nazmKuch Alfaaz

ये मौसम है उमंगों का तरंगों का ज़माना है चमन के फूल हैं हम काम अपना मुस्कुराना है क़दम जो भी उठाना है तरक़्क़ी का उठाना है सितारों की तरह इक दिन फ़लक पर जगमगाना है गले में डाल कर बाँहें ख़ुशी के गीत गाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है मिले आधी अगर रोटी तो हम उतनी ही खाएँगे मुसीबत जो पड़े सर पर ख़ुशी से झेल जाएँगे जो पढ़ना सीख जाएँगे तो औरों को पढ़ाएँगे जो रस्ते में भटकते हैं उन्हें मंज़िल दिखाएँगे मोहब्बत का दिया हर मोड़ पर हम को जलाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है नहीं है इल्म से बढ़ कर जहाँ में कोई भी दौलत यही है नूर आँखों का दिलों की है यही राहत ये वो शय है लगा सकता नहीं जिस की कोई क़ीमत बग़ैर इस के न मिल पाएगी दुनिया में कोई इज़्ज़त उठो जल्दी अगर ता'लीम का दरिया बहाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है जहालत का अँधेरा अक़्ल से मा'ज़ूर करता है जो दिल की आँख है उस को यही बे-नूर करता है बना देता है ये शैताँ ख़ुदा से दूर करता है हमें दर दर भटकने के लिए मजबूर करता है जिसे ता'लीम कहते हैं कि वो हिकमत का ख़ज़ाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को

Allama Iqbal

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सफ़ेद शर्ट थी तुम सीढ़ियों पे बैठे थे मैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुए हमारी पहली मुलाक़ात याद है ना तुम्हें? इशारे करते थे तुम मुझ को आते जाते हुए तमाम रात को आँखें न भूलती थीं मुझे कि जिन में मेरे लिए इज़्ज़त और वक़ार दिखे मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिन तुम एक बार दिखे और बेशुमार दिखे मुझे ये डर था कि तुम भी कहीं वो ही तो नहीं जो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग़ छोड़ते हैं ख़ुदा का शुक्र कि तुम उन सेे मुख़्तलिफ़ निकले जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं ज़ियादा वक़्त न गुज़रा था इस तअल्लुक़ को कि उस के बा'द वो लम्हा करीं करीं आया छुआ था तुम ने मुझे और मुझे मोहब्बत पर यक़ीन आया था लेकिन कभी नहीं आया फिर उस के बा'द मेरा नक़्शा-ए-सुकूत गया मैं कश्मकश में थी तुम मेरे कौन लगते हो मैं अमृता तुम्हें सोचूँ तो मेरे साहिर हो मैं फ़ारिहा तुम्हें देखूँ तो जॉन लगते हो हम एक साथ रहे और हमें पता न चला तअल्लुक़ात की हद बंदियाँ भी होती हैं मोहब्बतों के सफ़र में जो रास्ते हैं वहीं हवस की सिम्त में पगडंडियाँ भी होती हैं तुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है 'हाफ़ी' तुम्हें ये काश मैं सब कुछ कभी बता पाती और अब मज़ीद न मिलने की कोई वजह नहीं बस अपनी माँ से मैं आँखें नहीं मिला पाती

Tehzeeb Hafi

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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किसी कव्वे ने इक कोयल से पूछा बता बहना कि है ये माजरा क्या ग़ज़ब है ये कि हम दोनों हैं काले ख़ुदा के फ़ज़्ल से हैं अक़्ल वाले मगर दुनिया करे क्यूँँ प्यार तुझ से रहें छोटे बड़े बेज़ार मुझ से तिरा ही नाम है सब की ज़बाँ पर तिरा जादू तो है सारे जहाँ पर जो शाइ'र हैं लिखें तेरा तराना बता तेरा है क्यूँँ आशिक़ ज़माना रहा करती है तू बच्चों के दिल में मगर इक मैं कि चूहा जैसे बिल में जहाँ जा कर करूँँ मैं काएँ काएँ वहाँ से मार कर मुझ को भगाएँ नज़र में तीर और तलवार बन कर खटकता हूँ दिलों में ख़ार बन कर जिसे देखो उसे मुझ से है वहशत सभी को नाम से मेरे है नफ़रत कहा कोयल ने कव्वे से कि भाई न क्यूँँ तेरी समझ में बात आई जिसे आती न हो शीरीं-बयानी करे क्या वो दिलों पर हुक्मरानी हैं सब उस के जो मीठे बोल बोले जो लब खोल तो रस कानों में घोले कहाँ मैं बोलने में चूकती हूँ मगर जब बोलती हूँ कूकती हूँ मिरी आवाज़ में फूलों की नर्मी तिरी आवाज़ में शोलों की गर्मी ज़बाँ से मैं बनी आँखों का तारा मगर तेरी ज़बाँ ने तुझ को मारा तू जिस दिन सीख लेगा ख़ुश-कलामी मिलेगी हर जगह तुझ को सलामी

Zafar Kamali

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आता है याद मुझ को स्कूल का ज़माना वो दोस्तों की सोहबत वो क़हक़हे लगाना अनवर अज़ीज़ राजू मुन्नू के साथ मिल कर वो तालियाँ बजाना बंदर को मुँह चिड़ाना रो रो के माँगना वो अम्मी से रोज़ पैसे जा जा के होटलों में बर्फ़ी मलाई खाना पढ़ने को जब भी घर पर कहते थे मेरे भाई करता था दर्द-ए-सर का अक्सर ही मैं बहाना मिलती नहीं थी फ़ुर्सत दिन रात खेलने से यूँँ राएगाँ हुआ था पढ़ने का वो ज़माना कैसे कहूँ किसी से अब क्या है हाल मेरा खाने को मुश्किलों से मिलता है एक दाना हर इक क़दम पे लगती है ठोकरों पे ठोकर जा कर रहूँ कहाँ पर मिलता नहीं ठिकाना अफ़सर बने हैं इस दम मेरे ही हम-जमाअत उन से हया के मारे पड़ता है मुँह छुपाना बच्चो न तुम समझना हरगिज़ इसे कहानी ये है तुम्हारे हक़ में इबरत का ताज़ियाना होगा भला तुम्हारा सुन लो 'ज़फ़र' की बातें खेलो ज़रूर लेकिन पढ़ने में दिल लगाना

Zafar Kamali

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गरचे पौदा अभी हूँ छोटा सा आरज़ू दिल में है मिरे क्या क्या आ ही जाएगी रुत जवानी की या'नी मुझ पर भी शादमानी की डाली डाली मिरी हरी होगी और फल फूल से भरी होगी फ़ैज़ होगा जहाँ में आम मिरा ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ होगा काम मिरा सारी चिड़ियों को मैं बुलाऊँगा ख़ूब मेवे उन्हें खिलाऊँगा घोंसले मुझ पे वो बनाएँगी राग छेड़ेंगी चहचहाएँगी जो भी आएगा उन का करने शिकार मेरे पत्तों की देखेगा दीवार गर्मियों में मुसाफ़िर आएँगे मेरे साए में चैन पाएँगे बच्चे आएँगे झूला झूलेंगे गीत गा के ख़ुशी में फूलेंगे वो चलाएँगे मुझ पे जब पत्थर इस के बदले मैं इन को दूँगा समर एक ख़्वाहिश है और दिल में बड़ी काश वो भी करे ख़ुदा पूरी सूख जाऊँ तो लकड़ियों से मिरी ख़ूब-सूरत सी इक बने कुर्सी उस पे बैठे फ़क़त वही लड़का जिस के सर में हो इल्म का सौदा दिल में अपने जो मैं ने ठानी है उस की ये मुख़्तसर कहानी है मैं भी बच्चा हूँ तुम भी बच्चे हो मैं भी सच्चा हूँ तुम भी सच्चे हो क्या बनाया है ज़िंदगी का प्लान मैं तो रखता हूँ तुम से नेक गुमान आज छोटे हो कल जो होगे जवाँ कौन से काम तुम करोगे यहाँ

Zafar Kamali

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हम को है फ़ख़्र इस पर हम हैं शरीर बच्चे माहिर हैं अपने फ़न में हम बे-नज़ीर बच्चे पिल्ले को घर में लाएँ बाँहों में हम जकड़ कर मौक़ा मिले तो खींचें बिल्ली की दुम पकड़ कर देखें अगर गधे को दाग़ें उसे सलामी अपना जो बस चले तो उस की करें ग़ुलामी बकरे पे बैठ कर हम गलियों में रोज़ घू में चूँ-चूँ करे जो चूज़ा उस को ज़रूर चू में बिस्तर की सब्ज़ चादर ख़रगोश को उढ़ा दें मुन्नू की लाल टोपी बकरे को हम पहना दें दादा-मियाँ का चश्मा आँखों में हम लगा कर रस्ता चलें कमर को अपनी ज़रा झुका कर आया नसीहतों पर हम को न कान देना मुर्गों के साथ मिल कर भाए अज़ान देना बाजी का हर दुपट्टा अपना बने अमामा जोकर बनें पहन कर भय्या का पाएजामा सोफ़ों पे ख़ूब कूदें ऊधम बहुत मचाएँ मिल जाए जो कनस्तर फिर ढोल हम बजाएँ गर्मी की दोपहर में बाग़ों की ख़ाक फाँकें चिड़ियों के घोंसलों में जा जा के रोज़ झांकें अमरूद हों जो कच्चे उन को ज़रूर तोड़ें सब काम छूट जाए ये काम हम न छोड़ें पानी में रंग घोलें उस का बनाएँ शर्बत पेड़ों पे चढ़ के बैठें समझें उसे ही पर्बत कुत्ते को देखते ही दौड़ाएँ ले के डंडा अपनी बहादुरी का लहराएँ ख़ूब झंडा यारों के साथ मिल कर क़व्वालियाँ भी गाएँ तबला बजाएँ मुँह से और तान भी उड़ाएँ इंसाफ़-वर हैं जितने वो इस को मानते हैं दुनिया की हर शरारत हम ख़ूब जानते हैं हम को है फ़ख़्र इस पर हम हैं शरीर बच्चे माहिर हैं अपने फ़न में हम बे-नज़ीर बच्चे

Zafar Kamali

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समझता है इसे सारा ज़माना किताबें इल्म-ओ-हिकमत का ख़ज़ाना दिलों का नूर हैं अच्छी किताबें चराग़-ए-तूर हैं अच्छी किताबें हमारी मूनिस ओ ग़म-ख़्वार हैं ये जिहाद-ए-इल्म की ललकार हैं ये किताबें क्या हैं रूहानी ख़ुदा हैं सकूँ दिल का दवाओं की दवा हैं हमारी क्यूँँ न हो मंज़िल किताबें रसूलों पर हुईं नाज़िल किताबें किताबों से है जिस की आशनाई बड़ी दौलत जहाँ में उस ने पाई किताबें कामयाबी का हैं ज़ीना रखें आबाद ये दिल का मदीना किताबों की रिफ़ाक़त भी अजब है तअल्लुक़ तोड़ना इन से ग़ज़ब है सदाक़त का यही रस्ता दिखाएँ बुरों को भी यही अच्छा बनाएँ सिखाती हैं ये जीने का तरीक़ा बताती हैं हमें क्या है सलीक़ा किसी ने मुँह किताबों से जो फेरा यक़ीनन उस को ज़िल्लत ने है घेरा किताबों से अगर ख़ाली मकाँ है वो है भूतों का मस्कन घर कहाँ है किताबों से हलावत गुफ़्तुगू में शराफ़त का असर बाक़ी लहू में किताबों से जहाँ में नाम ज़िंदा हमारी सुब्ह ज़िंदा शाम ज़िंदा किताबों से सदा रिश्ता बढ़ाओ इसी में ज़िंदगी अपनी लगाओ

Zafar Kamali

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