कहाँ तुम चाहो तो बस्ती छोड़े तुम चाहो तो दश्त बसाए ऐ मतवालो नाक़ों वालो वर्ना इक दिन ये होगा तुम लोगों से आते जाते पूछेंगे 'इंशा' का पता
Ibn E Insha
0 likes
लब पर नाम किसी का भी हो, दिल में तेरा नक़्शा है ऐ तस्वीर बनाने वाली जब से तुझ को देखा है बे-तेरे क्या वहशत हम को, तुझ बिन कैसा सब्र ओ सुकूँ तू ही अपना शहर है जानी तू ही अपना सहरा है नीले पर्बत ऊदी धरती, चारों कूट में तू ही तू तुझ से अपने जी की ख़ल्वत तुझ से मन का मेला है आज तो हम बिकने को आए, आज हमारे दाम लगा यूसुफ़ तो बाज़ार-ए-वफ़ा में, एक टिके को बिकता है ले जानी अब अपने मन के पैराहन की गिर्हें खोल ले जानी अब आधी शब है, चार तरफ़ सन्नाटा है तूफ़ानों की बात नहीं है, तूफ़ाँ आते जाते हैं तू इक नर्म हवा का झोंका, दिल के बाग़ में ठहरा है या तू आज हमें अपना ले, या तू आज हमारा बन देख कि वक़्त गुज़रता जाए कौन अबद तक जीता है फ़र्दा महज़ फ़ुसूँ का पर्दा, हम तो आज के बंदे हैं हिज्र ओ वस्ल, वफ़ा और धोका सब कुछ आज पे रक्खा है
Ibn E Insha
0 likes
यूँँ कहने को राहें मुल्क-ए-वफ़ा की उजाल गया इक धुँद मिली जिस राह में पैक-ए-ख़याल गया फिर चाँद हमें किसी रात की गोद में डाल गया हम शहर में ठहरें, ऐसा तो जी का रोग नहीं और बन भी हैं सूने उन में भी हम से लोग नहीं और कूचे को तेरे लौटने का तो सवाल गया तिरे लुत्फ़-ओ-अता की धूम सही महफ़िल महफ़िल इक शख़्स था इंशा नाम-ए-मोहब्बत में कामिल ये शख़्स यहाँ पामाल रहा, पामाल गया तिरी चाह में देखा हम ने ब-हाल-ए-ख़राब इसे पर इश्क़ ओ वफ़ा के याद रहे आदाब इसे तिरा नाम ओ मक़ाम जो पूछा, हँस कर टाल गया इक साल गया, इक साल नया है आने को पर वक़्त की भी अब होश नहीं दीवाने को दिल हाथ से इस के वहशी हिरन की मिसाल गया हम अहल-ए-वफ़ा रंजूर सही, मजबूर नहीं और शहर-ए-वफ़ा से दश्त-ए-जुनूँ कुछ दूर नहीं हम ख़ुश न सही, पर तेरे सर का वबाल गया अब हुस्न के गढ़ और शहर-पनाहें सूनी हैं वो जो आश्ना थे उन सब की निगाहें सूनी हैं पर तू जो गया हर बात का जी से मलाल गया
Ibn E Insha
0 likes
तीन हमारी बहनें छोटी मिल कर खाएँ आधी रोटी ना पतली ना बिल्कुल मोटी मीदू इन में सब से छोटी मीदू ने इक तोता पाला उस तोते का रंग निराला नीचे नीला ऊपर काला टिड्डे ऐसी आँखों वाला इस तोते की हुई चढ़ाई दिन भर कर के मग़्ज़ खपाई शाम को दी मीदू ने दुहाई इस तोते को लेना भाई लाख पढ़ाएँ ख़ाक न बोले दुम न हिलाए चोंच न खोले बहुत कहो तो हौले हौले फ़र्श पे मारे रह रह ठोले भाई ने सोचा उस को बुलाएँ छेड़ा जो उस को दाएँ बाएँ तोता बोला काएँ काएँ मीदू बोली हाएँ हाएँ मैं ने इस को तोता समझा ये तोता तो कव्वा निकला इस कव्वे की दुम में तागा इस के पीछे छोड़ो कुत्ता
Ibn E Insha
0 likes
चाँद कब से है सर-ए-शाख़-ए-सनोबर अटका घास शबनम में शराबोर है शब है आधी बाम सूना है, कहाँ ढूँडें किसी का चेहरा (लोग समझेंगे कि बे-रब्त हैं बातें अपनी) शे'र उगते हैं दुखी ज़ेहन से कोंपल कोंपल कौन मौसम है कि भरपूर हैं ग़म की बेलें दूर पहुँचे हैं सरकते हुए ऊदे बादल चाँद तन्हा है (अगर उस की बलाएँ ले लें?) दोस्तो जी का अजब हाल है, लेना बढ़ना चाँदनी रात है कातिक का महीना होगा मीर-ए-मग़्फ़ूर के अश'आर न पैहम पढ़ना जीने वालों को अभी और भी जीना होगा चाँद ठिठका है सर-ए-शाख़-ए-सनोबर कब से कौन सा चाँद है किस रुत की हैं रातें लोगों धुँद उड़ने लगी बुनने लगी क्या क्या चेहरे अच्छी लगती हैं दिवानों की सी बातें लोगों भीगती रात में दुबका हुआ झींगर बोला कसमसाती किसी झाड़ी में से ख़ुश्बू लपकी कोई काकुल कोई दामन, कोई आँचल होगा एक दुनिया थी मगर हम से समेटी न गई ये बड़ा चाँद चमकता हुआ चेहरा खोले बैठा रहता है सर-ए-बाम-ए-शबिस्ताँ शब को हम तो इस शहर में तन्हा हैं, हमीं से बोले कौन इस हुस्न को देखेगा ये इस से पूछो सोने लगती है सर-ए-शाम ये सारी दुनिया इन के हुजरों में न दर है न दरीचा कोई इन की क़िस्मत में शब-ए-माह को रोना कैसा इन के सीने में न हसरत न तमन्ना कोई किस से इस दर्द-ए-जुदाई की शिकायत कहिए याँ तो सीने में नियस्तां का नियस्तां होगा किस से इस दिल के उजड़ने की हिकायत कहिए सुनने वाला भी जो हैराँ नहीं, हैराँ होगा ऐसी बातों से न कुछ बात बनेगी अपनी सूनी आँखों में निराशा का घुलेगा काजल ख़ाली सपनों से न औक़ात बनेगी अपनी ये शब-ए-माह भी कट जाएगी बे-कल बे-कल जी में आती है कि कमरे में बुला लें इस को चाँद कब से है सर-ए-शाख़-ए-सनोबर अटका रात उस को भी निगल जाएगी बोलो बोलो बाम पर और न आएगा किसी का चेहरा
Ibn E Insha
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Ibn E Insha.
Similar Moods
More moods that pair well with Ibn E Insha's nazm.







