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तुम्हें मा'लूम है जब भी पुराने यार गलियों की यूँँही बे-सूद बातों में कई घंटों की बे-मसरफ़ नशिस्त-ए-राएगाँ को याद करते हैं तो कितना लुत्फ़ आता है पुराने घर में गुज़रे पल और उन में सब कही और अन-कही बातों को जब दोहराया जाता है तो कितना लुत्फ़ आता है तुम्हें मा'लूम है जब इस तरह के अन-गिनत लम्हे जिन्हें हम याद करते हैं जिन्हें हम ढूँडते हैं ज़िंदगी की हर उदासी में मुक़य्यद हैं घड़ी के ऐन मरकज़ में रवाँ इन सूइयों की बे-सिला बे-कार हरकत में तुम्हें मा'लूम है जब भी मुझे इन की ज़रूरत थी तो मैं ने वक़्त से इन आख़िरी अय्याम में इतनी गुज़ारिश की मुझे दे दो वो सब लम्हे कि अब इन की ज़रूरत है तो वो मुझ से यही कहता कई लम्हे कलाइयों पर बंधी घड़ियों से बाहर हैं उन्हें मैं कैसे वापस दूँ उन्हें मैं कैसे लौटा दूँ

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"मशवरा" बदलेंगे लोग बदलेंगे उन के तेवर भी जाने अनजाने में हर तेवर समझता हूँ मैं अपने अलफ़ाज़ को दिल-ओ-दिमाग़ से लिखता हूँ दिल टूटा आशिक़ हूँ हर रंग को परखता हूँ अपनी उन हरकत और बे-वजह प्यार पर होने पर एक शाम ख़ुद में कहीं खटकता हूँ तस्वीर को देख कर तेरी ले कर तेरा नाम उन पुरानी याद में हर रोज़ कहीं भटकता हूँ तेरी सब चीज़ और सब तोहफ़ों को ख़ूब उनहें सँवार कर और सँभाले रखता हूँ भूल कर तुझ को अपने मन से रद्द कर के तेरी यादें शुरू करने एक नई ज़िंदगी सुब्ह-सवेरे निकलता हूँ बे-वफ़ा मैं न तुझे कहूँगा न ही ख़ुद को मतलबी रहो हमेशा तुम ख़ुशहाल मिन्नतें इस की करता हूँ मशवरा-ए-ज़फ़र सुन लो दोस्तों आज मैं तुम को कहता हूँ पहले राज़ी वालिदैन को बा'द ही इश्क़ करना रोज़ ऐसे कितने आशिक़ों मैं देखता बिछड़ता हूँ

ZafarAli Memon

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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो

Ibn E Insha

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"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था

Divya 'Kumar Sahab'

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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का

BR SUDHAKAR

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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने

"Nadeem khan' Kaavish"

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कोई ज़ी-रूह न था अतराफ़ में वीरानी थी वक़्त बीमार था दम तोड़ रहा था शायद शाम के मोड़ पे कुछ धूप पड़ी थी जिस में एक बे-शक्ल से साए का लरज़ता हुआ अक्स रेंगते रेंगते इक लंबी सदा के पीछे अन-गिनत शमसी निज़ामों के जहाँ से निकला आख़िर-ए-कार वो इस कार-ए-गराँ से निकला

Faisal Hashmi

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जो चलता है तो क़दमों की कोई आहट नहीं होती तलाश-ए-फ़र्क़-ए-नेक-ओ-बद की ख़्वाहिश को लिए दिल में गुज़रता है ग़ुबार-ए-ज़ीस्त की गुम-नाम गलियों से धुँदलका सा कोई है या कोई बे-ख़्वाब सी शब है कोई बे-नूर रस्ता है कि जिस में खो गया हूँ मैं कोई आवाज़ है जो इक दरीदा पैरहन पहने हुजूम-ए-बे-सर-ओ-पा में कई सदियों से रहती है गुज़रती है तो हर जानिब सुकूत-ए-मर्ग बहता है खंडर में साँस लेता है कोई बे-ख़ानुमाँ साया मुझे आवाज़ देता है

Faisal Hashmi

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पहाड़ों में घिरी वादी की बलखाती हुई सड़कें गुज़रते मोड़ पर झुकती हुई शाख़ों से पूछेंगी पुराने मॉडलों की गाड़ियों ने क्या कहा तुम से मुसाफ़िर ख़्वाहिशों की मंज़िलों पर भी पहुँचते हैं कि रस्ते की किसी खाई में अपने नाम की क़ब्रों में जा कर लेट जाते हैं

Faisal Hashmi

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मैं कि गुफ़्तार का माहिर था जहाँ-दीदा था लोग सुनते थे मिरी और सुनाते भी थे अपने दुख-दर्द में डूबी हुई सारी बातें मसअला कौन सा ऐसा था जिसे हल न किया आज भी भीड़ थी लोगों की मिरे चारों-तरफ़ मैं ने हर एक को बातों में सुकूँ-याब किया फिर कोई दूर से देता है सदा कौन हो तुम आए हो कौन सी नगरी से ज़रा नाम तो लो नाम तो मैं ने बताया उसे फ़ौरन अपना और मैं कौन हूँ आया हूँ मैं किस नगरी से मैं ने जब ख़ुद से ये पूछा तो मुसलसल चुप थी चारों-अतराफ़ में सदियों की मुक़फ़्फ़ल चुप थी

Faisal Hashmi

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मैं अपने जिस्म से बाहर निकल के देखूँगा ये काएनात मुझे किस तरह की लगती है फ़रेब-ए-ज़ात का एहसास गरचे अच्छा है बहुत कठिन है सफ़र आगही की मंज़िल का भटक रहा हूँ मैं सदियों से ऐसी दुनिया में जहाँ पे जिस्म से हो कर गुज़रना पड़ता है हर एक ख़्वाब को रस्ता बदलना पड़ता है

Faisal Hashmi

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