" ईमान " एक जवाहर उस ख़ुदा ने तुझे तेरे साथ दिया था अभी तक तेरे साथ है या बेच दिया तू ने दिन का उजाला था या रात का काला अँधेरा क्या वक़्त था जिस वक़्त उसे बेच दिया तू ने क्या मंज़र रहा होगा कैसे तुझ में ये हिम्मत आई होगी किस ज़बान में कहा होगा क्या कीमत लगाई होगी कुछ जरूरतो के लिए बहुत ज़रूरी सा गवां दिया अब शायद मिले तुझे वजूद जो तू ने तेरा खोया है आईने से ईमान नहीं दिखता अपने ज़ेहन के किसी कोने में तुझे ख़ुद ही ढूँढ़ना पड़ेगा किसी रोज़ सोचना पड़ेगा कि क्या बेच दिया तू ने क्यूँँ बेच दिया तू ने ...
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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"इमदाद" ग़मदीदा शख़्स कोई गर मदद के लिए आवाज़ दे उस के ग़ुबार कहे ग़म कहे तुम उस की आवाज़ सुनो उस के ग़म सुनो और ख़ुशी कहो उस सेे एक मजदूर मिला मुझे उस का हाल पहले ऐसा न था उस की फटी कमीज़ में हस्सास की बू थी मजबूरियों में घिरा बेज़र क्या बताता मुझे क्या कहता सो उस ने इतना किया मुझे देख कर मुस्कुरा दिया मेरी ग़ुज़ारिश है कि तुम कुछ नायाब करो ख़ुश्क में आब करो काटों की जगह गुलाब करो इतना गर न हो पाए किसी भूखे को सैराब करो कर पाओगे इतना ? तुम ने भी ख़ुदा से कभी कुछ माँगा होगा पूरा भी ख़ुदा ने किया होगा ये बात जानना है हम को हर बार नहीं होता है वो वो हम ही है करने वाले ख़ाली जगह भरने वाले कुछ तो हम को करना होगा ख़ुदा गोया बनना होगा
Kanor
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"उल्फ़त" ख़्वाब से इंसान का सफ़र ख़ूब-सूरत है इंसान का ख़्वाब हो जाना क़ुदरत है ख़्वाब को भुल जाने की हिदायत है भूलना, दुबारा याद आना फ़ितरत है याद आ कर सताने की जो आदत है गोया सता कर मार देने की जुरअत है जीना उसरत ही सही मगर फ़रहत है ज़िन्दा रहना आशिक़ी की ज़रूरत है उश्शाक़ जो चाहे उसे मिल जाए हैरत है इतनी अच्छी भी नहीं होती किस्मत है दिखे चार-सु फ़कत एक ही सूरत उल्फ़त है! उल्फ़त है! उल्फ़त है!
Kanor
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दिन नहीं ढलता तो दिन नहीं ढलता तो ये रात कैसे होती फ़लक पर तारों की बिसात कैसे होती हम अपनी छत से महताब कैसे देखते नींद नहीं आती तो ख़्वाब कैसे देखते चाँद की चाँदनी का पता कैसे चलता किसी शाइ'र का घर बता कैसे चलता उजालों में उस सेे मिल पाते क्या ऐसे अब रात के ख़्यालों में मिलते हो जैसे अँधेरो का गर कहीं नाम नहीं होता चराग़ों का भी कोई काम नहीं होता दिन के बा'द अँधेरी रात होनी चाहिए ख़ुदस ख़ुद की मुलाक़ात होनी चाहिए रात नहीं होती तो अँधेरा नहीं होता अँधेरा नहीं होता तो सवेरा नहीं होता नए सवेरे से नई शुरुआत कैसे होती दिन नहीं ढलता तो ये रात कैसे होती
Kanor
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"कोशिशें " आग लगी और धुआँ उठने लगा हवाँ में मिल कर धुआँ आसमानों में चला गया आग के अधूरे जलने से धुआँ हुआ था और पूरा जलने से राख राख बेचारी ज़मीं पर पड़ी रही सफ़र के बीच ही धुँए ने राख को छोड़ दिया और फिर वो कभी नहीं मिले राख कभी धुँए से नहीं मिल सकती ये बात वो दोनों जानते थे पर फिर भी हवाँ के चलते राख भी उड़ने की कोशिश करती पर ज़्यादा देर नहीं उड़ पाती ऐसे एक चिड़ीया ने शज़र पर रहवा से बनाया शज़र की हर कोशिश रही कि चिड़ीया ना जाए पर एक रोज़ हवाँ के ज़ोर ज़ोर चलने से शज़र की कुछ शाख़ें टूट गई उन्हीं शाख़ों में से किसी पर था चिड़ीया का घर वो भी टूट गया, शज़र इस बात से रूठ गया चिड़िया हमेशा एक ही शज़र पर नहीं रहेगी इस बात को शज़र जानता था पर फिर भी अपनी शाखाओं को फैलाता रहता दूसरी चिड़ियाओं का इंतिज़ार करता और फिर कभी ज़ोरों से हवाएँ चलती ज़िंदगी की सच्चाई से वाकिफ लोग भी अपने हिस्से की कोशिश करना नहीं छोड़ते मानो सुकून उन का कामयाबी में तो है ही पर मज़ा उन को कोशिशों में भी आता है कोशिश करते रहिए जनाब कोशिश करते रहिए फिर आग लगे और शायद धुआँ न उठे पूरा धुआँ उसी राख में सिमट जाए फिर कोई चिड़िया शज़र को रहने आए और वही पर अपनी पूरी ज़िंदगी बिताए कोशिश करते रहिए जनाब कोशिश करते रहिए
Kanor
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"इनायत" हुस्न देखना है तो आईना देखो जानाँ हुस्न दिखेगा कयामत दिखेगी मेरी आँखों में तो सिर्फ़ हसरत है इबादत है जैसे झंकार किसी घुंगरू की उस के पाजेब में होने से मुकम्मल है उन पाजेब का नसीब तुम्हारे पहनने से कामिल है वैसे ही उस आईने की भी आस होगी रोज़ तुम्हें देख कर वो ख़ुद को सँवारता होगा ख़ुद को तुम्हारे काबिल करता होगा देखो उस को भी कभी उस को भी दीदार-ए-हुस्न का मौका दो नूर देखना है तो अपनी माँ के चेहरे पर देखो जिस सेे तुम में ये अदा आई है उन की आँखों में इफ़्फ़त है इश्रत है मुझे न ज़र होना है न ज़बर होना है तुम्हारी नज़रो के सब सेे क़रीब होना है काजल ख़ूब-सूरत तो नहीं है पर उस ने तुम्हें हसीन बनाया है मुझे तुम्हारी आँखों का काजल होना है बहरहाल कल उसे धुलना है ये जानते हुए भी आँखों में रहा उस ने कभी निकलने की जुम्बिश नहीं की ज़ुर्रत देखनी है तो मेरी क़लम की देखो जिस ने तुम्हें सच दिखाया भला बताया कभी कभी बुरा किया देखना है कुछ अगर तो अपने क़रीब देखो जानाँ उन घुंघरुओं को उस काजल को घुँघरुओं को कभी न कभी टूट जाना है काजल को कभी न कभी धुलना है जहान में लोग भी ऐसे आएँगे घुँघरुओं की तरह, काजल की तरह मेरहबां रहना उन की तरफ़ उन्हीं की वजह से तुम आराइश हो परिवश हो
Kanor
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