nazmKuch Alfaaz

दरख़्त के सहारे बुलंदी से हम-कनार होने वाली बेल अपनी ख़ुसूसियत से महरूम नहीं हो जाती दरख़्त में अपनी शनाख़्त मुदग़म नहीं कर देती तुम अगर दरख़्त नहीं बन सकते तो बेल हो जाओ

Related Nazm

"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने

"Nadeem khan' Kaavish"

16 likes

रात रात बड़ी ख़राब है हर रात ख़राब कर देती है रात भर जाग कर हर सुब्ह, सुब्ह को दे देती है कुछ ऊंघते हुए ख़्वाब कुछ गुज़री रातों के क़िस्से कुछ बुझी हुए यादों की ख़ाक और सिरहाने पर माज़ी के खारे धब्बे रात बड़ी ख़राब है दिन भर के मुरझाए ज़ख़्मों को फिर हरा कर देती है और महकने देती है रात भर किसी रात रानी की तरह मौका देती है कि सम्भल जाऊँ मैं और फिर ले जाती है अपने साथ पहले से ज़्यादा फिसलन वाली जगह पर रात.. बड़ी ख़राब है पर, एक रात ही तो है जो साथ होती है रात भर ख़ामोशी से सुनती है मेरी हर ख़ामोशी को समझती है मेरी हर बात को मेरी हर रात को रात

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

12 likes

"रो तो रहे हैं" नहीं आँखों में नमी तो क्या? रो तो रहे हैं ग़म तुझ सेे कहा नहीं तो क्या? रो तो रहे हैं सितम तू इतने भी न ढा अब ख़ुदा मुझ पर नस हाथ की नहीं भी काटी तो क्या? रो तो रहे हैं कहें क्या किसी से दर्द अपना छुपाएँ कहाँ यार ये दर्द अपना तसल्ली तो ज़माना देगा नहीं कहेगा अपने ही पास रख तू दर्द अपना ज़ालिम इन लोगों को लगता है मुझे ग़म नहीं है कोई ये क्या जाने, सब एक से बढ़कर एक हैं कम नहीं है कोई वैसे न सही, ऐसे ही सही, रो तो रहे हैं आँसू न सही, शा'इरी ही सही, रो तो रहे हैं इतना दिल करता है अब अश्क बहाने का, है करारी वजह न सही, यूँँ ही सही, रो तो रहे हैं मन भारी इतना कभी कभी हो जाता है जीना मुश्किल बेहद कभी कभी हो जाता है ज़ख़्म मुझे न होने नसीब, होता नहीं यूँँ तो और 'गर हो भी तो बस कभी कभी हो जाता है आँखों से रोना, ज़रूरी तो नहीं 'आकर्ष' काम तो दिल ही कर सारा देता है भीगे तकिए पसंद हैं तो नहीं मगर टपकना आँसुओं का सहारा देता है पास किस के बैठें, किसे हाल-ए-दिल बताऍं करें ऐतिबार किस का, किसे मलाल-ए-दिल बताऍं ख़ुद-कुशी कर नहीं पा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं कहीं मरने नहीं जा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं इतने ढेर ग़म हैं के हिसाब ख़ुदा भी करने वाला नहीं सो हम दरगाह नहीं जा रहे तो क्या? रो तो रहे हैं

Aakarsh Goyal 'Mehtaab'

6 likes

"मशवरा" बदलेंगे लोग बदलेंगे उन के तेवर भी जाने अनजाने में हर तेवर समझता हूँ मैं अपने अलफ़ाज़ को दिल-ओ-दिमाग़ से लिखता हूँ दिल टूटा आशिक़ हूँ हर रंग को परखता हूँ अपनी उन हरकत और बे-वजह प्यार पर होने पर एक शाम ख़ुद में कहीं खटकता हूँ तस्वीर को देख कर तेरी ले कर तेरा नाम उन पुरानी याद में हर रोज़ कहीं भटकता हूँ तेरी सब चीज़ और सब तोहफ़ों को ख़ूब उनहें सँवार कर और सँभाले रखता हूँ भूल कर तुझ को अपने मन से रद्द कर के तेरी यादें शुरू करने एक नई ज़िंदगी सुब्ह-सवेरे निकलता हूँ बे-वफ़ा मैं न तुझे कहूँगा न ही ख़ुद को मतलबी रहो हमेशा तुम ख़ुशहाल मिन्नतें इस की करता हूँ मशवरा-ए-ज़फ़र सुन लो दोस्तों आज मैं तुम को कहता हूँ पहले राज़ी वालिदैन को बा'द ही इश्क़ करना रोज़ ऐसे कितने आशिक़ों मैं देखता बिछड़ता हूँ

ZafarAli Memon

14 likes

“मैं बहुत ख़राब हूँ” हूँ बद-चलन मैं बद-गुमाँ अरे नहीं गुलाब हूँ मिरे लिए दुआ न कर कि मैं बहुत ख़राब हूँ ग़रीब हूँ फ़क़ीर हूँ नज़र नज़र असीर हूँ मुझे भुला दे छोड़ दे इन आँसुओं को पोंछ ले जो हाथ से बनाया था वो घोसला भी तोड़ दे लटक जो जाऊँ दार पर तो दार पर ही छोड़ दे मैं 'अक्स हूँ मिटा हुआ कि ख़ून से सना हुआ असीर-ए-'इश्क़ तो नहीं असीर-ए-आब-ओ-गिल हूँ मैं अरे क़दम की ख़ाक हूँ नहीं दुआ सलाम हूँ न हाथ माँग हाथ में न उम्र-भर का साथ माँग नज़र मिला न बात कर मैं मौत की लकीर हूँ तिरा बदन न ढक सकेगी इक फटी सी चीर हूँ मैं कौन और क्या हूँ ये मुझे भी तो पता नहीं तू मेरी बात मान ले जा मुंसिफ़ों को बोल दे सजा-ए-मौत दें मुझे ये इश्क़ है सजा नहीं किया है इश्क़ तू ने तो तिरी कोई ख़ता नहीं मगर मेरे हवाल का तुझे अभी पता नहीं तू ऐसा कर कि भूल जा हयात का पता नहीं असीर-ए-'इश्क़ तो नहीं 'असीर-उल-हुसूल हूँ कि दिल से तू निकाल दे मैं मौत को क़ुबूल हूँ बिका हुआ कफ़न मिरा बिका हुआ बदन मिरा बिकी हुई ज़बाँ मिरी बिका हुआ क़लम मिरा मुझे निगाह से उतार बद-चलन हूँ बद-ज़बाँ मिरे लिए दुआ न कर अरे बहुत ख़राब हूँ हूँ पा-ब-जौलाँ तो भला जबीं को कैसै चूम लूँ ये होंट हैं सिले हुए ज़बान भी सिली हुई ये ज़िंदगी न ज़िंदगी है दार पर टँगी हुई कि बेड़ियों में क़ैद हूँ न कह सकूँ न सुन सकूँ हैं लफ़्ज भी बँधे हुए मैं क्या करूँँ मैं क्या करूँँ मिरे लिए दुआ न कर कि मैं बहुत ख़राब हूँ बस इतना जुर्म था मिरा दिया था पानी प्यासे को खिलाई रोटी भूखे को दिए थे लत्ते नंगे को किसी को तो ज़मीन दी किसी किसी को घर दिया न जाने क्या नज़र थी जीना ही हराम कर दिया हरे से इक दरख़्त को जो सूखे से मिला दिया रक़ीब को हबीब के गले से जो लगा दिया यही ख़ता रही मिरी गुनाह भी यही रहा मैं दार पर हूँ जा रहा ज़रा नज़र को फेर ले मिरी क़ज़ा बिना बजह कहीं तुझे न घेर ले हफ़ीज़ भी तो देख कर के आज मेरे हाल पर कि रो रहा है रो रहा है डाँड़ मार मार कर बहुत उदास है वो मेरी फ़िक्र में लगा हुआ वो क्या करे वो क्या करे उसूल से बँधा हुआ जो होना था सो हो गया तू आज का ये वाक़ि'आ समझ के कोई दास्ताँ कि भूल जा कि भूल जा यूँँ रो नहीं मिरे लिए तू हौसले से काम ले मिरी क़ज़ा बिना बजह कहीं तुझे न थाम ले ये वक़्त है नमाज़ का कि बात मेरी मान ले तू हाथ उठा के मस्जिदों में जा ख़ुदा का नाम ले

Prashant Kumar

4 likes

More from Javed Nadeem

"काएनात एक अज़ीम सदाक़त है" काएनात एक अज़ीम सदाक़त है सरापा मगर तह-दर-तह सदाक़त काएनात की ये सदाक़तें आदमी पर ब-तदरीज ज़ाहिर होती हैं कि आदमी सदाक़त-ए-कामिला के इदराक का ब-यक-वक़्त मुतहम्मिल नहीं एक सदाक़त के बा'द दूसरी का इरफ़ान पहली को बातिल नहीं करता दिन का उजाला रात के अंधेरे का मुनकिर नहीं है पतझड़ की बे-रौनक़ी आने वाले मौसम की शादाबी का मुज़्दा है मौत हमेशा ही ज़िंदगी की हम-सफ़र रही है काश हम इस नुक्ते को समझ सकते

Javed Nadeem

0 likes

हर बातिन जिस का ज़ाहिर मुख़ालिफ़ हो बातिल है और वो ज़ाहिर जो बातिन से हम-आहंग न हो रिया है तुम जो अपने ज़ाहिर को बातिन से नहीं मिला सके कार-ज़ार-ए-हयात में क्या कर सकते हो ब-जुज़ दिखावा

Javed Nadeem

0 likes

दिन के उजाले की कोई हक़ीक़त तो रात का अँधेरा भी वजूद रखता है हम हवा को छू नहीं सकते हवा हमें छूती है मैं अगर तुम से नफ़रत करता हूँ तो मेरे दिल में तुम्हारे लिए मोहब्बत भी है मोहब्बत और नफ़रत दोनों ही ज़िंदगी हैं जिस तरह रात और दिन आसाइश अगर ज़िंदगी है तो बे-माएगी और मसाइब भी जागना ज़िंदगी है तो नींद और नींद में ख़्वाबों का आना भी समुंदर पहाड़ अगर काएनात का जुज़ हैं तो हमारे दिल की धड़कनें भी पैदाइश ज़िंदगी है तो मौत का आख़िरी पल भी इन सब चीज़ों को क्या तुम ज़िंदगी से अलग कर सकते हो ज़िंदगी में ज़िंदगी समाई हुई है ज़िंदगी कभी फ़ना नहीं होती ये शक्लें बदल कर तुम्हारे सामने आएगी पैदाइश और मौत ज़िंदगी के ही दो नाम हैं सफ़र की इब्तिदा-ओ-इंतिहा सफ़र जो ज़िंदगी है और ज़िंदगी काएनात की दूसरी बड़ी सच्चाई मौज अंदर मौज समुंदर की तरह असरार-ए-ख़ज़ाइन लिए हुए तुम अगर इस दूसरी बड़ी सच्चाई को समझ सके तो काएनात की पहली बड़ी सच्चाई तुम पर ख़ुद-ब-ख़ुद आश्कार हो जाएगी

Javed Nadeem

0 likes

सूरज की तपिश पानी को बुख़ारात में तब्दील कर के फ़ज़ा में उड़ा देती माहौल की बुरूदत जब शिद्दत इख़्तियार कर लेती है तो ज़मीन बर्फ़ के बोझ तले कसमसाने लगती है मैं तुम से ये नहीं कहूँगा तुम ने ऐसा क्यूँ किया तुम ऐसा क्यूँ करते हो तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए ज़िंदगी के हक़ाएक़ से फ़रार कभी सुकून नहीं दे सकता हक़ीक़ी सुरूर उन्हें क़ुबूल कर लेने में है अगर तुम समझने वाले हो समझ जाओगे तुम ठहरा हुआ पानी हो मैं तुम्हें बहाव में देखना चाहता हूँ तुम्हारी रवानी बड़ी दिलकश होगी अगर तुम बह सके ज़िंदगी के मसाइल तुम्हारी ज़ात की सत्ह पर उगे पेड़ पौदे हैं पेड़ सत्ह से क़द-आवर नज़र आते हैं मगर बुलंदी से छोटे और ख़ूब-सूरत भी तुम अपनी ज़ात में बुलंद हो जाओ ज़िंदगी के मसाइल छोटे हो जाएँगे

Javed Nadeem

0 likes

अंदेशा खो जाने का उम्मीद कुछ पाने की हुज़्न-ओ-मसर्रत हमारे अपने इख़्तियार के अंदेशा दीमक है जो मसर्रत के दरख़्तों की जड़ों को चाटती रहती है तुम बे-अंदेशा क्यूँ नहीं हो जाते कि पैदाइश से मौत तक ज़िंदगी के लम्हों को तुम उन के मआल-ए-मुतअय्यना से हट कर नहीं जी सकते

Javed Nadeem

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Javed Nadeem.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Javed Nadeem's nazm.