जो राह छूट गई थी उसी का इक कोना लिपट के पाँव से मंज़िल पे आ गया होगा
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"अगर तुम न होती" अगर तुम न होती वबा के दिनों में तो मुझे कौन कहता है कि काढ़ा बना लो सुनो कुछ दिनों को मेरी बात मानो और ठंडी चीज़ों से ख़ुद को बचा लो बर्फ़ का ठंडा पानी जो मुँह से लगाता बताओ मुझे कौन नख़रे दिखाता भला कौन कहता है मुझे तुम सेे कोई बात करनी नहीं है जो मर्ज़ी में आए करो तुम मरो तुम मुझे मार डालो करो ख़ूब मन की अगर तुम न होती तो मैं किस से कहता सुनो तुम सुनो ना मेरी जान सुन लो न रूठो तुम मुझ सेे चलो मान जाओ हमारे लिए ही तो बाग़-ए-बहिश्त से आदम और हव्वा निकाले गए हैं कभी हम मिलेंगे कभी हम बनेंगे हम इक दूजे के हाथों में हाथों को देकर इक मंज़िल चुनेंगे, उसी पर चलेंगे अगर तुम न होती तो मैं किस से कहता हूँ तुम्हारी ये गहरी अंटलाटिक सी आँखों में कई टाइटैनिक दफ़न हो रहे हैं सँभालो इन्हें तुम बचा लो इन्हें तुम मुझे डूबने दो, मैं एंटिक बनूँगा अगर तुम न होती तो नज़्में ये ग़ज़लें किसे मैं सुनाता भला कौन कहता सताओ ना मुझ को रुलाओ ना मुझ को मेरी वहशतों से बचा लो ना मुझ को सुनो ना गले से लगा लो मुझ को
Anand Raj Singh
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"नाकारा" कौन आया है कोई नहीं आया है पागल तेज़ हवा के झोंके से दरवाज़ा खुला है अच्छा यूँँ है बेकारी में ज़ात के ज़ख़्मों की सोज़िश को और बढ़ाने तेज़-रवी की राह-गुज़र से मेहनत-कोश और काम के दिन की धूल आई है धूप आई है जाने ये किस ध्यान में था मैं आता तो अच्छा कौन आता किस को आना था कौन आता
Jaun Elia
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"मज़हबी जंग" उधर मज़हबी जंग का शोर है ख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है तबाही का मंज़र है जाएँ जिधर है टूटी इमारत दुकानें सभी है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर कहीं चीख़ ने की सदा है कहीं ख़ामुशी का है आलम कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई हैं तलवार हाथों में पकड़े कई सितमगर बढ़ाते बग़ावत न दैर-ओ-हरम है सलामत ज़मीं पर है उतरी क़यामत है बिगड़े से हालात अब शहर में हुई हैं मियाँ कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की समुंदर लबा-लब है लाशों से ही न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है ये उठता धुआँ और जलता मकाँ बताते हैं नफ़रत का ये दौर है
MAHESH CHAUHAN NARNAULI
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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मैं कि गुफ़्तार का माहिर था जहाँ-दीदा था लोग सुनते थे मिरी और सुनाते भी थे अपने दुख-दर्द में डूबी हुई सारी बातें मसअला कौन सा ऐसा था जिसे हल न किया आज भी भीड़ थी लोगों की मिरे चारों-तरफ़ मैं ने हर एक को बातों में सुकूँ-याब किया फिर कोई दूर से देता है सदा कौन हो तुम आए हो कौन सी नगरी से ज़रा नाम तो लो नाम तो मैं ने बताया उसे फ़ौरन अपना और मैं कौन हूँ आया हूँ मैं किस नगरी से मैं ने जब ख़ुद से ये पूछा तो मुसलसल चुप थी चारों-अतराफ़ में सदियों की मुक़फ़्फ़ल चुप थी
Faisal Hashmi
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कोई ज़ी-रूह न था अतराफ़ में वीरानी थी वक़्त बीमार था दम तोड़ रहा था शायद शाम के मोड़ पे कुछ धूप पड़ी थी जिस में एक बे-शक्ल से साए का लरज़ता हुआ अक्स रेंगते रेंगते इक लंबी सदा के पीछे अन-गिनत शमसी निज़ामों के जहाँ से निकला आख़िर-ए-कार वो इस कार-ए-गराँ से निकला
Faisal Hashmi
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जो चलता है तो क़दमों की कोई आहट नहीं होती तलाश-ए-फ़र्क़-ए-नेक-ओ-बद की ख़्वाहिश को लिए दिल में गुज़रता है ग़ुबार-ए-ज़ीस्त की गुम-नाम गलियों से धुँदलका सा कोई है या कोई बे-ख़्वाब सी शब है कोई बे-नूर रस्ता है कि जिस में खो गया हूँ मैं कोई आवाज़ है जो इक दरीदा पैरहन पहने हुजूम-ए-बे-सर-ओ-पा में कई सदियों से रहती है गुज़रती है तो हर जानिब सुकूत-ए-मर्ग बहता है खंडर में साँस लेता है कोई बे-ख़ानुमाँ साया मुझे आवाज़ देता है
Faisal Hashmi
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मैं अपने जिस्म से बाहर निकल के देखूँगा ये काएनात मुझे किस तरह की लगती है फ़रेब-ए-ज़ात का एहसास गरचे अच्छा है बहुत कठिन है सफ़र आगही की मंज़िल का भटक रहा हूँ मैं सदियों से ऐसी दुनिया में जहाँ पे जिस्म से हो कर गुज़रना पड़ता है हर एक ख़्वाब को रस्ता बदलना पड़ता है
Faisal Hashmi
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पहाड़ों में घिरी वादी की बलखाती हुई सड़कें गुज़रते मोड़ पर झुकती हुई शाख़ों से पूछेंगी पुराने मॉडलों की गाड़ियों ने क्या कहा तुम से मुसाफ़िर ख़्वाहिशों की मंज़िलों पर भी पहुँचते हैं कि रस्ते की किसी खाई में अपने नाम की क़ब्रों में जा कर लेट जाते हैं
Faisal Hashmi
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