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“ग़म का क्या करूँ” बरसों पुराने ज़ख़्म पे मरहम का क्या करूँ ये साल तो नया है मगर ग़म का क्या करूँ या तो कोई नई सी दवा दो बता मुझे या फिर नया सा ज़ख़्म ही कर दो अता मुझे इस ज़िन्दगी को ख़त्म किया भी न जा रहा ज़िंदा तो हूँ मगर यूँॅं जिया भी न जा रहा अब और साँस मुझ सेे लिया भी न जा रहा जीने का अब दिखावा किया भी न जा रहा ऐसा करो कि पीछे छूट जाए ग़म मेरा या फिर करो ऐसा की टूट जाए दम मेरा इस बार मेरे दर्द को बरकत भी चाहिए मशहूर हो सके इसे ज़िल्लत भी चाहिए इस को दर–ओ–दीवार नया छत भी चाहिए जर्जर ये हो गया है मरम्मत भी चाहिए तुम शौक़ से मनाओ नए साल की ख़ुशी मुझ को ये सोचने दो कि इस ग़म का क्या करूँ बरसों पुराने ज़ख़्म पे मरहम का क्या करूँ ये साल तो नया है मगर ग़म का क्या करूँ

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद-ए-बेवफ़ा" बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा बे-वफ़ा ऐ मेरी बे वफ़ा याद आएँगी मुझ को तेरी हर जफ़ा क्या से क्या हो गया मैं तेरे प्यार में दिल लगाया था तुझ सेे यूँँ बेकार में प्यार करना भी इक ज़ुर्म है और ख़ता प्यार ज़्यादा मैं करता हूँ तुझ सेे फ़क़त मैं ने नफ़रत न की तुझ सेे जाँ आज तक वो सबब तू बता क्यूँ किया अलविदा सर झुका कर के माँगा था तुझ को सनम तू न मुझ को मिला हो गई आँखें नम तुझ को आबाद रक्खे मेरा वो ख़ुदा तेरी यादों को दिल में बसाऊँगा मैं ये तो मुमकिन नहीं भूल जाऊँगा मैं याद करता है 'दानिश' ये तुझ को सदा

Danish Balliavi

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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“वो ही तुम हो” मेरी शा'इरी मेरे लफ़्ज़ों में गुम हो जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो ये उजला सा पन्ना है चेहरा तुम्हारा ये नुक़्ता ये बिंदू है गहना तुम्हारा किताबों से आए तुम्हारी ही ख़ुशबू सुख़न में तुम्हीं से है लफ़्ज़ों का जादू ये मेरी क़लम उँगलियाँ हैं तुम्हारी बयाज़ों की दफ़्ती हैं बाहें तुम्हारी मेरे ज़िस्त के हर वरक़ में भी गुम हो जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो ग़ज़ल है तुम्हारे बयाँ का तरीका ये बहरों ने सीखा है तुम सेे सलीक़ा सियाही है आँखों का काज़ल तुम्हारा ये मत्ला ये मक़्ता है आँचल तुम्हारा है मिसरा–ए–ऊला तुम्हारी जवानी तुम्हारे ही लब हैं ये मिस्रा–ए–सानी तख़ल्लुस में मेरे तलफ़्फ़ुज़ सा गुम हो जो मैं लिख रहा अस्ल में वो ही तुम हो

SHIV SAFAR

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“अब तू नहीं” अब मेरे पास तू नहीं रहती तेरी यादों ने घेर रक्खा है इस भरोसे पे मैं भी बैठा था अब मेरी पूरी आरज़ू होगी मेरी जानिब को मुस्कुराती हुई तेरी यादों के पीछे तू होगी मैं बहुत देर तक था बैठा रहा अब्र छाने लगे थे आँखों पे ग़ौर ख़ुद पर किया तो क्या पाया मेरी आँखों में चंद आँसू थे यादें मुझ को रुला के चल भी गईं और मुझ को ख़बर हुई ही नहीं बावजूद इस के मैं वहीं बैठा था जाने अब मुझ को देखना क्या था मैं ख़यालों से होश में जब आया ख़ुद को फिर से मैं तन्हा ही पाया कल तू फिर याद मुझ को आएगी फिर मैं उम्मीद ले के बैठूँगा कल रुलाएँगी फिर तेरी यादें फिर से तन्हा मैं ख़ुद को पाऊँगा फिर भी वा'दा है तेरी यादों से चैन मुझ को न अब कहीं होगा जब तलक आ न जाएगी तू ख़ुद सिलसिला ख़त्म ये नहीं होगा अब मेरे पास तू नहीं रहती तेरी यादों ने घेर रक्खा है

SHIV SAFAR

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“तवज्जोह” मैं सुनाता हूँ एक नज़्म उस पे जिस का उनवान उस का नाम ही है और इस तरह नज़्म ख़त्म हुई शुक्रिया आप की तवज्जोह का

SHIV SAFAR

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"घास" मुझे नहीं बनना है कोई छायादार वृक्ष न ही किसी सुगंधित और ख़ूब-सूरत फूल का पौधा जिसे उखाड़ के फेंका जा सके मुझे बनना है वो हरी और मुलाएम घास तुम्हारे दिल की ज़मीन पर जो मौसमों की मार से हवा से धूप से जाड़े से गर्मी से और बारिश से हर बार तुम में ही नष्ट हो और तुम में ही उगे मुझे नहीं चाहिए तुम सेे कभी कभी मुलाक़ातों वाली मौसमी सिंचाई मुझे चाहिए तुम्हारे साथ की ओस भरी बूँदें जो हर सुब्ह मुझे और ज़्यादा तुम्हारा बनाए हाँ मुझे बनना है तुम्हारे दिल की ज़मीन पर वो हरी और मुलाएम घास जो तुम्हारी और सिर्फ़ तुम्हारी ही होकर रह जाए

SHIV SAFAR

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“जन्म-दिन” ज़िंदगी का हर इक दिन हँसाता रहे जन्म-दिन आप का रोज़ आता रहे चाँद तारों के गुब्बारे कमरे में हो सब हक़ीक़त बने जो भी सपने में हो काटना केक अपने ग़मों का बना फ़िक्र की मोमबत्ती को भी फूँकना आसमाँ से फ़रिश्ते, परी आएँगे ख़ूब भर भर के वो तोहफ़े भी लाएँगे फिर बजाएँगे मिल कर सभी तालियाँ गाएँगे जुगनुएँ नाचेंगी तितलियाँ फूलों के जैसे मन मुस्कुराता रहे जन्म-दिन आप का रोज़ आता रहे

SHIV SAFAR

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