आता है याद मुझ को स्कूल का ज़माना वो दोस्तों की सोहबत वो क़हक़हे लगाना अनवर अज़ीज़ राजू मुन्नू के साथ मिल कर वो तालियाँ बजाना बंदर को मुँह चिड़ाना रो रो के माँगना वो अम्मी से रोज़ पैसे जा जा के होटलों में बर्फ़ी मलाई खाना पढ़ने को जब भी घर पर कहते थे मेरे भाई करता था दर्द-ए-सर का अक्सर ही मैं बहाना मिलती नहीं थी फ़ुर्सत दिन रात खेलने से यूँँ राएगाँ हुआ था पढ़ने का वो ज़माना कैसे कहूँ किसी से अब क्या है हाल मेरा खाने को मुश्किलों से मिलता है एक दाना हर इक क़दम पे लगती है ठोकरों पे ठोकर जा कर रहूँ कहाँ पर मिलता नहीं ठिकाना अफ़सर बने हैं इस दम मेरे ही हम-जमाअत उन से हया के मारे पड़ता है मुँह छुपाना बच्चो न तुम समझना हरगिज़ इसे कहानी ये है तुम्हारे हक़ में इबरत का ताज़ियाना होगा भला तुम्हारा सुन लो 'ज़फ़र' की बातें खेलो ज़रूर लेकिन पढ़ने में दिल लगाना
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था
Divya 'Kumar Sahab'
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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किसी कव्वे ने इक कोयल से पूछा बता बहना कि है ये माजरा क्या ग़ज़ब है ये कि हम दोनों हैं काले ख़ुदा के फ़ज़्ल से हैं अक़्ल वाले मगर दुनिया करे क्यूँँ प्यार तुझ से रहें छोटे बड़े बेज़ार मुझ से तिरा ही नाम है सब की ज़बाँ पर तिरा जादू तो है सारे जहाँ पर जो शाइ'र हैं लिखें तेरा तराना बता तेरा है क्यूँँ आशिक़ ज़माना रहा करती है तू बच्चों के दिल में मगर इक मैं कि चूहा जैसे बिल में जहाँ जा कर करूँँ मैं काएँ काएँ वहाँ से मार कर मुझ को भगाएँ नज़र में तीर और तलवार बन कर खटकता हूँ दिलों में ख़ार बन कर जिसे देखो उसे मुझ से है वहशत सभी को नाम से मेरे है नफ़रत कहा कोयल ने कव्वे से कि भाई न क्यूँँ तेरी समझ में बात आई जिसे आती न हो शीरीं-बयानी करे क्या वो दिलों पर हुक्मरानी हैं सब उस के जो मीठे बोल बोले जो लब खोल तो रस कानों में घोले कहाँ मैं बोलने में चूकती हूँ मगर जब बोलती हूँ कूकती हूँ मिरी आवाज़ में फूलों की नर्मी तिरी आवाज़ में शोलों की गर्मी ज़बाँ से मैं बनी आँखों का तारा मगर तेरी ज़बाँ ने तुझ को मारा तू जिस दिन सीख लेगा ख़ुश-कलामी मिलेगी हर जगह तुझ को सलामी
Zafar Kamali
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समझता है इसे सारा ज़माना किताबें इल्म-ओ-हिकमत का ख़ज़ाना दिलों का नूर हैं अच्छी किताबें चराग़-ए-तूर हैं अच्छी किताबें हमारी मूनिस ओ ग़म-ख़्वार हैं ये जिहाद-ए-इल्म की ललकार हैं ये किताबें क्या हैं रूहानी ख़ुदा हैं सकूँ दिल का दवाओं की दवा हैं हमारी क्यूँँ न हो मंज़िल किताबें रसूलों पर हुईं नाज़िल किताबें किताबों से है जिस की आशनाई बड़ी दौलत जहाँ में उस ने पाई किताबें कामयाबी का हैं ज़ीना रखें आबाद ये दिल का मदीना किताबों की रिफ़ाक़त भी अजब है तअल्लुक़ तोड़ना इन से ग़ज़ब है सदाक़त का यही रस्ता दिखाएँ बुरों को भी यही अच्छा बनाएँ सिखाती हैं ये जीने का तरीक़ा बताती हैं हमें क्या है सलीक़ा किसी ने मुँह किताबों से जो फेरा यक़ीनन उस को ज़िल्लत ने है घेरा किताबों से अगर ख़ाली मकाँ है वो है भूतों का मस्कन घर कहाँ है किताबों से हलावत गुफ़्तुगू में शराफ़त का असर बाक़ी लहू में किताबों से जहाँ में नाम ज़िंदा हमारी सुब्ह ज़िंदा शाम ज़िंदा किताबों से सदा रिश्ता बढ़ाओ इसी में ज़िंदगी अपनी लगाओ
Zafar Kamali
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ये मौसम है उमंगों का तरंगों का ज़माना है चमन के फूल हैं हम काम अपना मुस्कुराना है क़दम जो भी उठाना है तरक़्क़ी का उठाना है सितारों की तरह इक दिन फ़लक पर जगमगाना है गले में डाल कर बाँहें ख़ुशी के गीत गाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है मिले आधी अगर रोटी तो हम उतनी ही खाएँगे मुसीबत जो पड़े सर पर ख़ुशी से झेल जाएँगे जो पढ़ना सीख जाएँगे तो औरों को पढ़ाएँगे जो रस्ते में भटकते हैं उन्हें मंज़िल दिखाएँगे मोहब्बत का दिया हर मोड़ पर हम को जलाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है नहीं है इल्म से बढ़ कर जहाँ में कोई भी दौलत यही है नूर आँखों का दिलों की है यही राहत ये वो शय है लगा सकता नहीं जिस की कोई क़ीमत बग़ैर इस के न मिल पाएगी दुनिया में कोई इज़्ज़त उठो जल्दी अगर ता'लीम का दरिया बहाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है जहालत का अँधेरा अक़्ल से मा'ज़ूर करता है जो दिल की आँख है उस को यही बे-नूर करता है बना देता है ये शैताँ ख़ुदा से दूर करता है हमें दर दर भटकने के लिए मजबूर करता है जिसे ता'लीम कहते हैं कि वो हिकमत का ख़ज़ाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है
Zafar Kamali
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गरचे पौदा अभी हूँ छोटा सा आरज़ू दिल में है मिरे क्या क्या आ ही जाएगी रुत जवानी की या'नी मुझ पर भी शादमानी की डाली डाली मिरी हरी होगी और फल फूल से भरी होगी फ़ैज़ होगा जहाँ में आम मिरा ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ होगा काम मिरा सारी चिड़ियों को मैं बुलाऊँगा ख़ूब मेवे उन्हें खिलाऊँगा घोंसले मुझ पे वो बनाएँगी राग छेड़ेंगी चहचहाएँगी जो भी आएगा उन का करने शिकार मेरे पत्तों की देखेगा दीवार गर्मियों में मुसाफ़िर आएँगे मेरे साए में चैन पाएँगे बच्चे आएँगे झूला झूलेंगे गीत गा के ख़ुशी में फूलेंगे वो चलाएँगे मुझ पे जब पत्थर इस के बदले मैं इन को दूँगा समर एक ख़्वाहिश है और दिल में बड़ी काश वो भी करे ख़ुदा पूरी सूख जाऊँ तो लकड़ियों से मिरी ख़ूब-सूरत सी इक बने कुर्सी उस पे बैठे फ़क़त वही लड़का जिस के सर में हो इल्म का सौदा दिल में अपने जो मैं ने ठानी है उस की ये मुख़्तसर कहानी है मैं भी बच्चा हूँ तुम भी बच्चे हो मैं भी सच्चा हूँ तुम भी सच्चे हो क्या बनाया है ज़िंदगी का प्लान मैं तो रखता हूँ तुम से नेक गुमान आज छोटे हो कल जो होगे जवाँ कौन से काम तुम करोगे यहाँ
Zafar Kamali
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हम को है फ़ख़्र इस पर हम हैं शरीर बच्चे माहिर हैं अपने फ़न में हम बे-नज़ीर बच्चे पिल्ले को घर में लाएँ बाँहों में हम जकड़ कर मौक़ा मिले तो खींचें बिल्ली की दुम पकड़ कर देखें अगर गधे को दाग़ें उसे सलामी अपना जो बस चले तो उस की करें ग़ुलामी बकरे पे बैठ कर हम गलियों में रोज़ घू में चूँ-चूँ करे जो चूज़ा उस को ज़रूर चू में बिस्तर की सब्ज़ चादर ख़रगोश को उढ़ा दें मुन्नू की लाल टोपी बकरे को हम पहना दें दादा-मियाँ का चश्मा आँखों में हम लगा कर रस्ता चलें कमर को अपनी ज़रा झुका कर आया नसीहतों पर हम को न कान देना मुर्गों के साथ मिल कर भाए अज़ान देना बाजी का हर दुपट्टा अपना बने अमामा जोकर बनें पहन कर भय्या का पाएजामा सोफ़ों पे ख़ूब कूदें ऊधम बहुत मचाएँ मिल जाए जो कनस्तर फिर ढोल हम बजाएँ गर्मी की दोपहर में बाग़ों की ख़ाक फाँकें चिड़ियों के घोंसलों में जा जा के रोज़ झांकें अमरूद हों जो कच्चे उन को ज़रूर तोड़ें सब काम छूट जाए ये काम हम न छोड़ें पानी में रंग घोलें उस का बनाएँ शर्बत पेड़ों पे चढ़ के बैठें समझें उसे ही पर्बत कुत्ते को देखते ही दौड़ाएँ ले के डंडा अपनी बहादुरी का लहराएँ ख़ूब झंडा यारों के साथ मिल कर क़व्वालियाँ भी गाएँ तबला बजाएँ मुँह से और तान भी उड़ाएँ इंसाफ़-वर हैं जितने वो इस को मानते हैं दुनिया की हर शरारत हम ख़ूब जानते हैं हम को है फ़ख़्र इस पर हम हैं शरीर बच्चे माहिर हैं अपने फ़न में हम बे-नज़ीर बच्चे
Zafar Kamali
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