nazmKuch Alfaaz

दिन नहीं ढलता तो दिन नहीं ढलता तो ये रात कैसे होती फ़लक पर तारों की बिसात कैसे होती हम अपनी छत से महताब कैसे देखते नींद नहीं आती तो ख़्वाब कैसे देखते चाँद की चाँदनी का पता कैसे चलता किसी शाइ'र का घर बता कैसे चलता उजालों में उस सेे मिल पाते क्या ऐसे अब रात के ख़्यालों में मिलते हो जैसे अँधेरो का गर कहीं नाम नहीं होता चराग़ों का भी कोई काम नहीं होता दिन के बा'द अँधेरी रात होनी चाहिए ख़ुदस ख़ुद की मुलाक़ात होनी चाहिए रात नहीं होती तो अँधेरा नहीं होता अँधेरा नहीं होता तो सवेरा नहीं होता नए सवेरे से नई शुरुआत कैसे होती दिन नहीं ढलता तो ये रात कैसे होती

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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"इमदाद" ग़मदीदा शख़्स कोई गर मदद के लिए आवाज़ दे उस के ग़ुबार कहे ग़म कहे तुम उस की आवाज़ सुनो उस के ग़म सुनो और ख़ुशी कहो उस सेे एक मजदूर मिला मुझे उस का हाल पहले ऐसा न था उस की फटी कमीज़ में हस्सास की बू थी मजबूरियों में घिरा बेज़र क्या बताता मुझे क्या कहता सो उस ने इतना किया मुझे देख कर मुस्कुरा दिया मेरी ग़ुज़ारिश है कि तुम कुछ नायाब करो ख़ुश्क में आब करो काटों की जगह गुलाब करो इतना गर न हो पाए किसी भूखे को सैराब करो कर पाओगे इतना ? तुम ने भी ख़ुदा से कभी कुछ माँगा होगा पूरा भी ख़ुदा ने किया होगा ये बात जानना है हम को हर बार नहीं होता है वो वो हम ही है करने वाले ख़ाली जगह भरने वाले कुछ तो हम को करना होगा ख़ुदा गोया बनना होगा

Kanor

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" ईमान " एक  जवाहर  उस ख़ुदा  ने तुझे  तेरे  साथ  दिया  था अभी  तक   तेरे  साथ  है या  बेच  दिया  तू ने दिन  का  उजाला  था या  रात  का  काला  अँधेरा क्या  वक़्त  था  जिस  वक़्त उसे बेच दिया तू ने क्या  मंज़र  रहा  होगा कैसे  तुझ में  ये  हिम्मत  आई  होगी किस  ज़बान  में  कहा  होगा क्या  कीमत  लगाई  होगी कुछ  जरूरतो  के  लिए बहुत  ज़रूरी  सा  गवां  दिया अब  शायद  मिले  तुझे वजूद  जो तू ने  तेरा खोया  है आईने  से  ईमान  नहीं  दिखता अपने  ज़ेहन के किसी  कोने  में तुझे  ख़ुद  ही  ढूँढ़ना  पड़ेगा किसी   रोज़   सोचना  पड़ेगा कि क्या  बेच   दिया  तू ने क्यूँँ  बेच  दिया तू ने ...

Kanor

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"उल्फ़त" ख़्वाब से इंसान का सफ़र ख़ूब-सूरत है इंसान का ख़्वाब हो जाना क़ुदरत है ख़्वाब को भुल जाने की हिदायत है भूलना, दुबारा याद आना फ़ितरत है याद आ कर सताने की जो आदत है गोया सता कर मार देने की जुरअत है जीना उसरत ही सही मगर फ़रहत है ज़िन्दा रहना आशिक़ी की ज़रूरत है उश्शाक़ जो चाहे उसे मिल जाए हैरत है इतनी अच्छी भी नहीं होती किस्मत है दिखे चार-सु फ़कत एक ही सूरत उल्फ़त है! उल्फ़त है! उल्फ़त है!

Kanor

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"तुम्हें महसूस होगी" सबकी आँखों में हर्फ़ नमी तुम्हें महसूस होगी हो न हो वक़्त की कमी तुम्हें महसूस होगी तुम्हारी कमी महसूस होगी इस जगह को  पर इस जगह की भी तुम्हें महसूस होगी जाना यहाँ से तो पहुँचना कहिं पर इस सफ़र की हर राह तुम्हें महसूस होगी किस कदर से रहना तुम्हारा किस तरह से जीना अब हर तरह से ज़िन्दगी तुम्हें महसूस होगी महफ़िल में जाम तुम्हारा भले ख़ाली हो  हमारी याद के साथ पीना शराब तुम्हें महसूस होगी आख़िरी रात कहीं हो तो पहला दिन भी कहीं होगा आज के बा'द कहिं मिले तो ये बात तुम्हें महसूस होगी

Kanor

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"कोशिशें " आग लगी और धुआँ उठने लगा हवाँ में मिल कर धुआँ आसमानों में चला गया आग के अधूरे जलने से धुआँ हुआ था और पूरा जलने से राख राख बेचारी ज़मीं पर पड़ी रही सफ़र के बीच ही धुँए ने राख को छोड़ दिया और फिर वो कभी नहीं मिले राख कभी धुँए से नहीं मिल सकती ये बात वो दोनों जानते थे पर फिर भी हवाँ के चलते राख भी उड़ने की कोशिश करती पर ज़्यादा देर नहीं उड़ पाती ऐसे एक चिड़ीया ने शज़र पर रहवा से बनाया शज़र की हर कोशिश रही कि चिड़ीया ना जाए पर एक रोज़ हवाँ के ज़ोर ज़ोर चलने से शज़र की कुछ शाख़ें टूट गई उन्हीं शाख़ों में से किसी पर था चिड़ीया का घर वो भी टूट गया, शज़र इस बात से रूठ गया चिड़िया हमेशा एक ही शज़र पर नहीं रहेगी इस बात को शज़र जानता था पर फिर भी अपनी शाखाओं को फैलाता रहता दूसरी चिड़ियाओं का इंतिज़ार करता और फिर कभी ज़ोरों से हवाएँ चलती ज़िंदगी की सच्चाई से वाकिफ लोग भी अपने हिस्से की कोशिश करना नहीं छोड़ते मानो सुकून उन का कामयाबी में तो है ही पर मज़ा उन को कोशिशों में भी आता है कोशिश करते रहिए जनाब कोशिश करते रहिए फिर आग लगे और शायद धुआँ न उठे पूरा धुआँ उसी राख में सिमट जाए फिर कोई चिड़िया शज़र को रहने आए और वही पर अपनी पूरी ज़िंदगी बिताए कोशिश करते रहिए जनाब कोशिश करते रहिए

Kanor

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