nazmKuch Alfaaz

किसी कव्वे ने इक कोयल से पूछा बता बहना कि है ये माजरा क्या ग़ज़ब है ये कि हम दोनों हैं काले ख़ुदा के फ़ज़्ल से हैं अक़्ल वाले मगर दुनिया करे क्यूँँ प्यार तुझ से रहें छोटे बड़े बेज़ार मुझ से तिरा ही नाम है सब की ज़बाँ पर तिरा जादू तो है सारे जहाँ पर जो शाइ'र हैं लिखें तेरा तराना बता तेरा है क्यूँँ आशिक़ ज़माना रहा करती है तू बच्चों के दिल में मगर इक मैं कि चूहा जैसे बिल में जहाँ जा कर करूँँ मैं काएँ काएँ वहाँ से मार कर मुझ को भगाएँ नज़र में तीर और तलवार बन कर खटकता हूँ दिलों में ख़ार बन कर जिसे देखो उसे मुझ से है वहशत सभी को नाम से मेरे है नफ़रत कहा कोयल ने कव्वे से कि भाई न क्यूँँ तेरी समझ में बात आई जिसे आती न हो शीरीं-बयानी करे क्या वो दिलों पर हुक्मरानी हैं सब उस के जो मीठे बोल बोले जो लब खोल तो रस कानों में घोले कहाँ मैं बोलने में चूकती हूँ मगर जब बोलती हूँ कूकती हूँ मिरी आवाज़ में फूलों की नर्मी तिरी आवाज़ में शोलों की गर्मी ज़बाँ से मैं बनी आँखों का तारा मगर तेरी ज़बाँ ने तुझ को मारा तू जिस दिन सीख लेगा ख़ुश-कलामी मिलेगी हर जगह तुझ को सलामी

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है

Sandeep Thakur

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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ

Ali Zaryoun

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रात रात बड़ी ख़राब है हर रात ख़राब कर देती है रात भर जाग कर हर सुब्ह, सुब्ह को दे देती है कुछ ऊंघते हुए ख़्वाब कुछ गुज़री रातों के क़िस्से कुछ बुझी हुए यादों की ख़ाक और सिरहाने पर माज़ी के खारे धब्बे रात बड़ी ख़राब है दिन भर के मुरझाए ज़ख़्मों को फिर हरा कर देती है और महकने देती है रात भर किसी रात रानी की तरह मौका देती है कि सम्भल जाऊँ मैं और फिर ले जाती है अपने साथ पहले से ज़्यादा फिसलन वाली जगह पर रात.. बड़ी ख़राब है पर, एक रात ही तो है जो साथ होती है रात भर ख़ामोशी से सुनती है मेरी हर ख़ामोशी को समझती है मेरी हर बात को मेरी हर रात को रात

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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समझता है इसे सारा ज़माना किताबें इल्म-ओ-हिकमत का ख़ज़ाना दिलों का नूर हैं अच्छी किताबें चराग़-ए-तूर हैं अच्छी किताबें हमारी मूनिस ओ ग़म-ख़्वार हैं ये जिहाद-ए-इल्म की ललकार हैं ये किताबें क्या हैं रूहानी ख़ुदा हैं सकूँ दिल का दवाओं की दवा हैं हमारी क्यूँँ न हो मंज़िल किताबें रसूलों पर हुईं नाज़िल किताबें किताबों से है जिस की आशनाई बड़ी दौलत जहाँ में उस ने पाई किताबें कामयाबी का हैं ज़ीना रखें आबाद ये दिल का मदीना किताबों की रिफ़ाक़त भी अजब है तअल्लुक़ तोड़ना इन से ग़ज़ब है सदाक़त का यही रस्ता दिखाएँ बुरों को भी यही अच्छा बनाएँ सिखाती हैं ये जीने का तरीक़ा बताती हैं हमें क्या है सलीक़ा किसी ने मुँह किताबों से जो फेरा यक़ीनन उस को ज़िल्लत ने है घेरा किताबों से अगर ख़ाली मकाँ है वो है भूतों का मस्कन घर कहाँ है किताबों से हलावत गुफ़्तुगू में शराफ़त का असर बाक़ी लहू में किताबों से जहाँ में नाम ज़िंदा हमारी सुब्ह ज़िंदा शाम ज़िंदा किताबों से सदा रिश्ता बढ़ाओ इसी में ज़िंदगी अपनी लगाओ

Zafar Kamali

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ये मौसम है उमंगों का तरंगों का ज़माना है चमन के फूल हैं हम काम अपना मुस्कुराना है क़दम जो भी उठाना है तरक़्क़ी का उठाना है सितारों की तरह इक दिन फ़लक पर जगमगाना है गले में डाल कर बाँहें ख़ुशी के गीत गाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है मिले आधी अगर रोटी तो हम उतनी ही खाएँगे मुसीबत जो पड़े सर पर ख़ुशी से झेल जाएँगे जो पढ़ना सीख जाएँगे तो औरों को पढ़ाएँगे जो रस्ते में भटकते हैं उन्हें मंज़िल दिखाएँगे मोहब्बत का दिया हर मोड़ पर हम को जलाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है नहीं है इल्म से बढ़ कर जहाँ में कोई भी दौलत यही है नूर आँखों का दिलों की है यही राहत ये वो शय है लगा सकता नहीं जिस की कोई क़ीमत बग़ैर इस के न मिल पाएगी दुनिया में कोई इज़्ज़त उठो जल्दी अगर ता'लीम का दरिया बहाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है जहालत का अँधेरा अक़्ल से मा'ज़ूर करता है जो दिल की आँख है उस को यही बे-नूर करता है बना देता है ये शैताँ ख़ुदा से दूर करता है हमें दर दर भटकने के लिए मजबूर करता है जिसे ता'लीम कहते हैं कि वो हिकमत का ख़ज़ाना है हमें स्कूल जाना है हमें स्कूल जाना है

Zafar Kamali

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गरचे पौदा अभी हूँ छोटा सा आरज़ू दिल में है मिरे क्या क्या आ ही जाएगी रुत जवानी की या'नी मुझ पर भी शादमानी की डाली डाली मिरी हरी होगी और फल फूल से भरी होगी फ़ैज़ होगा जहाँ में आम मिरा ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ होगा काम मिरा सारी चिड़ियों को मैं बुलाऊँगा ख़ूब मेवे उन्हें खिलाऊँगा घोंसले मुझ पे वो बनाएँगी राग छेड़ेंगी चहचहाएँगी जो भी आएगा उन का करने शिकार मेरे पत्तों की देखेगा दीवार गर्मियों में मुसाफ़िर आएँगे मेरे साए में चैन पाएँगे बच्चे आएँगे झूला झूलेंगे गीत गा के ख़ुशी में फूलेंगे वो चलाएँगे मुझ पे जब पत्थर इस के बदले मैं इन को दूँगा समर एक ख़्वाहिश है और दिल में बड़ी काश वो भी करे ख़ुदा पूरी सूख जाऊँ तो लकड़ियों से मिरी ख़ूब-सूरत सी इक बने कुर्सी उस पे बैठे फ़क़त वही लड़का जिस के सर में हो इल्म का सौदा दिल में अपने जो मैं ने ठानी है उस की ये मुख़्तसर कहानी है मैं भी बच्चा हूँ तुम भी बच्चे हो मैं भी सच्चा हूँ तुम भी सच्चे हो क्या बनाया है ज़िंदगी का प्लान मैं तो रखता हूँ तुम से नेक गुमान आज छोटे हो कल जो होगे जवाँ कौन से काम तुम करोगे यहाँ

Zafar Kamali

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आता है याद मुझ को स्कूल का ज़माना वो दोस्तों की सोहबत वो क़हक़हे लगाना अनवर अज़ीज़ राजू मुन्नू के साथ मिल कर वो तालियाँ बजाना बंदर को मुँह चिड़ाना रो रो के माँगना वो अम्मी से रोज़ पैसे जा जा के होटलों में बर्फ़ी मलाई खाना पढ़ने को जब भी घर पर कहते थे मेरे भाई करता था दर्द-ए-सर का अक्सर ही मैं बहाना मिलती नहीं थी फ़ुर्सत दिन रात खेलने से यूँँ राएगाँ हुआ था पढ़ने का वो ज़माना कैसे कहूँ किसी से अब क्या है हाल मेरा खाने को मुश्किलों से मिलता है एक दाना हर इक क़दम पे लगती है ठोकरों पे ठोकर जा कर रहूँ कहाँ पर मिलता नहीं ठिकाना अफ़सर बने हैं इस दम मेरे ही हम-जमाअत उन से हया के मारे पड़ता है मुँह छुपाना बच्चो न तुम समझना हरगिज़ इसे कहानी ये है तुम्हारे हक़ में इबरत का ताज़ियाना होगा भला तुम्हारा सुन लो 'ज़फ़र' की बातें खेलो ज़रूर लेकिन पढ़ने में दिल लगाना

Zafar Kamali

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हम को है फ़ख़्र इस पर हम हैं शरीर बच्चे माहिर हैं अपने फ़न में हम बे-नज़ीर बच्चे पिल्ले को घर में लाएँ बाँहों में हम जकड़ कर मौक़ा मिले तो खींचें बिल्ली की दुम पकड़ कर देखें अगर गधे को दाग़ें उसे सलामी अपना जो बस चले तो उस की करें ग़ुलामी बकरे पे बैठ कर हम गलियों में रोज़ घू में चूँ-चूँ करे जो चूज़ा उस को ज़रूर चू में बिस्तर की सब्ज़ चादर ख़रगोश को उढ़ा दें मुन्नू की लाल टोपी बकरे को हम पहना दें दादा-मियाँ का चश्मा आँखों में हम लगा कर रस्ता चलें कमर को अपनी ज़रा झुका कर आया नसीहतों पर हम को न कान देना मुर्गों के साथ मिल कर भाए अज़ान देना बाजी का हर दुपट्टा अपना बने अमामा जोकर बनें पहन कर भय्या का पाएजामा सोफ़ों पे ख़ूब कूदें ऊधम बहुत मचाएँ मिल जाए जो कनस्तर फिर ढोल हम बजाएँ गर्मी की दोपहर में बाग़ों की ख़ाक फाँकें चिड़ियों के घोंसलों में जा जा के रोज़ झांकें अमरूद हों जो कच्चे उन को ज़रूर तोड़ें सब काम छूट जाए ये काम हम न छोड़ें पानी में रंग घोलें उस का बनाएँ शर्बत पेड़ों पे चढ़ के बैठें समझें उसे ही पर्बत कुत्ते को देखते ही दौड़ाएँ ले के डंडा अपनी बहादुरी का लहराएँ ख़ूब झंडा यारों के साथ मिल कर क़व्वालियाँ भी गाएँ तबला बजाएँ मुँह से और तान भी उड़ाएँ इंसाफ़-वर हैं जितने वो इस को मानते हैं दुनिया की हर शरारत हम ख़ूब जानते हैं हम को है फ़ख़्र इस पर हम हैं शरीर बच्चे माहिर हैं अपने फ़न में हम बे-नज़ीर बच्चे

Zafar Kamali

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