"उल्फ़त" ख़्वाब से इंसान का सफ़र ख़ूब-सूरत है इंसान का ख़्वाब हो जाना क़ुदरत है ख़्वाब को भुल जाने की हिदायत है भूलना, दुबारा याद आना फ़ितरत है याद आ कर सताने की जो आदत है गोया सता कर मार देने की जुरअत है जीना उसरत ही सही मगर फ़रहत है ज़िन्दा रहना आशिक़ी की ज़रूरत है उश्शाक़ जो चाहे उसे मिल जाए हैरत है इतनी अच्छी भी नहीं होती किस्मत है दिखे चार-सु फ़कत एक ही सूरत उल्फ़त है! उल्फ़त है! उल्फ़त है!
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है
Yasra rizvi
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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सफ़ेद शर्ट थी तुम सीढ़ियों पे बैठे थे मैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुए हमारी पहली मुलाक़ात याद है ना तुम्हें? इशारे करते थे तुम मुझ को आते जाते हुए तमाम रात को आँखें न भूलती थीं मुझे कि जिन में मेरे लिए इज़्ज़त और वक़ार दिखे मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिन तुम एक बार दिखे और बेशुमार दिखे मुझे ये डर था कि तुम भी कहीं वो ही तो नहीं जो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग़ छोड़ते हैं ख़ुदा का शुक्र कि तुम उन सेे मुख़्तलिफ़ निकले जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं ज़ियादा वक़्त न गुज़रा था इस तअल्लुक़ को कि उस के बा'द वो लम्हा करीं करीं आया छुआ था तुम ने मुझे और मुझे मोहब्बत पर यक़ीन आया था लेकिन कभी नहीं आया फिर उस के बा'द मेरा नक़्शा-ए-सुकूत गया मैं कश्मकश में थी तुम मेरे कौन लगते हो मैं अमृता तुम्हें सोचूँ तो मेरे साहिर हो मैं फ़ारिहा तुम्हें देखूँ तो जॉन लगते हो हम एक साथ रहे और हमें पता न चला तअल्लुक़ात की हद बंदियाँ भी होती हैं मोहब्बतों के सफ़र में जो रास्ते हैं वहीं हवस की सिम्त में पगडंडियाँ भी होती हैं तुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है 'हाफ़ी' तुम्हें ये काश मैं सब कुछ कभी बता पाती और अब मज़ीद न मिलने की कोई वजह नहीं बस अपनी माँ से मैं आँखें नहीं मिला पाती
Tehzeeb Hafi
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"इमदाद" ग़मदीदा शख़्स कोई गर मदद के लिए आवाज़ दे उस के ग़ुबार कहे ग़म कहे तुम उस की आवाज़ सुनो उस के ग़म सुनो और ख़ुशी कहो उस सेे एक मजदूर मिला मुझे उस का हाल पहले ऐसा न था उस की फटी कमीज़ में हस्सास की बू थी मजबूरियों में घिरा बेज़र क्या बताता मुझे क्या कहता सो उस ने इतना किया मुझे देख कर मुस्कुरा दिया मेरी ग़ुज़ारिश है कि तुम कुछ नायाब करो ख़ुश्क में आब करो काटों की जगह गुलाब करो इतना गर न हो पाए किसी भूखे को सैराब करो कर पाओगे इतना ? तुम ने भी ख़ुदा से कभी कुछ माँगा होगा पूरा भी ख़ुदा ने किया होगा ये बात जानना है हम को हर बार नहीं होता है वो वो हम ही है करने वाले ख़ाली जगह भरने वाले कुछ तो हम को करना होगा ख़ुदा गोया बनना होगा
Kanor
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दिन नहीं ढलता तो दिन नहीं ढलता तो ये रात कैसे होती फ़लक पर तारों की बिसात कैसे होती हम अपनी छत से महताब कैसे देखते नींद नहीं आती तो ख़्वाब कैसे देखते चाँद की चाँदनी का पता कैसे चलता किसी शाइ'र का घर बता कैसे चलता उजालों में उस सेे मिल पाते क्या ऐसे अब रात के ख़्यालों में मिलते हो जैसे अँधेरो का गर कहीं नाम नहीं होता चराग़ों का भी कोई काम नहीं होता दिन के बा'द अँधेरी रात होनी चाहिए ख़ुदस ख़ुद की मुलाक़ात होनी चाहिए रात नहीं होती तो अँधेरा नहीं होता अँधेरा नहीं होता तो सवेरा नहीं होता नए सवेरे से नई शुरुआत कैसे होती दिन नहीं ढलता तो ये रात कैसे होती
Kanor
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"कोशिशें " आग लगी और धुआँ उठने लगा हवाँ में मिल कर धुआँ आसमानों में चला गया आग के अधूरे जलने से धुआँ हुआ था और पूरा जलने से राख राख बेचारी ज़मीं पर पड़ी रही सफ़र के बीच ही धुँए ने राख को छोड़ दिया और फिर वो कभी नहीं मिले राख कभी धुँए से नहीं मिल सकती ये बात वो दोनों जानते थे पर फिर भी हवाँ के चलते राख भी उड़ने की कोशिश करती पर ज़्यादा देर नहीं उड़ पाती ऐसे एक चिड़ीया ने शज़र पर रहवा से बनाया शज़र की हर कोशिश रही कि चिड़ीया ना जाए पर एक रोज़ हवाँ के ज़ोर ज़ोर चलने से शज़र की कुछ शाख़ें टूट गई उन्हीं शाख़ों में से किसी पर था चिड़ीया का घर वो भी टूट गया, शज़र इस बात से रूठ गया चिड़िया हमेशा एक ही शज़र पर नहीं रहेगी इस बात को शज़र जानता था पर फिर भी अपनी शाखाओं को फैलाता रहता दूसरी चिड़ियाओं का इंतिज़ार करता और फिर कभी ज़ोरों से हवाएँ चलती ज़िंदगी की सच्चाई से वाकिफ लोग भी अपने हिस्से की कोशिश करना नहीं छोड़ते मानो सुकून उन का कामयाबी में तो है ही पर मज़ा उन को कोशिशों में भी आता है कोशिश करते रहिए जनाब कोशिश करते रहिए फिर आग लगे और शायद धुआँ न उठे पूरा धुआँ उसी राख में सिमट जाए फिर कोई चिड़िया शज़र को रहने आए और वही पर अपनी पूरी ज़िंदगी बिताए कोशिश करते रहिए जनाब कोशिश करते रहिए
Kanor
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" ईमान " एक जवाहर उस ख़ुदा ने तुझे तेरे साथ दिया था अभी तक तेरे साथ है या बेच दिया तू ने दिन का उजाला था या रात का काला अँधेरा क्या वक़्त था जिस वक़्त उसे बेच दिया तू ने क्या मंज़र रहा होगा कैसे तुझ में ये हिम्मत आई होगी किस ज़बान में कहा होगा क्या कीमत लगाई होगी कुछ जरूरतो के लिए बहुत ज़रूरी सा गवां दिया अब शायद मिले तुझे वजूद जो तू ने तेरा खोया है आईने से ईमान नहीं दिखता अपने ज़ेहन के किसी कोने में तुझे ख़ुद ही ढूँढ़ना पड़ेगा किसी रोज़ सोचना पड़ेगा कि क्या बेच दिया तू ने क्यूँँ बेच दिया तू ने ...
Kanor
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"इनायत" हुस्न देखना है तो आईना देखो जानाँ हुस्न दिखेगा कयामत दिखेगी मेरी आँखों में तो सिर्फ़ हसरत है इबादत है जैसे झंकार किसी घुंगरू की उस के पाजेब में होने से मुकम्मल है उन पाजेब का नसीब तुम्हारे पहनने से कामिल है वैसे ही उस आईने की भी आस होगी रोज़ तुम्हें देख कर वो ख़ुद को सँवारता होगा ख़ुद को तुम्हारे काबिल करता होगा देखो उस को भी कभी उस को भी दीदार-ए-हुस्न का मौका दो नूर देखना है तो अपनी माँ के चेहरे पर देखो जिस सेे तुम में ये अदा आई है उन की आँखों में इफ़्फ़त है इश्रत है मुझे न ज़र होना है न ज़बर होना है तुम्हारी नज़रो के सब सेे क़रीब होना है काजल ख़ूब-सूरत तो नहीं है पर उस ने तुम्हें हसीन बनाया है मुझे तुम्हारी आँखों का काजल होना है बहरहाल कल उसे धुलना है ये जानते हुए भी आँखों में रहा उस ने कभी निकलने की जुम्बिश नहीं की ज़ुर्रत देखनी है तो मेरी क़लम की देखो जिस ने तुम्हें सच दिखाया भला बताया कभी कभी बुरा किया देखना है कुछ अगर तो अपने क़रीब देखो जानाँ उन घुंघरुओं को उस काजल को घुँघरुओं को कभी न कभी टूट जाना है काजल को कभी न कभी धुलना है जहान में लोग भी ऐसे आएँगे घुँघरुओं की तरह, काजल की तरह मेरहबां रहना उन की तरफ़ उन्हीं की वजह से तुम आराइश हो परिवश हो
Kanor
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