फिर दिल में दर्द सिलसिला-ए-जुम्बा है क्या करूँँ फिर अश्क गर्म-ए-दावत-ए-मिज़्गाँ है क्या करूँँ फिर चाक चाक सीना है आवाज़ दूँ किसे फिर तार तार जैब-ओ-गरेबाँ है क्या करूँँ फिर इत्तिसाल-ए-गर्दन-ओ-ख़ंजर है क्या कहूँ फिर इख़्तिलात-ए-ज़ख़्म-ओ-नमक-दाँ है क्या करूँँ फिर इक गिरह हरीफ़-ए-नफ़स है किसे बताऊँ फिर इक खटक रफ़ीक़-ए-रग-ए-जाँ है क्या करूँँ सीने में एक दशना सा लेता है करवटें रग रग में एक आग सी ग़लताँ है क्या करूँँ जिस चीज़ पर मदार था दरमान-ए-ज़ीस्त का वो शय फिर आज दर्द का उनवाँ है क्या करूँँ फिर सर पर अब्र-ए-दौर-ए-जुनूँ है घिरा हुआ फिर दिल में बू-ए-ज़ुल्फ़ परेशाँ है क्या करूँँ फिर इश्क़-ए-ना-सुबूर का परतव है रूह पर फिर दिल हुज़ूर-ए-अक़्ल पशेमाँ है क्या करूँँ बीते दिनों की याद पर अफ़्शाँ है क्या करूँँ रातों की नम हवाओं में तारों की छाँव में बीते दिनों की याद पर-अफ़्शाँ है क्या करूँँ जिस चाँदनी को खोए हुए मुद्दतें हुईं फिर ज़ेहन के उफ़ुक़ से नुमायाँ है क्या करूँँ तक़दीर ने कभी जो निकाला था इक जुलूस फिर जादा-ए-नफ़स पे ख़िरामाँ है क्या करूँँ वो ग़म कि दे चुका हूँ जिसे बार-हा शिकस्त फिर दिल से 'जोश' दस्त-ओ-गरेबाँ है क्या करूँँ
Related Nazm
"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
111 likes
मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
68 likes
मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
52 likes
मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
37 likes
मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
78 likes
More from Josh Malihabadi
अलस्सबाह कि थी काएनात सर-ब-सुजूद फ़लक पे शोर-ए-अज़ाँ था ज़मीं पे बाँग-ए-दुरूद बहार शबनम-आसूदा थी कि रूह-ए-ख़लील फ़रोग़-ए-लाला-ओ-गुल था कि आतिश-ए-नमरूद जला रही थी हवा बज़्म-ए-जाँ में शम-ए-तरब मिटा रही थी सबा लौह-ए-दिल से नक़्श-ए-जुमूद गुलों के रंग में थी शान-ए-ख़ंदा-ए-यूसुफ़ कली के साज़ में था लुत्फ़-ए-नग़्मा-ए-दाऊद हर इक जबीं पे दरख़्शाँ था नय्यर-ए-इक़बाल हर एक फ़र्क़ पे ताबाँ था ताला-ए-मसऊद फ़ज़ा-ए-चर्ख़ में दौड़ी हुई थी रूह-ए-ज़ुहूर बिसात-ए-ख़ाक पे छाया हुआ था रंग-ए-नुमूद हसीन ख़्वाब से चौंके थे रसमसाए हुए मचल रही थी हवाओं में बू-ए-अम्बर-ओ-बूद ये रंग देख कर आया मुझे ख़याल-ए-नमाज़ मिरी नमाज़ कि है शाहिद-ओ-शराब-ओ-सुरूद मिरी नमाज़ कि है नग़मा-ए-हुवल-बाक़ी मिरी नमाज़ कि है नारा-ए-हुवल-मौजूद मिरी नमाज़ कि है इश्क़-ए-नाज़िर-ओ-मंज़ूर मिरी नमाज़ कि है हुब्ब-ए-शाहिद-ओ-मशहूद मिरी नमाज़ कि है एक साज़-ए-ला-फ़ानी मरी नमाज़ कि है एक सोज़-ए-ला-महदूद मिरी नमाज़ कि है दीद रू-ए-नाशुस्ता मिरी नमाज़ कि है तौफ़-ए-हुस्न-ए-ख़्वाब-आलूद मिरी नमाज़ ''नज़र'' शैख़ की नमाज़ ''अल्फ़ाज़'' यहाँ चराग़ वहाँ सिर्फ़ शम-ए-कुश्ता का दूद यहाँ है रिश्ता-ए-अन्फ़ास में तरन्नुम-ए-दोस्त यहाँ लताफ़त-ए-एहसास से ज़ियाँ है न सूद फ़ुग़ाँ कि ''जुम्बिश-ए-आज़ा'' वहाँ असास-ए-नमाज़ ख़ोशा कि लर्ज़िश-ए-दिल है यहाँ क़याम ओ क़ूऊद किसी मक़ाम पे हासिल नहीं क़रार मुझे सहर को हूँ जो बरहमन तो शाम को महमूद ग़रज़ कि आते ही वक़्त-ए-सहर ख़याल-ए-नमाज़ जबीं थी पा-ए-सनम पर ज़बाँ पे ''या-माबूद!'' तमाम राज़-ए-निहाँ खुल गए मिरे दिल पर ज़े-तकिया-गाह-ए-अदम ता-ब-कारगाह-ए-वजूद सर-ए-नियाज़ से ज़ाहिर हुआ तबस्सुम-ए-नाज़ बुतून-ए-ख़ाक से पैदा हुआ दुर-ए-मक़सूद उठा के फिर सर-ए-पुर-शौक़ पा-ए-जानाँ से कहा ये मैं ने कि ऐ सर्व-ए-बोस्वतान-ए-जूद बिया बिया कि तिरा तंग दर कनार कुशेम ज़े-बोसा-मेहर-कुनम बर-लब-ए-शकर-आलूद मिरे लबों को भी दे रुख़्सत-ए-तराना-ए-हम्द हर एक ज़र्रा है इस वक़्त आशना-ए-दुरूद ये सुन के शर्म से कोई जवाब बन न पड़ा झुकी निगाह-ए-जबीं हो गई अरक़-आलूद हया ने बढ़ के पुकारा ये ''काहिशें बे-कार'' नज़र ने झुक के सदा दी ये ''काविशें बे-सूद'' ''दहान-ए-यार कि दरमान-ए-दर्द-ए-'हाफ़िज़' दाश्त फ़ुग़ाँ कि वक़्त-ए-मुरव्वत चे तंग हौसला बूद''
Josh Malihabadi
0 likes
ऐ शख़्स अगर 'जोश' को तो ढूँढ़ना चाहे वो पिछले पहर हल्क़ा-ए-इरफ़ाँ में मिलेगा और सुब्ह को वो नाज़िर-ए-नज़्ज़ारा-ए-क़ुदरत तरफ़-ए-चमन-ओ-सहन-ए-बयाबाँ में मिलेगा और दिन को वो सर-गश्ता-ए-इसरार-ओ-मआ'नी शहर-ए-हुनर-ओ-कू-ए-अदीबाँ में मिलेगा और शाम को वो मर्द-ए-ख़ुदा रिंद-ए-ख़राबात रहमत-कदा-ए-बादा-फ़रोशाँ में मिलेगा और रात को वो ख़ल्वती-ए-काकुल-ओ-रुख़सार बज़्म-ए-तरब-ओ-कूचा-ए-ख़ूबाँ में मिलेगा और होगा कोई जब्र तो वो बंदा-ए-मजबूर मुर्दे की तरह कल्बा-ए-अहज़ाँ में मिलेगा
Josh Malihabadi
0 likes
ऐ यार-ए-दिल-नशीं वो अदा कौन ले गया तेरे नगीं से नक़्श-ए-वफ़ा कौन ले गया हल कर दिया था जिस ने मुअ'म्मा शबाब का तुझ से वो फ़िक्र-ए-उक़्दा-कुशा कौन ले गया था लुत्फ़ पहले क़हर में अब सिर्फ़ क़हर है ज़ुल्मत से मौज-ए-आब-ए-बक़ा कौन ले गया क्यूँँ दफ़्अ'तन लबों पे ख़मोशी सी छा गई इस साज़-ए-दिल-नशीं की सदा कौन ले गया आँखों से शान-ए-बज़्ल-ओ-सख़ा किस ने छीन ली सीने से ज़ौक़-ए-लुत्फ़-ओ-अता कौन ले गया थीं जिस की रौ से ख़ून-ए-तमन्ना में सुर्ख़ियाँ रुख़्सार से वो रंग-ए-वफ़ा कौन ले गया रातों को माँगना था दुआ मेरी दीद की वो मिन्नतें वो ज़ौक़-ए-दुआ कौन ले गया ऐ शाह बंदा-पर्वर-ए-सुल्तान-ए-नर्म-दिल दिल से तिरे ख़याल-ए-गदा कौन ले गया पहली सी वो कलाम में नर्मी नहीं रही गुफ़्तार से मिज़ाज-ए-सबा कौन ले गया अब 'जोश' के लिए हैं न आँसू न आह-ए-सर्द इस गुल्सिताँ की आब-ओ-हवा कौन ले गया
Josh Malihabadi
0 likes
क्या हाल कहें उस मौसम का जब जिंस-ए-जवानी सस्ती थी जिस फूल को चूमो खुलता था जिस शय को देखो हँसती थी जीना सच्चा जीना था हस्ती ऐन हस्ती थी अफ़्साना जादू अफ़्सूँ था ग़फ़लत नींदें मस्ती थी उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी ग़फ़लत नींदें हस्ती थी आँखें क्या पैमाने थे हर रोज़ जवानी बिकती थी हर शाम-ओ-सहर बैआ'ने थे हर ख़ार में इक बुत-ख़ाना था हर फूल में सौ मय-ख़ाने थे काली काली ज़ुल्फ़ें थीं गोरे गोरे शाने थे उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी गोरे गोरे शाने थे हल्की-फुल्की बाँहें थीं हर-गाम पे ख़ल्वत-ख़ाने थे हर मोड़ पे इशरत-गाहें थीं तुग़्यान ख़ुशी के आँसू थे तकमील-ए-तरब की आहें थीं इश्वे चुहलें ग़म्ज़े थे पल्तीं ख़ुशियाँ चाहीं थीं उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी
Josh Malihabadi
0 likes
अब सबा कूचा-ए-जानाँ में गुज़रे है कि नहीं तुझ को इस फ़ित्ना-ए-आलम की ख़बर है कि नहीं बुझ गया मेहर का फ़ानूस कि रौशन है अभी अब उन आँखों में लगावट का असर है कि नहीं अब मेरे नाम का पढ़ता है वज़ीफ़ा कोई अब मिरा ज़िक्र-ए-वफ़ा दर्द-ए-सहर है कि नहीं अब भी तकती हैं मिरी राह वो काफ़िर आँखें अब भी दुज़्दीदा नज़र जानिब-ए-दर है कि नहीं छुप के रातों को मिरी याद में रोता है कोई मौजज़न आँख में अब ख़ून-ए-जिगर है कि नहीं हुस्न को पुर्सिश-ए-बीमार का है अब भी ख़याल मेहर की ज़र्रा ख़ाकी पे नज़र है कि नहीं बे-ख़बर मुझ को ज़माने से किया है जिस ने कुछ उसे मेरी तबाही की ख़बर है कि नहीं खाए जाता है मुझे दर्द-ए-ग़रीब-उल-वतनी दिल पर इस जान-ए-वतन के भी असर है कि नहीं 'जोश' ख़ामोश भी हो पूछ रहा है क्या क्या कुछ तुझे ताड़ने वालों की ख़बर है कि नहीं
Josh Malihabadi
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Josh Malihabadi.
Similar Moods
More moods that pair well with Josh Malihabadi's nazm.







