nazmKuch Alfaaz

पहुँचता है हर इक मय-कश के आगे दौर-ए-जाम उस का किसी को तिश्ना-लब रखता नहीं है लुत्फ़-ए-आम उस का गवाही दे रही है उस की यकताई पे ज़ात उस की दुई के नक़्श सब झूटे हैं सच्चा एक नाम उस का हर इक ज़र्रा फ़ज़ा का दास्तान उस की सुनाता है हर इक झोंका हवा का आ के देता है पयाम उस का मैं उस को का'बा-ओ-बुत-ख़ाना में क्यूँँ ढूँडने निकलूँ मिरे टूटे हुए दिल ही के अंदर है क़याम उस का मिरी उफ़्ताद की भी मेरे हक़ में उस की रहमत थी कि गिरते गिरते भी मैं ने लिया दामन है थाम उस का वो ख़ुद भी बे-निशाँ है ज़ख़्म भी हैं बे-निशाँ उस के दिया है इस ने जो चरका नहीं है इल्तियाम उस का न जा उस के तहम्मुल पर कि है अब ढब गिरफ़्त उस की डर उस की देर-गीरी से कि है सख़्त इंतिक़ाम उस का

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मर्द-ए-मोहब्बत उस की डिक्शनरी में मर्द का मतलब "ना-मर्द" लिखा हुआ है ख़ुश-क़िस्मत मर्द और औरतें एक दूसरे के दिल की पसंद होते हैं उस की बद-क़िस्मती की पोशाक पर सब से बड़ा दाग़ यही है के वो कुछ ना-मर्दों के निचले हिस्से को पसंद है! सिवाए एक मर्द के सिवाए एक शख़्स के उसे किसी मर्द के दिल ने नहीं चाहा जिस ने उसे उस लम्हें भी सिर्फ़ देखा जो लम्हा मर्द और ना-मर्द होने का फ़ैसला कर दिया करता है मर्द अपनी मोहब्बत के लिए बे-शुमार नज़्में लिख सकता है मगर एक बार भी अपनी मोहब्बत को गाली नहीं दे सकता भले उस की महबूबा जिस्म-फ़रोश ही क्यूँ ना हो मर्द के लिए देवी होती है अज़ीम लड़कियों और इज़्ज़त मंद मर्दों के दिल सलामत रहें जो धोके की तलवारों से काट दिए गए मगर अपनी मोहब्बत की बे-हुर्मती पर तैयार न हुआ एक मर्द का लहू-लुहान दिल जिसे बद-दुआ की पूरी इजाज़त है वो फिर भी दुआ में यही कहता है मौला उसे उस के नाम का साया नसीब कर वो समझ सके कि मोहब्बत और मर्द की "मीम" एक ही मिट्टी से बनी है मोहब्बत और मर्द के सात हुरूफ़ मिल कर "साथ" बनाते हैं लेकिन उसे ये रम्ज़ कोई मर्द ही बता सकता है उस की डिक्शनरी और ज़िन्दगी में कोई मर्द नहीं है

Ali Zaryoun

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तमाम रात सितारों से बात रहती थी कि सुब्ह होते ही घर से फूल आते थे वो किस के नक़्श उभरते थे तेग़ पर अपनी वो किस ख़याल में हम जंग जीत जाते थे हमें भी क़हत में एक चश्म-ए-ज़र मुयस्सर थी कोई हथेलियाँ भर-भर के मय पिलाता था भरा हुआ था समुंदर इन्हीं ख़जानों से निकाल लेते थे जो ख़्वाब रास आता था वो मेरे साथ रहा करता ख़ुशदिली से बहुत कि उन दिनों मेरा दुनिया पर हाथ पड़ता था हमारी जेब भरी रहती दास्तानों से हमें ख़याल का जंगल भी साथ पड़ता था वो सारे दिन का थका ख़्वाब-गाह में आता थपक थपक के सुलाता तो हाथ सो जाते नसीम-ए-सुब्ह किसी लहर में जगाती हमें और उठते उठते हमें दिन के एक हो जाते सरों से खेंच लिया वक़्त ने वफ़ा का लिहाफ़ वो पर्दे उठ गए जो तायनात रहते थे बिछड़ गया है वो संगीन मौसमों में कहीं वो मेरे दिल पर सदा जिस के हाथ रहते थे वो बू-ए-गुल हमें जिस गुलिस्ताँ में लाई थी वहाँ भी जा के उस का निशान देख लिया ये शाख़-ए-वस्ल दुबारा हरी नहीं होती हवा-ए-हिज्र ने मेरा मकान देख लिया वो अब्र जिस की तग-ओ-दौ में जिस्म सूख गए दुबारा छत पे है और छत पे सीढ़ी जाती है ठहर ठहर के उस सम्त ऐसे बढ़ रहा हूँ कि जैसे हामला औरत कदम उठाती है ये ज़हर बादा-ए-इशरत है और दे मेरे रब वो फिर चला गया मैं फिर ज़मीन चाटूँगा मैं फिर से हाथ में तेशा उठाए सोचता हूँ मैं कोहकन वही ख़ुश-ख़त पहाड़ काटूँगा बदन की बर्फ़ पिघलने के बा'द पूछेंगे बहुत पता है तहम्मुल के साथ बहते हो अज़ल के हाथ पे खेंची हुई समय की लकीर किसी से पहले मिटी है जो मुझ सेे कहते हो

Tehzeeb Hafi

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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है

Sandeep Thakur

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"शनासाई" रात के हाथ पे जलती हुई इक शम-ए-वफ़ा अपना हक़ माँगती है दूर ख़्वाबों के जज़ीरे में किसी रौज़न से सुब्ह की एक किरन झाँकती है वो किरन दरपा-ए-आज़ार हुई जाती है मेरी ग़म-ख़्वार हुई जाती है आओ किरनों को अँधेरों का कफ़न पहनाएँ इक चमकता हुआ सूरज सर-ए-मक़्तल लाएँ तुम मिरे पास रहो और यही बात कहो आज भी हर्फ़-ए-वफ़ा बाइस-ए-रुस्वाई है अपने क़ातिल से मिरी ख़ूब शनासाई है

Akhtar Payami

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मुझ पे तेरी तमन्ना का इल्ज़ाम साबित न होता तो सब ठीक था ज़माना तेरी रौशनी के तसलसुल की क़स में उठाता है और में तेरे साथ रह कर भी तारीखियों के तनज़ूर में मारा गया मुझ पे नज़र-ए-करम कर मुखातिब हो मुझ सेे मुझे ये बता मैं तेरा कौन हूँ? इस तअल्लुक़ की क्यारी में उगते हुए फूल को नाम दे मुझ को तेरी मोहब्बत पे शक तो नहीं पर मेरे नाम से तेरे सीने में रखी हुई ईंट धड़के तो मानो कब तलक मैं तेरी ख़ामोशी से यूँंही अपने मर्ज़ी के मतलब निकालूँगा मुझ को आवाज़ दे चाहे वो मेरे हक़ में बुरी हो तेरी आवाज़ सुनने की ख़्वाहिश में कानों के परदे खींचे जा रहे हैं बोलदे कुछ भी जो तेरा जी चाहे.. बोल ना! तेरे होंठों पे मकड़ी के जालों के जमने का दुख तो बरहाल मुझ को हमेशा रहेगा तू ने चुपी ही सादनी थी तो इज़हार ही क्यूँ किया था? ये तो ऐसे है बचपन में जैसे कहीं खेलते खेलते कोई किसी को 'स्टेचू' कहे और फिर उम्र भर उस को मुड़ कर न देखे

Tehzeeb Hafi

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ऐ नुक्ता-वरान-ए-सुख़न-आरा-ओ-सुख़न-संज ऐ नग़्मा-गिरान-ए-चमनिस्तान-ए-मआफ़ी माना कि दिल-अफ़रोज़ है अफ़्साना-ए-अज़रा माना कि दिल-आवेज़ है सलमा की कहानी माना कि अगर छेड़ हसीनों से चली जाए कट जाएगा इस मश्ग़ले में अहद-ए-जवानी गरमाएगा ये हमहमा अफ़्सुर्दा दिलों को बढ़ जाएगी दरिया-ए-तबीअत की रवानी माना कि हैं आप अपने ज़माने के 'नज़ीरी' माना कि हर इक आप में है उर्फ़ी-ए-सानी माना की हदीस-ए-ख़त-ओ-रुख़्सार के आगे बेकार है मश्शाइयों की फ़ल्सफ़ा-दानी माना कि यही ज़ुल्फ़ ओ ख़त-ओ-ख़ाल की रूदाद है माया-ए-गुल-कारी-ए-ऐवान-ए-मआफ़ी लेकिन कभी इस बात को भी आप ने सोचा ये आप की तक़्वीम है सदियों की पुरानी माशूक़ नए बज़्म नई रंग नया है पैदा नए ख़ा में हुए हैं और नए 'मानी' मिज़्गाँ की सिनाँ के एवज़ अब सुनती है महफ़िल काँटों की कथा बरहना-पाई की ज़बानी लज़्ज़त वो कहाँ लाल-ए-लब-ए-यार में है आज जो दे रही है पेट के भूखों की कहानी बदला है ज़माना तो बदलिए रविश अपनी जो क़ौम है बेदार ये है उस की निशानी ऐ हम-नफ़सो याद रहे ख़ूब ये तुम को बस्ती नई मशरिक़ में हमीं को है बसानी

Zafar Ali Khan

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बारहा देखा है तू ने आसमाँ का इंक़लाब खोल आँख और देख अब हिन्दोस्ताँ का इंक़लाब मग़रिब ओ मशरिक़ नज़र आने लगे ज़ेर-ओ-ज़बर इंक़लाब-ए-हिन्द है सारे जहाँ का इंक़लाब कर रहा है क़स्र-आज़ादी की बुनियाद उस्तुवार फ़ितरत-ए-तिफ़्ल-ओ-ज़न-ओ-पीर-ओ-जवाँ का इंक़लाब सब्र वाले छा रहे हैं जब्र की अक़्लीम पर हो गया फ़र्सूदा शमशीर-ओ-सिनाँ का इंक़लाब

Zafar Ali Khan

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प्रयाग में मिली है जमुना से आ के गंगा पिघला हुआ ये नीलम बहता हुआ वो हीरा इन की जुदाइयों ने खींचा है नक़्श-ए-जौज़ा इन की रवानियाँ हैं शान-ए-ख़ुदा-एयकता संगम की सीढ़ियों पर मोती लुढ़क रहा है

Zafar Ali Khan

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ज़िंदा-बाश ऐ इंक़लाब ऐ शोला-ए-फ़ानूस-ए-हिन्द गर्मियाँ जिस की फ़रोग़-ए-मंक़ल-ए-जाँ हो गईं बस्तियों पर छा रही थीं मौत की ख़ामोशियाँ तू ने सूर अपना जो फूँका महशरिस्ताँ हो गईं जितनी बूँदें थीं शहीदान-ए-वतन के ख़ून की क़स्र-आज़ादी की आराइश का सामाँ हो गईं मर्हबा ऐ नौ-गिरफ़्तारान-ए-बेदाद-ए-फ़रंग जिन की ज़ंजीरें ख़रोश-अफ़ज़ा-ए-ज़िंदाँ हो गईं ज़िंदगी उन की है दीन उन का है दुनिया उन की है जिन की जानें क़ौम की इज़्ज़त पे क़ुर्बां हो गईं

Zafar Ali Khan

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है कल की अभी बात कि थे हिन्द के सरताज देते थे तुम्हें आ के सलातीन-ए-ज़मन बाज क्या रंग ज़माने ने ये बदला है कि तुम को दुनिया की हर इक क़ौम समझती है ज़लील आज दामान-ए-निगह जिस की फ़ज़ा के लिए था तंग वो बाग़ हुआ देखते ही देखते ताराज जब तक रहे तुम दस्त-निगर अपने ख़ुदा के होने न दिया उस ने तुम्हें ग़ैर का मुहताज जो हो गए उस के वो हुआ उन का निगहबाँ उस की है जिन्हें शर्म है उन की भी उसे लाज मिट जाओ मगर हक़ को न मिटते हुए देखो सीखो ये रविश गर तुम्हें लेना है स्वराज

Zafar Ali Khan

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