"इनायत" हुस्न देखना है तो आईना देखो जानाँ हुस्न दिखेगा कयामत दिखेगी मेरी आँखों में तो सिर्फ़ हसरत है इबादत है जैसे झंकार किसी घुंगरू की उस के पाजेब में होने से मुकम्मल है उन पाजेब का नसीब तुम्हारे पहनने से कामिल है वैसे ही उस आईने की भी आस होगी रोज़ तुम्हें देख कर वो ख़ुद को सँवारता होगा ख़ुद को तुम्हारे काबिल करता होगा देखो उस को भी कभी उस को भी दीदार-ए-हुस्न का मौका दो नूर देखना है तो अपनी माँ के चेहरे पर देखो जिस सेे तुम में ये अदा आई है उन की आँखों में इफ़्फ़त है इश्रत है मुझे न ज़र होना है न ज़बर होना है तुम्हारी नज़रो के सब सेे क़रीब होना है काजल ख़ूब-सूरत तो नहीं है पर उस ने तुम्हें हसीन बनाया है मुझे तुम्हारी आँखों का काजल होना है बहरहाल कल उसे धुलना है ये जानते हुए भी आँखों में रहा उस ने कभी निकलने की जुम्बिश नहीं की ज़ुर्रत देखनी है तो मेरी क़लम की देखो जिस ने तुम्हें सच दिखाया भला बताया कभी कभी बुरा किया देखना है कुछ अगर तो अपने क़रीब देखो जानाँ उन घुंघरुओं को उस काजल को घुँघरुओं को कभी न कभी टूट जाना है काजल को कभी न कभी धुलना है जहान में लोग भी ऐसे आएँगे घुँघरुओं की तरह, काजल की तरह मेरहबां रहना उन की तरफ़ उन्हीं की वजह से तुम आराइश हो परिवश हो
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"रायगानी-2" जो बात गिनती के कुछ दिनों से शुरू थी वो साल-हा-साल तक चली है कई ज़मानों में बँट गई है मैं इन ज़मानों में लम्हा लम्हा तुम्हारी नज़रों के बिन रहा हूँ मैं अब तलक भी तुम्हारे जाने का बाक़ी नुक़सान गिन रहा हूँ मुझे ज़माना ये कह रहा था कि राइगानी मुबालगा है भला तुम्हारी जुदाई का दुख ज़माँ मकाँ को हिला रहा है भला रिलेटिविटी की साइंस किसी के मुड़ने से मुंसलिक है इन्हें बताओ तुम्हारे जाने का दुख उठा कर फ़क़त अकेला वो मैं नहीं था जो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था तुम्हारे जाने के कुछ दिनों में हमारा हॉकिंग भी मर गया था और उस की थ्योरी के काले गड्ढे जिन्हें हमेशा तुम्हारी आँखों में देखना था वो मेरे चेहरे पे पड़ गए हैं, वो मेरी आँखों में गड़ गए हैं तुम्हारे जाने के बा'द सब कुछ ही एक अस्सी के ज़ाविए पर पलट गया है कि मेरा होना तुम्हारे होने से मुंसलिक था तुम्हारी आँखों की रौशनी थी तो मैं भी दुनिया में हो रहा था तुम्हारे लहजे के सुर मिले थे तो मैं बना था तुम्हारे हाथों का लम्स हाथों को मिल रहा था तो देखता था हमारे हाथों में एटमों की दफ़ा की कुव्वत कशिश में कैसे बदल रही है पर अब तुम्हारी नज़र कहीं है तुम्हारा लहजा भी अब नहीं है तो तुम बताओ मैं किस तरीक़े से अपनी हस्ती को नैस्ती से जुदा करूँँगा मैं दंग आँखों से सारी दुनिया को देखता हूँ और अपने होने की कोई इल्लत तलाशता हूँ अजीब तरह का बे-निशान बे-मक़ाम दुख है समझने वाले समझ गए थे ये राइगानी है राइगानी तमाम सदियों का ख़ाम दुख है मैं अब हक़ीक़त समझ रहा हूँ तमाम दुख था तमाम दुख है तुम्हें बताऊँ किसी के होने का कोई मक़सद कोई मआ'नी कहीं नहीं है अगर तो नीत्शे नहीं मरा है तो उस से पूछा क्या करेंगे ज़मीं पे रह के पले बढ़ेंगे बका की ख़ातिर लड़े मरेंगे फिर अपने जैसे कई जनेंगे और इस जहाँ से निकल पड़ेंगे जिन्हे जनेंगे वो सब के सब भी यही करेंगे पले बढ़ेंगे लड़े मरेंगे फिर उन के बच्चे और उन के बच्चे ये क्या तमाशा-ए-हा-ओ-हू है ये ज़िंदगी है तो आख थू है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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नज़्म:-'शाहज़ादी' बहुत नादान थी लड़की मुझे अपना समझती थी मुझी पे जाँ लुटाती थी बहुत बातें बनाती थी मुझे क़िस्से सुनाती थी और उस में शाहज़ादी थी जिसे इक शाहज़ादे से मोहब्बत थी.! वो कहती थी, कि मैं भी शाहज़ादी हूँ मुझे भी शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! जो मुझ पे जाँ लुटाएगा मुझे अपना बनाएगा.. मैं कहता था, कि मैं हूँ आम सा लड़का मोहब्बत का तो मतलब भी मुझे अब तक नहीं मालूम.! तुम्हें देखूं तो लगता है, मोहब्बत चीज़ है कोई,जो तुम जैसी हसीं होंगी.. मैं तुम सेे बात करता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है कोई लड़की जो यूँ ही बोलती होगी.. तुम्हारे साथ होता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है यहीं पे पास में मेरे.. सो यूँ समझो, मेरी ख़ातिर मोहब्बत तुम. मोहब्बत का हो मतलब तुम. वो कहती थी, चलो झूठे बहुत बातें बनाते हो नहीं हो इतने भोले तुम मुझे जितना दिखाते हो कहा मैं ने, अरे पगली मुझे छोड़ो चलो जाओ कहीं से ढूंढ़ के लाओ है कोई शाहज़ादा तो कि तुम तो शाहज़ादी हो तुम्हें तो शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! दिखा आँखें कहा उस ने कि हाँ हाँ ले ही आऊंगी तुम्हें मैं फिर दिखाऊंगी. दिखाया तो नहीं लेकिन वो ख़ुद में खो गई शायद या कोई मिल गया उस को वो अब बातें बनाना भूल जाती थी मुझे क़िस्से सुनाना भूल जाती थी फिर इक दिन फोन कर बोली कहा था ना, कि मैं तो शाहज़ादी हूँ.! तो देखो ढूंढ़ लाई मैं तुम्हारे ही तरह बातें नहीं बिल्कुल बनाता है मुझे वो शाहज़ादी ही बुलाता है मुझे अपना बताता है बहुत पैसे कमाता है वो कहता है उसे मुझ सेे मोहब्बत है जो मैं ने बोलना चाहा, कहा उस ने कि रहने दो,ये बातें तुम न समझोगे कि तुम हो आम से लड़के, सो तुम सेे दूर जाना है उसे अपना बनाना है मुझे घर भी बसाना है.. मैं उस को अलविदा कहता दुआ भी दे ही देता ना.! बहुत जल्दी में थी शायद सो उस ने कुछ भी सुनना ठीक ना समझा, बिना बोले ही उस का फोन कट गया शायद...!! बहुत नादान थी लड़की__....
Ankit Maurya
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उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली मैं 'मीर' की हमराज़ हूँ 'ग़ालिब' की सहेली दक्कन के 'वली' ने मुझे गोदी में खेलाया 'सौदा' के क़सीदों ने मिरा हुस्न बढ़ाया है 'मीर' की अज़्मत कि मुझे चलना सिखाया मैं दाग़ के आंगन में खिली बन के चमेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली 'ग़ालिब' ने बुलंदी का सफ़र मुझ को सिखाया 'हाली' ने मुरव्वत का सबक़ याद दिलाया 'इक़बाल' ने आईना-ए-हक़ मुझ को दिखाया 'मोमिन' ने सजाई मिरे ख़्वाबों की हवेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली है 'ज़ौक़' की अज़्मत कि दिए मुझ को सहारे 'चकबस्त' की उल्फ़त ने मिरे ख़्वाब सँवारे 'फ़ानी' ने सजाए मिरी पलकों पे सितारे 'अकबर' ने रचाई मिरी बे-रंग हथेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली क्यूँ मुझ को बनाते हो तअस्सुब का निशाना मैं ने तो कभी ख़ुद को मुसलमां नहीं माना देखा था कभी मैं ने भी ख़ुशियों का ज़माना अपने ही वतन में हूँ मगर आज अकेली उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली
Iqbal Ashhar
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याद है एक दिन? मेरी मेज़ पे बैठे-बैठे सिगरेट की डिबिया पर तुम ने एक स्केच बनाया था आ कर देखो उस पौधे पर फूल आया है.
Gulzar
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"तेरी याद है" मैं हूँ ये काली अँधेरी रात है तन्हाई है और तेरी याद है मेरे हाथ में क़लम है पास में रखा एक गिलास है जो शराब से भरा है तुझे याद किए जा रहा हूँ शराब पीते हुए नज़्म लिखते जा रहा हूँ सुनो मेरे लिखे नज़्म तो पढ़ोगी ना ख़्वाबों में मुलाक़ात तो करोगी ना प्यार से न सही, नफ़रत से ही मुझे याद तो करोगी ना जब याद आए मेरी तो ये भी ख़याल करना मैं तेरी आवाज़ सुनने को परेशान रहता हूँ मैं तुझे एक बार देखना चाहता हूँ मैं चाहता हूँ कि तू फिर से मेरे सर पे हाथ फेरे मैं ये भी चाहता हूँ कि तू फिर से आए मेरे पास और आ कर फिर कभी न जाए पर ऐसा तो हो ही नहीं सकता ऐसा होना तो नामुम्किन है
Rovej sheikh
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"इमदाद" ग़मदीदा शख़्स कोई गर मदद के लिए आवाज़ दे उस के ग़ुबार कहे ग़म कहे तुम उस की आवाज़ सुनो उस के ग़म सुनो और ख़ुशी कहो उस सेे एक मजदूर मिला मुझे उस का हाल पहले ऐसा न था उस की फटी कमीज़ में हस्सास की बू थी मजबूरियों में घिरा बेज़र क्या बताता मुझे क्या कहता सो उस ने इतना किया मुझे देख कर मुस्कुरा दिया मेरी ग़ुज़ारिश है कि तुम कुछ नायाब करो ख़ुश्क में आब करो काटों की जगह गुलाब करो इतना गर न हो पाए किसी भूखे को सैराब करो कर पाओगे इतना ? तुम ने भी ख़ुदा से कभी कुछ माँगा होगा पूरा भी ख़ुदा ने किया होगा ये बात जानना है हम को हर बार नहीं होता है वो वो हम ही है करने वाले ख़ाली जगह भरने वाले कुछ तो हम को करना होगा ख़ुदा गोया बनना होगा
Kanor
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"उल्फ़त" ख़्वाब से इंसान का सफ़र ख़ूब-सूरत है इंसान का ख़्वाब हो जाना क़ुदरत है ख़्वाब को भुल जाने की हिदायत है भूलना, दुबारा याद आना फ़ितरत है याद आ कर सताने की जो आदत है गोया सता कर मार देने की जुरअत है जीना उसरत ही सही मगर फ़रहत है ज़िन्दा रहना आशिक़ी की ज़रूरत है उश्शाक़ जो चाहे उसे मिल जाए हैरत है इतनी अच्छी भी नहीं होती किस्मत है दिखे चार-सु फ़कत एक ही सूरत उल्फ़त है! उल्फ़त है! उल्फ़त है!
Kanor
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" ईमान " एक जवाहर उस ख़ुदा ने तुझे तेरे साथ दिया था अभी तक तेरे साथ है या बेच दिया तू ने दिन का उजाला था या रात का काला अँधेरा क्या वक़्त था जिस वक़्त उसे बेच दिया तू ने क्या मंज़र रहा होगा कैसे तुझ में ये हिम्मत आई होगी किस ज़बान में कहा होगा क्या कीमत लगाई होगी कुछ जरूरतो के लिए बहुत ज़रूरी सा गवां दिया अब शायद मिले तुझे वजूद जो तू ने तेरा खोया है आईने से ईमान नहीं दिखता अपने ज़ेहन के किसी कोने में तुझे ख़ुद ही ढूँढ़ना पड़ेगा किसी रोज़ सोचना पड़ेगा कि क्या बेच दिया तू ने क्यूँँ बेच दिया तू ने ...
Kanor
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दिन नहीं ढलता तो दिन नहीं ढलता तो ये रात कैसे होती फ़लक पर तारों की बिसात कैसे होती हम अपनी छत से महताब कैसे देखते नींद नहीं आती तो ख़्वाब कैसे देखते चाँद की चाँदनी का पता कैसे चलता किसी शाइ'र का घर बता कैसे चलता उजालों में उस सेे मिल पाते क्या ऐसे अब रात के ख़्यालों में मिलते हो जैसे अँधेरो का गर कहीं नाम नहीं होता चराग़ों का भी कोई काम नहीं होता दिन के बा'द अँधेरी रात होनी चाहिए ख़ुदस ख़ुद की मुलाक़ात होनी चाहिए रात नहीं होती तो अँधेरा नहीं होता अँधेरा नहीं होता तो सवेरा नहीं होता नए सवेरे से नई शुरुआत कैसे होती दिन नहीं ढलता तो ये रात कैसे होती
Kanor
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"कोशिशें " आग लगी और धुआँ उठने लगा हवाँ में मिल कर धुआँ आसमानों में चला गया आग के अधूरे जलने से धुआँ हुआ था और पूरा जलने से राख राख बेचारी ज़मीं पर पड़ी रही सफ़र के बीच ही धुँए ने राख को छोड़ दिया और फिर वो कभी नहीं मिले राख कभी धुँए से नहीं मिल सकती ये बात वो दोनों जानते थे पर फिर भी हवाँ के चलते राख भी उड़ने की कोशिश करती पर ज़्यादा देर नहीं उड़ पाती ऐसे एक चिड़ीया ने शज़र पर रहवा से बनाया शज़र की हर कोशिश रही कि चिड़ीया ना जाए पर एक रोज़ हवाँ के ज़ोर ज़ोर चलने से शज़र की कुछ शाख़ें टूट गई उन्हीं शाख़ों में से किसी पर था चिड़ीया का घर वो भी टूट गया, शज़र इस बात से रूठ गया चिड़िया हमेशा एक ही शज़र पर नहीं रहेगी इस बात को शज़र जानता था पर फिर भी अपनी शाखाओं को फैलाता रहता दूसरी चिड़ियाओं का इंतिज़ार करता और फिर कभी ज़ोरों से हवाएँ चलती ज़िंदगी की सच्चाई से वाकिफ लोग भी अपने हिस्से की कोशिश करना नहीं छोड़ते मानो सुकून उन का कामयाबी में तो है ही पर मज़ा उन को कोशिशों में भी आता है कोशिश करते रहिए जनाब कोशिश करते रहिए फिर आग लगे और शायद धुआँ न उठे पूरा धुआँ उसी राख में सिमट जाए फिर कोई चिड़िया शज़र को रहने आए और वही पर अपनी पूरी ज़िंदगी बिताए कोशिश करते रहिए जनाब कोशिश करते रहिए
Kanor
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