"काएनात एक अज़ीम सदाक़त है" काएनात एक अज़ीम सदाक़त है सरापा मगर तह-दर-तह सदाक़त काएनात की ये सदाक़तें आदमी पर ब-तदरीज ज़ाहिर होती हैं कि आदमी सदाक़त-ए-कामिला के इदराक का ब-यक-वक़्त मुतहम्मिल नहीं एक सदाक़त के बा'द दूसरी का इरफ़ान पहली को बातिल नहीं करता दिन का उजाला रात के अंधेरे का मुनकिर नहीं है पतझड़ की बे-रौनक़ी आने वाले मौसम की शादाबी का मुज़्दा है मौत हमेशा ही ज़िंदगी की हम-सफ़र रही है काश हम इस नुक्ते को समझ सकते
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"चार ज़िंदगी" सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र माँ का पेट और दुनिया का घर छोटी सी क़ब्र और मैदान-ए-हश्र पहली ज़िंदगी का तसव्वुर अगर माँ का पेट तुम को आएगा नज़र नौ महीने जिस ने किया था सब्र तुम ने दिया क्या उस का अज्र दूसरी ज़िंदगी दुनिया का घर जिस में बसाया तुम ने शहर थी चार दिन की ज़िंदगी मगर उस पर लगा दी पूरी उम्र मिली जब मौत की सब को ख़बर पछताने लगे फिर हुआ ये असर अहल-ओ-अयाल भी रोए इधर हुआ तैयार जनाज़ा उधर तीसरी ज़िंदगी जिस का पेट क़ब्र होंगे सब दूर तुझे दफ़न कर आएँगे फ़रिश्ते फ़ौरन क़ब्र पर लगेगा सवालों का एक अंबर देना जवाब तब ख़ुद के बल पर जब पहुँचेगी दुनिया उस मोड़ पर क़यामत तक है क़ब्र का सफ़र चौथी ज़िंदगी मैदान-ए-हश्र जिधर मिलेगा नेकी-बदी का अज्र सामने होगा पुल-सिरात सफ़र तेज़ी से गुज़रेगा वो ही उसपर जो पढ़ता नमाज़ मग़रिब से अस्र जिस ने किया बैतुल्लाह का सफ़र जिस ने बनाया नबी को रहबर जन्नत में होंगे महल और शजर और दोज़ख़ में होंगे आग के अंबर न मालूम कितनी है बाक़ी उम्र आएगी मौत कभी भी ‘ज़फ़र' जितनी है बाक़ी लगा दीं पर सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र
ZafarAli Memon
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"मिरा कमरे से बस नींदों का रिश्ता था" मिरा कमरे से बस नींदों का रिश्ता था और उस ज़ीने से ख़्वाबों का जो लहराता हुआ जाता था छत तक वो छत जहाँ से आसमाँ नज़दीक था जहाँ आराम फ़रमाती थीं आँखें वो आँखें जिन में सपने थे वो सपने जिन में दुनिया थी वो दुनिया जिस में सब कुछ था वही छत जहाँ पर एक चिड़िया की सुरीली चहचहाहट थी पतंगों की सजावट थी फ़लक की झिलमिलाहट थी मगर अफ़सोस वो चिड़िया जो सवेरे घर में सब सेे पहले उठती थी किसे मा'लूम था इक दिन वो ज़ेर-ए-दाम आएगी पतंग-ए-काग़ज़ी जो आसमाँ छूने ही वाली थी किसे मा'लूम था वो लौट कर नाकाम आएगी फ़लक जिस पर तमन्नाओं के कितने चाँद रौशन थे किसे मा'लूम था उस पर अमावस की भी कोई शाम आएगी वो छत जो घर का सब सेे पुर-सुकूँ और प्यारा हिस्सा थी किसे मा'लूम था वो ख़ुद-कुशी के काम आएगी
Charagh Sharma
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"हेलुसिनेशन" मैं अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार पर नज़रें जमाए मनाज़िर के अजूबे देखता हूँ उसी दीवार में कोई ख़ला है मुझे जो ग़ार जैसा लग रहा है वहाँ मकड़ी ने जाल बुन लिया है और अब अपने ही जाल में फँसी है वहीं पर एक मुर्दा छिपकिली है कई सदियों से जो साकित पड़ी है अब उस पर काई जमती जा रही है और उस में एक जंगल दिख रहा है दरख़्तों से परिंदे गिर रहे हैं कुल्हाड़ी शाख़ पर लटकी हुई है लक़ड़हारे पे गीदड़ हँस रहे मुसलसल तेज़ बारिश हो रही है किसी पत्ते से गिर कर एक क़तरा अचानक एक समुंदर बन गया है समुंदर नाव से लड़ने लगा है मछेरा मछलियों में घिर गया है और अब पतवार सीने से लगा कर वो नीले आसमाँ को देखता है जो यक-दम ज़र्द पड़ता जा रहा है वो कैसे रेत बनता जा रहा है मुझे अब सिर्फ़ सहरा दिख रहा है और उस में धूम की चादर बिछी है मगर वो एक जगह से फट रही है वहाँ पर एक साया नाचता है जहाँ भी पैर धरता है वहाँ पर सुनहरे फूल खिलते जा रहे है ये सहरा बाग़ बनता जा रहा है और उस में तितलियाँ दिखती हैं परों में जिन के नीली रौशनी है वो हर पल तेज़ होती जा रही है सो मेरी आँख में चुभने लगी है सो मैं ने हाथ आँखों पर रखे हैं और अब उँगली हटा कर देखता हूँ कि अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार के आगे खड़ा हूँ
Ammar Iqbal
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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दिन के उजाले की कोई हक़ीक़त तो रात का अँधेरा भी वजूद रखता है हम हवा को छू नहीं सकते हवा हमें छूती है मैं अगर तुम से नफ़रत करता हूँ तो मेरे दिल में तुम्हारे लिए मोहब्बत भी है मोहब्बत और नफ़रत दोनों ही ज़िंदगी हैं जिस तरह रात और दिन आसाइश अगर ज़िंदगी है तो बे-माएगी और मसाइब भी जागना ज़िंदगी है तो नींद और नींद में ख़्वाबों का आना भी समुंदर पहाड़ अगर काएनात का जुज़ हैं तो हमारे दिल की धड़कनें भी पैदाइश ज़िंदगी है तो मौत का आख़िरी पल भी इन सब चीज़ों को क्या तुम ज़िंदगी से अलग कर सकते हो ज़िंदगी में ज़िंदगी समाई हुई है ज़िंदगी कभी फ़ना नहीं होती ये शक्लें बदल कर तुम्हारे सामने आएगी पैदाइश और मौत ज़िंदगी के ही दो नाम हैं सफ़र की इब्तिदा-ओ-इंतिहा सफ़र जो ज़िंदगी है और ज़िंदगी काएनात की दूसरी बड़ी सच्चाई मौज अंदर मौज समुंदर की तरह असरार-ए-ख़ज़ाइन लिए हुए तुम अगर इस दूसरी बड़ी सच्चाई को समझ सके तो काएनात की पहली बड़ी सच्चाई तुम पर ख़ुद-ब-ख़ुद आश्कार हो जाएगी
Javed Nadeem
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दरख़्तों ने इंसानों को साया फूल फल और आग दी बे-ग़रज़ अफ़्सोस इंसानों ने दरख़्तों से बे-ग़र्ज़ी न सीखी साँप से ख़ुद-ग़र्ज़ी सीख ली जो ख़ुद अपने बच्चों को खा जाता है
Javed Nadeem
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हर बातिन जिस का ज़ाहिर मुख़ालिफ़ हो बातिल है और वो ज़ाहिर जो बातिन से हम-आहंग न हो रिया है तुम जो अपने ज़ाहिर को बातिन से नहीं मिला सके कार-ज़ार-ए-हयात में क्या कर सकते हो ब-जुज़ दिखावा
Javed Nadeem
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दरख़्त के सहारे बुलंदी से हम-कनार होने वाली बेल अपनी ख़ुसूसियत से महरूम नहीं हो जाती दरख़्त में अपनी शनाख़्त मुदग़म नहीं कर देती तुम अगर दरख़्त नहीं बन सकते तो बेल हो जाओ
Javed Nadeem
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हमारी ख़्वाहिशात हमारी ज़रूरियात की पैदावार हैं ख़्वाहिशात की तकमील ख़ुशी देती है और अदम-ए-तकमील रंज ख़ुशी और रंज क्या है हमारे अपने मिज़ाज की जम्अ-तफ़रीक़ क्या तुम ने कभी किसी के लिए मौत की ख़्वाहिश की है मौत में एक ख़ुशी पोशीदा है एक स्वार्थ निहित है तुम्हारी ज़िंदगी स्वार्थ पे क़ाएम है तुम जब भी मौत चाहोगे अपने स्वार्थ के लिए चाहोगे यूँँ कोई मौत को गले लगाता है मैं सोचता हूँ ज़िंदगी की साँसों ने मेरे बदन को हिद्दत के सिवा क्या दिया है धरती पर एक बोझ से ज़ियादा नहीं रहा है मेरा वजूद आख़िर धरती कब तक मेरा बोझ बर्दाश्त करेगी वक़्त आ गया है कि मौत मुझे गले लगा ले मैं धरती का बोझ कम करना चाहता हूँ या ज़िंदगी के बोझ से ख़ुद छुटकारा हासिल करना चाहता हूँ मैं जानता हूँ मेरी मौत से संसार अपनी रफ़्तार धीमी नहीं कर लेगा वक़्त ठहर नहीं जाएगा कि मैं किसी के लिए ज़िंदा नहीं था और मेरी मौत भी अपने लिए है ख़ालिस अपने लिए
Javed Nadeem
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