कैसे विदा करूँँगा उस बेटी को जिस को गोद में खिलाया था कैसे विदा करूँँगा उस बेटी को जिस को आँखों पे बिठाया था पिता के कलेजे का टुकड़ा माँ की दिल की धड़कन पूरे घर में चहकती फिरती थी जो पूरे घर को महकाती फिरती थी जो सबके चेहरे का नूर थी जो कैसे विदा करूँँगा उस बेटी को जिस के एक आँसू से चैन खो जाता था जिस की एक हसीं से दुख दर्द छू हो जाता था कैसे विदा करूँँगा उस बेटी को!
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा
Zubair Ali Tabish
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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ऐ दिल रूक जा थम जा ठहर जा सब्र कर धीरज धर मंज़िल अभी दूर है रास्तों का मज़ा ले यूँँ न ख़ुद को सज़ा दे बस चला चल रूक मत पीछे मत देख जो छूट गया सो छूट गया जो रूठ गया सो रूठ गया बीती बातें भुलाता चल ऐ दिल बस चला चल तेरा वास्ता तेरी मंज़िल से है तेरा ख़ुदा तेरे अंदर है कर उस पर भरोसा बस चला चल बस चला चल
Kumar Rishi
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चल स्टेशन घूमने चलते हैं कोई नहीं देखेगा हमें वहाँ हम किसी के क्या लगते हैं करेंगे अपनी मनमानी कभी इस प्लेटफार्म पर तो कभी उस प्लेटफार्म पर बैठेंगे पिएँगे गरम चाय गरम समोसे खाएंगे देखेंगे आती जाती ट्रेनों को चढ़ते उतरते मुसाफ़िरों को सुनेंगे कुली की आवाज़ों को देखेंगे ट्रैक पर घूमते आवारा कुत्तों को सुनेंगे रेलगाड़ी की सूचनाओं को पढ़ेंगे लोगों के चेहरे उन की भावनाओं को दृश्य बड़े ही रोचक होते हैं स्टेशन के ज़िन्दगी के हर हाल को दर्शाते हैं जगह-जगह से यात्री यहाँ आते हैं हम भी तो यात्री ही हैं इस दुनिया में बस इस की ट्रेन कभी लेट नहीं होती एक दम समय पर है आती रेलवे जैसी उदघोषणा नहीं करती मग़र काश करती तो कुछ ज़रूरी काम निपटा जाते जो हमारे जाने के बा'द छूट जाते हैं चल स्टेशन घूमने चलते हैं कोई नहीं देखेगा हमें वहाँ हम किसी के क्या लगते हैं
Kumar Rishi
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तुझ में बीते दिन तुझ में बीतीं रातें मेरा ये जीवन तेरी सौगातें सुब्ह की धूप रात की चाँदनी जीवन की डोर तुझी से बाँधनी तुझ सेे शुरू ज़िन्दगी तुझ पे खतम जब तू है साथ फिर ना कोई ग़म ये चार पल का फसाना आना और जाना तुम सेे दिल लगाना रूठना और मनाना चाहतों की कहानी सुन ले मेरी ज़ुबानी तोड़ना फिर जोड़ना मुझ सेे मुँह ना मोड़ना
Kumar Rishi
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मैं ने इंसानों के बीच कुत्ते को दुम हिलाते देखा है मैं ने इंसानों के बीच इंसान को भी दुम हिलाते देखा है मैं ने इंसानों के बीच कुत्ते को झूठन खाते देखा है मैं ने इंसानों के बीच इंसान को भी झूठन खाते देखा है मैं ने महँगी गाड़ियों में, आलीशान बंगलों में कुत्ते को रहते हुए देखा है मैं ने गंदे नालों फुटपाथों पे इंसान को रगड़ते देखा है इसी जन्म में मैं ने कुत्ते को इंसान और इंसान को कुत्ता बनते देखा है
Kumar Rishi
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सोचते हैं हम भी दुनिया में कुछ बड़ा कर जाएँगे फिर कभी-कभी लगता है ज़िन्दगी के लम्हात यूँँ हीं गुज़र जाएँगे!
Kumar Rishi
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