“मैं बहुत ख़राब हूँ” हूँ बद-चलन मैं बद-गुमाँ अरे नहीं गुलाब हूँ मिरे लिए दुआ न कर कि मैं बहुत ख़राब हूँ ग़रीब हूँ फ़क़ीर हूँ नज़र नज़र असीर हूँ मुझे भुला दे छोड़ दे इन आँसुओं को पोंछ ले जो हाथ से बनाया था वो घोसला भी तोड़ दे लटक जो जाऊँ दार पर तो दार पर ही छोड़ दे मैं 'अक्स हूँ मिटा हुआ कि ख़ून से सना हुआ असीर-ए-'इश्क़ तो नहीं असीर-ए-आब-ओ-गिल हूँ मैं अरे क़दम की ख़ाक हूँ नहीं दुआ सलाम हूँ न हाथ माँग हाथ में न उम्र-भर का साथ माँग नज़र मिला न बात कर मैं मौत की लकीर हूँ तिरा बदन न ढक सकेगी इक फटी सी चीर हूँ मैं कौन और क्या हूँ ये मुझे भी तो पता नहीं तू मेरी बात मान ले जा मुंसिफ़ों को बोल दे सजा-ए-मौत दें मुझे ये इश्क़ है सजा नहीं किया है इश्क़ तू ने तो तिरी कोई ख़ता नहीं मगर मेरे हवाल का तुझे अभी पता नहीं तू ऐसा कर कि भूल जा हयात का पता नहीं असीर-ए-'इश्क़ तो नहीं 'असीर-उल-हुसूल हूँ कि दिल से तू निकाल दे मैं मौत को क़ुबूल हूँ बिका हुआ कफ़न मिरा बिका हुआ बदन मिरा बिकी हुई ज़बाँ मिरी बिका हुआ क़लम मिरा मुझे निगाह से उतार बद-चलन हूँ बद-ज़बाँ मिरे लिए दुआ न कर अरे बहुत ख़राब हूँ हूँ पा-ब-जौलाँ तो भला जबीं को कैसै चूम लूँ ये होंट हैं सिले हुए ज़बान भी सिली हुई ये ज़िंदगी न ज़िंदगी है दार पर टँगी हुई कि बेड़ियों में क़ैद हूँ न कह सकूँ न सुन सकूँ हैं लफ़्ज भी बँधे हुए मैं क्या करूँँ मैं क्या करूँँ मिरे लिए दुआ न कर कि मैं बहुत ख़राब हूँ बस इतना जुर्म था मिरा दिया था पानी प्यासे को खिलाई रोटी भूखे को दिए थे लत्ते नंगे को किसी को तो ज़मीन दी किसी किसी को घर दिया न जाने क्या नज़र थी जीना ही हराम कर दिया हरे से इक दरख़्त को जो सूखे से मिला दिया रक़ीब को हबीब के गले से जो लगा दिया यही ख़ता रही मिरी गुनाह भी यही रहा मैं दार पर हूँ जा रहा ज़रा नज़र को फेर ले मिरी क़ज़ा बिना बजह कहीं तुझे न घेर ले हफ़ीज़ भी तो देख कर के आज मेरे हाल पर कि रो रहा है रो रहा है डाँड़ मार मार कर बहुत उदास है वो मेरी फ़िक्र में लगा हुआ वो क्या करे वो क्या करे उसूल से बँधा हुआ जो होना था सो हो गया तू आज का ये वाक़ि'आ समझ के कोई दास्ताँ कि भूल जा कि भूल जा यूँँ रो नहीं मिरे लिए तू हौसले से काम ले मिरी क़ज़ा बिना बजह कहीं तुझे न थाम ले ये वक़्त है नमाज़ का कि बात मेरी मान ले तू हाथ उठा के मस्जिदों में जा ख़ुदा का नाम ले
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"जब पापा पापा कहते थे" जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे जब पापा हम ने कहवाई जाँ फट के गले में है आई तब हँसते गाते फिरते थे अब मारे मारे फिरते हैं न ही कुछ खोने का डर था तब न ही कुछ पाने की इच्छा थी तब मन में जहाँ भी आता था वहीं पे रोया करते थे हम रोने के लिए भी अब हम को जा बुक करवानी पड़ती है जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे स्कूल को हम तुम जाते थे तब ज़ेब में पैसे रहते थे अब हाथ सभी के ख़ाली हैं कैसी यार अब की पढ़ाई है वो पीठ पे बोझ किताबों का और जेब में कंचे रहते थे जब स्कूल से घर आते थे तो चाॅक चुरा कर लाते थे गिल्ली डंडा ले ले कर रोज़ हम गलियों गलियों फिरते थे जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे याद आता है वो दौर हमें दादी के आँचल में छुपते थे मम्मी को झूट बताते थे पापा को झूट बताते थे फिर होती ख़ूब पिटाई थी हम अक्कड़ बक्कड़ करते थे खुट्टल बुट्टल भी करते थे जिस सेे भी लड़ाई होती थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे नाना नानी मौसा मौसी मेहमान जो घर में आते थे उन की ज़ेब से पैसे चुराते थे उन के बैग से चीज़ चुराते थे वो बचपन याद आता है जब बारिश में भीगा करते थे काग़ज़ की नाव बना कर ख़ूब आँगन में हम ने चलाई थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे मम्मी की आँखों में रहते ओझल न कहीं फिर होते थे मम्मी पापा के हिस्से की हर चीज़ हमीं ने खाई थी पापा की गोदी में रहते हम रोज़ दुकानों पर जाते फिर चीज़ वही मिलती हम को उँगली जिस पर भी उठाई थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे वो दिन याद आते हैं हम को जब सबके दिलों में रहते थे बचपन का फ़साना याद आया अब आँख मिरी भर आई है
Prashant Kumar
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"तू वही लड़की है मैं भी वही लड़का हूँ" क्या याद है गोरी बचपन में दिल तू ने रखा था अचकन में दिल तुझ सेे मैं ने माँगा था फिर ठेंगा तू ने दिखाया था तू सच में वो ही लड़की है मैं सच में वो ही लड़का हूँ तू मुझ सेे मोहब्बत करती है मैं तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ दिल धड़कन एक मिनट में सब आपस में जितनी बार मिले हम दोनों भी इक दूजे से इक दिन में उतनी बार मिले जब मुझ सेे ग़लती होती थी तू पागल कह के चिढ़ाती थी पीछे से दुबारा आती थी तू छेड़ के मुझ को जाती थी पर जब लगती थी चोट मुझे तू दूर से रोने लगती थी जल्दी से भाग के आती थी सीने से मुझ को लगाती थी कहती थी सॉरी कान पकड़ तू दारू दवा सब करती थी तू साथ में मेरे खेली है मैं साथ में तेरे खेला हूँ तू लड़की हाई-फाई है और मैं लड़का अलबेला हूँ तू सच में वो ही लड़की है मैं सच में वो ही लड़का हूँ तू मुझ सेे मोहब्बत करती है मैं तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ मैं रोज़ तिरे घर आता था तू रोज़ मिरे घर आती थी स्कूल को दोनों जाते थे तू मुझ को रोज़ बुलाती थी तू मुझ को घर पे पढ़ाती थी और हाथों से लिखवाती थी कितनी शैतानी करता था तू कान पकड़ के रखती थी मैं आँख से ओझल होता था फिर तू भी डरने लगती थी तू मुझ को ढूँढती थी सब में तू मुझ को देखती थी सब में तू जान बताती थी मुझ को हाथों से खिलाती थी मुझ को मैं शाम सवेरे जान-ए-मन तेरी गोदी में सोया हूँ तू सच में वो ही लड़की है मैं सच में वो ही लड़का हूँ तू मुझ सेे मोहब्बत करती है मैं तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ
Prashant Kumar
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"मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है" तू सब सेे जुदा है तू सब सेे हसीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है ज़माने में तुझ सेा न कोई कहीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे देख कर ही निकलता है सूरज तुझे देख कर रोज़ ढलता है सूरज तू इक बा-वज़ू अप्सरा है मिरी जाँ ख़ुदा भी तो तुझ पे फ़िदा है मिरी जाँ तुझी से मोहब्बत करेगा यक़ीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे काम सब छोड़ कर देखते हैं बिना बात के फूल भी फेंकते हैं कि मुम्ताज़ भी तेरे जैसी नहीं है यहाँ एक तू ही महा-सुंदरी है बहुत ख़ूब-सूरत है ज़ोहरा-जबीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है
Prashant Kumar
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"हार्ट अटैक तू लावेगी" जो टॉप पहन के आएगी तो क़हर क़सम से ढाएगी यूँँ तंग क़बा में आवेगी फिर बिजली ख़ूब गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी झुक के रूमाल उठाएगी एकाध को तू टपकाएगी जो ऐसे पेट दिखाएगी तो दिल की नींव हिलाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी यूँँ देखके तू मुस्काएगी तो झगड़ा सब में कराएगी तू हम को भी मरवाएगी तू हम को भी मरवाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी जो हम सेे हाथ मिलाएगी तो दिल के तार भिड़ाएगी तू तन में आग लगाएगी हम को तू मार गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी
Prashant Kumar
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“ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ” ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ ख़्वाब में तुझ को बाल बनाते छत पर देखा करता हूँ तेरी गली के बच्चों में फिर मैं भी खेला करता हूँ छत पर आने की मैं तुझ सेे रोज़ गुज़ारिश करता हूँ हाल-ए-दिल भी काग़ज़ पर लिख लिख के फेंका करता हूँ आज भी तेरी गलियों में मैं रास रचाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ लट बिखराकर एक तरफ़ तू मुझ को देखा करती है आँख दिखाया करती है सब घर हैं बताया करती है जल्दी से फिर काग़ज़ तू घूँघट में छुपाया करती है मेरे लिए और ग़ुस्से में तू चाँट दिखाया करती है ग़ुस्सा अच्छा लगता है ग़ुस्सा दिलवाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ ख़्वाब-नगर की राज-कुमारी दिल में मुझ को रहने दे इश्क़ का दरिया दिल के साथ निगाहों से भी बहने दे तेरा दिल जो भी कहता है रोक न उस को कहने दे तेरा ग़म मेरा भी ग़म है साथ में मिल के सहने दे ख़्वाबों ही ख़्वाबों में तेरा दिल धड़काने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ तेरी निगाहें सुर की देवी छेड़ दें पल में साज़ अभी ये चाहे तो बदल के रख दें शाइ'र का अंदाज़ अभी आँखों ही आँखों में छुपाए तू ने दिल के राज़ अभी इश्क़ मोहब्बत का जल्दी से कर दे तू आग़ाज़ अभी मैं भी इतनी दूर से तुझ पर जान लुटाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ बात तो सुन ख़ातून मिरी ये दिल है मेरा प्रेम-नगर मैं तो अभी आ जाऊँ रहने कह दे तू इक बार अगर तू हो मेरे साथ अगर तो चाँद पे भी कर लूँगा घर तेरे बिना लगता है अधूरा इश्क़ मोहब्बत का ये सफ़र इस दुनिया में मैं तुझ सेे ही ब्याह रचाने आया हूँ ख़्वाब-नगर का दीवाना हूँ ख़्वाब चुराने आया हूँ तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ बस ये बतलाने आया हूँ
Prashant Kumar
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