nazmKuch Alfaaz

दिन के उजाले की कोई हक़ीक़त तो रात का अँधेरा भी वजूद रखता है हम हवा को छू नहीं सकते हवा हमें छूती है मैं अगर तुम से नफ़रत करता हूँ तो मेरे दिल में तुम्हारे लिए मोहब्बत भी है मोहब्बत और नफ़रत दोनों ही ज़िंदगी हैं जिस तरह रात और दिन आसाइश अगर ज़िंदगी है तो बे-माएगी और मसाइब भी जागना ज़िंदगी है तो नींद और नींद में ख़्वाबों का आना भी समुंदर पहाड़ अगर काएनात का जुज़ हैं तो हमारे दिल की धड़कनें भी पैदाइश ज़िंदगी है तो मौत का आख़िरी पल भी इन सब चीज़ों को क्या तुम ज़िंदगी से अलग कर सकते हो ज़िंदगी में ज़िंदगी समाई हुई है ज़िंदगी कभी फ़ना नहीं होती ये शक्लें बदल कर तुम्हारे सामने आएगी पैदाइश और मौत ज़िंदगी के ही दो नाम हैं सफ़र की इब्तिदा-ओ-इंतिहा सफ़र जो ज़िंदगी है और ज़िंदगी काएनात की दूसरी बड़ी सच्चाई मौज अंदर मौज समुंदर की तरह असरार-ए-ख़ज़ाइन लिए हुए तुम अगर इस दूसरी बड़ी सच्चाई को समझ सके तो काएनात की पहली बड़ी सच्चाई तुम पर ख़ुद-ब-ख़ुद आश्कार हो जाएगी

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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याद है एक दिन? मेरी मेज़ पे बैठे-बैठे सिगरेट की डिबिया पर तुम ने एक स्केच बनाया था आ कर देखो उस पौधे पर फूल आया है.

Gulzar

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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फलदार शाख़ें झुकी हुई हैं मोती वाला सदफ़ समुंदर की इंतिहाई गहराइयों में है ये सोच मैं कुछ नहीं हूँ समुंदर की हक़ीक़त से वाक़िफ़ क़तरे का अपनी ज़ात का इरफ़ान

Javed Nadeem

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"काएनात एक अज़ीम सदाक़त है" काएनात एक अज़ीम सदाक़त है सरापा मगर तह-दर-तह सदाक़त काएनात की ये सदाक़तें आदमी पर ब-तदरीज ज़ाहिर होती हैं कि आदमी सदाक़त-ए-कामिला के इदराक का ब-यक-वक़्त मुतहम्मिल नहीं एक सदाक़त के बा'द दूसरी का इरफ़ान पहली को बातिल नहीं करता दिन का उजाला रात के अंधेरे का मुनकिर नहीं है पतझड़ की बे-रौनक़ी आने वाले मौसम की शादाबी का मुज़्दा है मौत हमेशा ही ज़िंदगी की हम-सफ़र रही है काश हम इस नुक्ते को समझ सकते

Javed Nadeem

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हर बातिन जिस का ज़ाहिर मुख़ालिफ़ हो बातिल है और वो ज़ाहिर जो बातिन से हम-आहंग न हो रिया है तुम जो अपने ज़ाहिर को बातिन से नहीं मिला सके कार-ज़ार-ए-हयात में क्या कर सकते हो ब-जुज़ दिखावा

Javed Nadeem

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हमारी ख़्वाहिशात हमारी ज़रूरियात की पैदावार हैं ख़्वाहिशात की तकमील ख़ुशी देती है और अदम-ए-तकमील रंज ख़ुशी और रंज क्या है हमारे अपने मिज़ाज की जम्अ-तफ़रीक़ क्या तुम ने कभी किसी के लिए मौत की ख़्वाहिश की है मौत में एक ख़ुशी पोशीदा है एक स्वार्थ निहित है तुम्हारी ज़िंदगी स्वार्थ पे क़ाएम है तुम जब भी मौत चाहोगे अपने स्वार्थ के लिए चाहोगे यूँँ कोई मौत को गले लगाता है मैं सोचता हूँ ज़िंदगी की साँसों ने मेरे बदन को हिद्दत के सिवा क्या दिया है धरती पर एक बोझ से ज़ियादा नहीं रहा है मेरा वजूद आख़िर धरती कब तक मेरा बोझ बर्दाश्त करेगी वक़्त आ गया है कि मौत मुझे गले लगा ले मैं धरती का बोझ कम करना चाहता हूँ या ज़िंदगी के बोझ से ख़ुद छुटकारा हासिल करना चाहता हूँ मैं जानता हूँ मेरी मौत से संसार अपनी रफ़्तार धीमी नहीं कर लेगा वक़्त ठहर नहीं जाएगा कि मैं किसी के लिए ज़िंदा नहीं था और मेरी मौत भी अपने लिए है ख़ालिस अपने लिए

Javed Nadeem

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दरख़्त के सहारे बुलंदी से हम-कनार होने वाली बेल अपनी ख़ुसूसियत से महरूम नहीं हो जाती दरख़्त में अपनी शनाख़्त मुदग़म नहीं कर देती तुम अगर दरख़्त नहीं बन सकते तो बेल हो जाओ

Javed Nadeem

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