समझता है इसे सारा ज़माना किताबें इल्म-ओ-हिकमत का ख़ज़ाना दिलों का नूर हैं अच्छी किताबें चराग़-ए-तूर हैं अच्छी किताबें हमारी मूनिस ओ ग़म-ख़्वार हैं ये जिहाद-ए-इल्म की ललकार हैं ये किताबें क्या हैं रूहानी ख़ुदा हैं सकूँ दिल का दवाओं की दवा हैं हमारी क्यूँँ न हो मंज़िल किताबें रसूलों पर हुईं नाज़िल किताबें किताबों से है जिस की आशनाई बड़ी दौलत जहाँ में उस ने पाई किताबें कामयाबी का हैं ज़ीना रखें आबाद ये दिल का मदीना किताबों की रिफ़ाक़त भी अजब है तअल्लुक़ तोड़ना इन से ग़ज़ब है सदाक़त का यही रस्ता दिखाएँ बुरों को भी यही अच्छा बनाएँ सिखाती हैं ये जीने का तरीक़ा बताती हैं हमें क्या है सलीक़ा किसी ने मुँह किताबों से जो फेरा यक़ीनन उस को ज़िल्लत ने है घेरा किताबों से अगर ख़ाली मकाँ है वो है भूतों का मस्कन घर कहाँ है किताबों से हलावत गुफ़्तुगू में शराफ़त का असर बाक़ी लहू में किताबों से जहाँ में नाम ज़िंदा हमारी सुब्ह ज़िंदा शाम ज़िंदा किताबों से सदा रिश्ता बढ़ाओ इसी में ज़िंदगी अपनी लगाओ
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"माँ" घर में माँ हो तो घर घर लगता है बिन माँ के जीना दूभर लगता है माँ का आँचल मीठी छाँव शजर की जो न हो तो जीवन बंजर लगता है तेरे होते फूलों का आंगन था और अब पाँव में पत्थर लगता है जब तू थी तो सारा जग अपना था पर अब इन अपनो से डर लगता है
Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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"तस्वीर-कशी" जाँ अब तिरी तस्वीर में जो आने लगी है गुल-पोश हसीं शाम को बहकाने लगी है तस्वीर तिरी दिल मिरा बहलाने लगी है उजड़े हुए गुलज़ार को महकाने लगी है मैं बात जो करता था तो हो जाती थी नाराज़ अब आँख झुका लेती है शर्माने लगी है जो मुझ से लगातार बचाती रही नज़रें अब मुझ पे नज़र डाल के मुस्काने लगी है जो हाथ लगाने पे रहा करती थी ख़ामोश अब शे'र सुनाती है ग़ज़ल गाने लगी है मैं इस की अदाओं पे रहा मस्त हमेशा अब ये मिरे अश'आर पे लहराने लगी है जो प्यार के लम्हात तिरे साथ गुज़ारे तस्वीर तिरी बारहा दोहराने लगी है कल तक जो बनी रहती थी दीवार की ज़ीनत अब दिल के हर इक गोशे को गरमाने लगी है आँखों में मिरी देख के तस्वीर ख़ुद अपनी क्या जानिए किस बात पे इतराने लगी है सीने को ढके रखता था जो रेशमी आँचल दो चार दिनों से उसे सरकाने लगी है इक रोज़ इसे यूँँ ही कहीं छेड़ दिया था ये मुझ को उसी रोज़ से उकसाने लगी है अब इस पे भी कुछ रंग तिरा चढ़ने लगा तो बल खा के मिरे सामने इठलाने लगी है ग़लती से जो है देख ली तस्वीर कोई और मुरझा के अब इस तरह वो ग़म खाने लगी है कल रात 'बशर' हम ने जो शाने को हिलाया कहने लगी सो जाओ कि नींद आने लगी है
Dharmesh bashar
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"ये हम किधर को चल रहे हैं" दरियाओं ने रुख़ मोड़ दिए दरख़्तों से हरे पत्ते झड़ रहे हैं कड़वी शराब के ख़ातिर यारों बेचारे मीठे फल सड़ रहे हैं ये हम किधर को चल रहे हैं नाव नहीं चलती अब बारिश में काग़ज़ के जहाज़ भी कहाँ उड़ते हैं बच्चों ने खिलौनों की ज़िद छोड़ दी अब वो सीधे कोडिंग सीखते हैं ये हम किधर को चल रहे हैं दौलत के नशे में इस हद तक चूर हैं अपनों के ख़ातिर अपनों से दूर हैं वक़्त-ओ-हालात के कारख़ाने में मालिक भी मजबूरी के मज़दूर है ये हम किधर को चल रहे हैं उपन्यास अब कोई नहीं ख़रीदता है दास्ताँ में लगते हैं वक़्त के महँगे ख़र्चे बाज़ार सारा मोबाइल खा डकार गया रोज़ कितनों के धंधे पड़ रहे हैं ठंडे ये हम किधर को चल रहे हैं शहरों में सब रखते हैं काम से काम काम कि मतलब से मतलब रखते हैं दौर दूरियों का और वक़्त फ़ासलों का गाँवों में भी कहाँ पहले से मेले पड़ते हैं ये हम किधर को चल रहे हैं फ़ेसबुक पर ठहरे यार दोस्त हज़ार ज़रूरत पड़ने पर गिनती के चार कोई ख़ून देने वाला नहीं मिलता है लाइक कमेंट करने वाले हैं बेशुमार ये हम किधर को चल रहे हैं उम्र-दराज़ दूसरी शादी कर रहे हैं कच्ची उम्र वाले ख़ुद-कुशी कर रहे हैं बात ये मज़ाक़ की नहीं, ग़ौर करने की है ज़िंदगी सिर्फ़ काट रहे हम या जी भी रहे हैं ये हम किधर को चल रहे हैं डाल बस्तों का बोझ बच्चों के कंधों पर लगा रखा है सब को किताबों की खोज में आज़ादी से पहले का हो या फिर बा'द का प्रेमचंद का वतन आज तलक सोज़ में ये हम किधर को चल रहे हैं नदी मैली लगती, झील में उतरने से डरते हैं तैरने के शौक़ीन स्विमिंग पूल को चलते हैं बेशक वक़्त की क़द्र पहले से काफ़ी बढ़ गई लेकिन घड़ी अब सिर्फ़ शौक़ से पहनते हैं ये हम किधर को चल रहे हैं बचपन छलाँग कर सीधे बड़े हो रहे हैं अधेड़ मर गए लोग सीधे बूढ़े हो रहे हैं परवाने माफ़िक़ शम्अ' को मचल रहे हैं दवा खा के भी कितने जल्दी जल रहे हैं ये हम किधर को चल रहे हैं
Jagveer Singh
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"फ़ैज़" मुझे तुम छोड़ कर फिर से न जाना दोबारा मैं तुम्हें अपना रहा हूँ पुरानी मैं सभी बातें भुला दूँगा तुम्हें सब याद है या फिर नहीं है क्या पता लेकिन मुझे सब याद है मैं ने यही सब कुछ कहा था मगर तुम ने किया क्या जो तुम्हें करना था तुम उस बरसात के जैसी हो हमेशा जो ग़लत मिक़दार में होती है कभी ज़्यादा कभी कम और बे-मौसम फ़क़त मिट्टी भिगोने के लिए न जाने अब मुझे क्या हो गया है फ़ज़ाओ में कहानी सी नज़र आती है अब हर इक वो चीज़ जो मैं देखता हूँ हमारी ही कहानी लगती है सब , वो नदी देखो तुम्हें लगता नहीं मैं वो नदी हूँ और वो बादल तुम नदी सूखी हुई बादल भरे नदी है मुंतज़िर बरसात की मगर बादल गुज़र जाएगे दोबारा लौट कर आएगे मगर फिर से वही होगा यही होता है मेरे साथ भी हर बार भॅंवर हूँ मैं किनारे तुम ख़ला हूँ मैं नज़ारे तुम मैं हूँ पतझड़ बहारें तुम तुम्हारा मैं हमारे तुम नहीं ऐसा नहीं है अलग है हम बहुत तुम्हें मैं बे सबब ही याद करता रहता हूँ तुम्हारे पास जब कोई नहीं होता वहॉं मैं नफ़ा हो तुम ख़सारा मैं तुम्हीं हो चाँद तारा मैं मोहब्बत और कोई है गुज़ारा मैं दोबारा पास आओगी तुम सहेगा कौन दोबारा मैं सदाए दूँगा तुम को मैं पुकारूॅंगा मगर मेरी ये इल्तिज़ा है तुम सेे मत आना लौट कर
Naaz ishq
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'सिगरेट और मोहब्बत' वो मुझ सेे रोज़ कहती थी ये सिगरेट छोड़ दो ना तुम हमेशा ग़म में रहने कि रिवायत तोड़ दो ना तुम तो मैं हँसकर ये कहता था बड़ी नादान हो पागल कि मेरी ज़ात से तुम भी अभी अंजान हो पागल चलो माना ये आदत है इसे मैं छोड़ सकता हूँ मोहब्बत भी तो आदत है उसे भी छोड़ दूँ क्या मैं मोहब्बत का जो जज़्बा है बहुत वो ख़ास है शायद मुझे हर वक़्त लगता है वो मेरे पास है शायद मोहब्बत रोग ही तो है ये कोई जोग ही तो है जो हर दम ये उदासी है किसी का सोग ही तो है मोहब्बत की रिवायत है ये ग़म पाना इबादत है मैं अपने ज़ख़्म सीता हूँ ग़म ए माज़ी को जीता हूँ ये सिगरेट और ग़म जो हैं ये ज़रिए राब्ते के हैं धुएँ में अक्स है उस का ग़मों में रम्ज़ है उस का उसे जब याद करने में बहुत दुश्वारी होती है तो मैं सिगरेट को पीता हूँ उसे हर साँस जीता हूँ तो अब तुम ही कहो जानाँ मोहब्बत छोड़ दूँ कैसे जो मेरे ग़म की साथी है वो सिगरेट तोड़ दूँ कैसे।
ALI ZUHRI
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ये मौसम है उमंगों का तरंगों का ज़माना है चमन के फूल हैं हम काम अपना मुस्कुराना है क़दम जो भी उठाना है तरक़्क़ी का उठाना है सितारों की तरह इक दिन फ़लक पर जगमगाना है गले में डाल कर बाँहें ख़ुशी के गीत गाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है मिले आधी अगर रोटी तो हम उतनी ही खाएँगे मुसीबत जो पड़े सर पर ख़ुशी से झेल जाएँगे जो पढ़ना सीख जाएँगे तो औरों को पढ़ाएँगे जो रस्ते में भटकते हैं उन्हें मंज़िल दिखाएँगे मोहब्बत का दिया हर मोड़ पर हम को जलाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है नहीं है इल्म से बढ़ कर जहाँ में कोई भी दौलत यही है नूर आँखों का दिलों की है यही राहत ये वो शय है लगा सकता नहीं जिस की कोई क़ीमत बग़ैर इस के न मिल पाएगी दुनिया में कोई इज़्ज़त उठो जल्दी अगर ता'लीम का दरिया बहाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है जहालत का अँधेरा अक़्ल से मा'ज़ूर करता है जो दिल की आँख है उस को यही बे-नूर करता है बना देता है ये शैताँ ख़ुदा से दूर करता है हमें दर दर भटकने के लिए मजबूर करता है जिसे ता'लीम कहते हैं कि वो हिकमत का ख़ज़ाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है
Zafar Kamali
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किसी कव्वे ने इक कोयल से पूछा बता बहना कि है ये माजरा क्या ग़ज़ब है ये कि हम दोनों हैं काले ख़ुदा के फ़ज़्ल से हैं अक़्ल वाले मगर दुनिया करे क्यूँँ प्यार तुझ से रहें छोटे बड़े बेज़ार मुझ से तिरा ही नाम है सब की ज़बाँ पर तिरा जादू तो है सारे जहाँ पर जो शाइ'र हैं लिखें तेरा तराना बता तेरा है क्यूँँ आशिक़ ज़माना रहा करती है तू बच्चों के दिल में मगर इक मैं कि चूहा जैसे बिल में जहाँ जा कर करूँँ मैं काएँ काएँ वहाँ से मार कर मुझ को भगाएँ नज़र में तीर और तलवार बन कर खटकता हूँ दिलों में ख़ार बन कर जिसे देखो उसे मुझ से है वहशत सभी को नाम से मेरे है नफ़रत कहा कोयल ने कव्वे से कि भाई न क्यूँँ तेरी समझ में बात आई जिसे आती न हो शीरीं-बयानी करे क्या वो दिलों पर हुक्मरानी हैं सब उस के जो मीठे बोल बोले जो लब खोल तो रस कानों में घोले कहाँ मैं बोलने में चूकती हूँ मगर जब बोलती हूँ कूकती हूँ मिरी आवाज़ में फूलों की नर्मी तिरी आवाज़ में शोलों की गर्मी ज़बाँ से मैं बनी आँखों का तारा मगर तेरी ज़बाँ ने तुझ को मारा तू जिस दिन सीख लेगा ख़ुश-कलामी मिलेगी हर जगह तुझ को सलामी
Zafar Kamali
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गरचे पौदा अभी हूँ छोटा सा आरज़ू दिल में है मिरे क्या क्या आ ही जाएगी रुत जवानी की या'नी मुझ पर भी शादमानी की डाली डाली मिरी हरी होगी और फल फूल से भरी होगी फ़ैज़ होगा जहाँ में आम मिरा ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ होगा काम मिरा सारी चिड़ियों को मैं बुलाऊँगा ख़ूब मेवे उन्हें खिलाऊँगा घोंसले मुझ पे वो बनाएँगी राग छेड़ेंगी चहचहाएँगी जो भी आएगा उन का करने शिकार मेरे पत्तों की देखेगा दीवार गर्मियों में मुसाफ़िर आएँगे मेरे साए में चैन पाएँगे बच्चे आएँगे झूला झूलेंगे गीत गा के ख़ुशी में फूलेंगे वो चलाएँगे मुझ पे जब पत्थर इस के बदले मैं इन को दूँगा समर एक ख़्वाहिश है और दिल में बड़ी काश वो भी करे ख़ुदा पूरी सूख जाऊँ तो लकड़ियों से मिरी ख़ूब-सूरत सी इक बने कुर्सी उस पे बैठे फ़क़त वही लड़का जिस के सर में हो इल्म का सौदा दिल में अपने जो मैं ने ठानी है उस की ये मुख़्तसर कहानी है मैं भी बच्चा हूँ तुम भी बच्चे हो मैं भी सच्चा हूँ तुम भी सच्चे हो क्या बनाया है ज़िंदगी का प्लान मैं तो रखता हूँ तुम से नेक गुमान आज छोटे हो कल जो होगे जवाँ कौन से काम तुम करोगे यहाँ
Zafar Kamali
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आता है याद मुझ को स्कूल का ज़माना वो दोस्तों की सोहबत वो क़हक़हे लगाना अनवर अज़ीज़ राजू मुन्नू के साथ मिल कर वो तालियाँ बजाना बंदर को मुँह चिड़ाना रो रो के माँगना वो अम्मी से रोज़ पैसे जा जा के होटलों में बर्फ़ी मलाई खाना पढ़ने को जब भी घर पर कहते थे मेरे भाई करता था दर्द-ए-सर का अक्सर ही मैं बहाना मिलती नहीं थी फ़ुर्सत दिन रात खेलने से यूँँ राएगाँ हुआ था पढ़ने का वो ज़माना कैसे कहूँ किसी से अब क्या है हाल मेरा खाने को मुश्किलों से मिलता है एक दाना हर इक क़दम पे लगती है ठोकरों पे ठोकर जा कर रहूँ कहाँ पर मिलता नहीं ठिकाना अफ़सर बने हैं इस दम मेरे ही हम-जमाअत उन से हया के मारे पड़ता है मुँह छुपाना बच्चो न तुम समझना हरगिज़ इसे कहानी ये है तुम्हारे हक़ में इबरत का ताज़ियाना होगा भला तुम्हारा सुन लो 'ज़फ़र' की बातें खेलो ज़रूर लेकिन पढ़ने में दिल लगाना
Zafar Kamali
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हम को है फ़ख़्र इस पर हम हैं शरीर बच्चे माहिर हैं अपने फ़न में हम बे-नज़ीर बच्चे पिल्ले को घर में लाएँ बाँहों में हम जकड़ कर मौक़ा मिले तो खींचें बिल्ली की दुम पकड़ कर देखें अगर गधे को दाग़ें उसे सलामी अपना जो बस चले तो उस की करें ग़ुलामी बकरे पे बैठ कर हम गलियों में रोज़ घू में चूँ-चूँ करे जो चूज़ा उस को ज़रूर चू में बिस्तर की सब्ज़ चादर ख़रगोश को उढ़ा दें मुन्नू की लाल टोपी बकरे को हम पहना दें दादा-मियाँ का चश्मा आँखों में हम लगा कर रस्ता चलें कमर को अपनी ज़रा झुका कर आया नसीहतों पर हम को न कान देना मुर्गों के साथ मिल कर भाए अज़ान देना बाजी का हर दुपट्टा अपना बने अमामा जोकर बनें पहन कर भय्या का पाएजामा सोफ़ों पे ख़ूब कूदें ऊधम बहुत मचाएँ मिल जाए जो कनस्तर फिर ढोल हम बजाएँ गर्मी की दोपहर में बाग़ों की ख़ाक फाँकें चिड़ियों के घोंसलों में जा जा के रोज़ झांकें अमरूद हों जो कच्चे उन को ज़रूर तोड़ें सब काम छूट जाए ये काम हम न छोड़ें पानी में रंग घोलें उस का बनाएँ शर्बत पेड़ों पे चढ़ के बैठें समझें उसे ही पर्बत कुत्ते को देखते ही दौड़ाएँ ले के डंडा अपनी बहादुरी का लहराएँ ख़ूब झंडा यारों के साथ मिल कर क़व्वालियाँ भी गाएँ तबला बजाएँ मुँह से और तान भी उड़ाएँ इंसाफ़-वर हैं जितने वो इस को मानते हैं दुनिया की हर शरारत हम ख़ूब जानते हैं हम को है फ़ख़्र इस पर हम हैं शरीर बच्चे माहिर हैं अपने फ़न में हम बे-नज़ीर बच्चे
Zafar Kamali
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