nazmKuch Alfaaz

अलस्सबाह कि थी काएनात सर-ब-सुजूद फ़लक पे शोर-ए-अज़ाँ था ज़मीं पे बाँग-ए-दुरूद बहार शबनम-आसूदा थी कि रूह-ए-ख़लील फ़रोग़-ए-लाला-ओ-गुल था कि आतिश-ए-नमरूद जला रही थी हवा बज़्म-ए-जाँ में शम-ए-तरब मिटा रही थी सबा लौह-ए-दिल से नक़्श-ए-जुमूद गुलों के रंग में थी शान-ए-ख़ंदा-ए-यूसुफ़ कली के साज़ में था लुत्फ़-ए-नग़्मा-ए-दाऊद हर इक जबीं पे दरख़्शाँ था नय्यर-ए-इक़बाल हर एक फ़र्क़ पे ताबाँ था ताला-ए-मसऊद फ़ज़ा-ए-चर्ख़ में दौड़ी हुई थी रूह-ए-ज़ुहूर बिसात-ए-ख़ाक पे छाया हुआ था रंग-ए-नुमूद हसीन ख़्वाब से चौंके थे रसमसाए हुए मचल रही थी हवाओं में बू-ए-अम्बर-ओ-बूद ये रंग देख कर आया मुझे ख़याल-ए-नमाज़ मिरी नमाज़ कि है शाहिद-ओ-शराब-ओ-सुरूद मिरी नमाज़ कि है नग़मा-ए-हुवल-बाक़ी मिरी नमाज़ कि है नारा-ए-हुवल-मौजूद मिरी नमाज़ कि है इश्क़-ए-नाज़िर-ओ-मंज़ूर मिरी नमाज़ कि है हुब्ब-ए-शाहिद-ओ-मशहूद मिरी नमाज़ कि है एक साज़-ए-ला-फ़ानी मरी नमाज़ कि है एक सोज़-ए-ला-महदूद मिरी नमाज़ कि है दीद रू-ए-नाशुस्ता मिरी नमाज़ कि है तौफ़-ए-हुस्न-ए-ख़्वाब-आलूद मिरी नमाज़ ''नज़र'' शैख़ की नमाज़ ''अल्फ़ाज़'' यहाँ चराग़ वहाँ सिर्फ़ शम-ए-कुश्ता का दूद यहाँ है रिश्ता-ए-अन्फ़ास में तरन्नुम-ए-दोस्त यहाँ लताफ़त-ए-एहसास से ज़ियाँ है न सूद फ़ुग़ाँ कि ''जुम्बिश-ए-आज़ा'' वहाँ असास-ए-नमाज़ ख़ोशा कि लर्ज़िश-ए-दिल है यहाँ क़याम ओ क़ूऊद किसी मक़ाम पे हासिल नहीं क़रार मुझे सहर को हूँ जो बरहमन तो शाम को महमूद ग़रज़ कि आते ही वक़्त-ए-सहर ख़याल-ए-नमाज़ जबीं थी पा-ए-सनम पर ज़बाँ पे ''या-माबूद!'' तमाम राज़-ए-निहाँ खुल गए मिरे दिल पर ज़े-तकिया-गाह-ए-अदम ता-ब-कारगाह-ए-वजूद सर-ए-नियाज़ से ज़ाहिर हुआ तबस्सुम-ए-नाज़ बुतून-ए-ख़ाक से पैदा हुआ दुर-ए-मक़सूद उठा के फिर सर-ए-पुर-शौक़ पा-ए-जानाँ से कहा ये मैं ने कि ऐ सर्व-ए-बोस्वतान-ए-जूद बिया बिया कि तिरा तंग दर कनार कुशेम ज़े-बोसा-मेहर-कुनम बर-लब-ए-शकर-आलूद मिरे लबों को भी दे रुख़्सत-ए-तराना-ए-हम्द हर एक ज़र्रा है इस वक़्त आशना-ए-दुरूद ये सुन के शर्म से कोई जवाब बन न पड़ा झुकी निगाह-ए-जबीं हो गई अरक़-आलूद हया ने बढ़ के पुकारा ये ''काहिशें बे-कार'' नज़र ने झुक के सदा दी ये ''काविशें बे-सूद'' ''दहान-ए-यार कि दरमान-ए-दर्द-ए-'हाफ़िज़' दाश्त फ़ुग़ाँ कि वक़्त-ए-मुरव्वत चे तंग हौसला बूद''

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"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए

Abrar Kashif

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चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया जिस ने हिजाज़ियों से दश्त-ए-अरब छुड़ाया मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है यूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया था सारे जहाँ को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया था मिट्टी को जिस की हक़ ने ज़र का असर दिया था तुर्कों का जिस ने दामन हीरों से भर दिया था मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमाँ से फिर ताब दे के जिस ने चमकाए कहकशाँ से वहदत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकाँ से मीर-ए-अरब को आई ठंडी हवा जहाँ से मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है बंदे कलीम जिस के पर्बत जहाँ के सीना नूह-ए-नबी का आ कर ठहरा जहाँ सफ़ीना रिफ़अत है जिस ज़मीं की बाम-ए-फ़लक का ज़ीना जन्नत की ज़िंदगी है जिस की फ़ज़ा में जीना मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

Allama Iqbal

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ये वक़्त क्या है ये वक़्त क्या है ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है ये जब न गुज़रा था तब कहाँ था कहीं तो होगा गुज़र गया है तो अब कहाँ है कहीं तो होगा कहाँ से आया किधर गया है ये कब से कब तक का सिलसिला है ये वक़्त क्या है ये वाक़िए हादसे तसादुम हर एक ग़म और हर इक मसर्रत हर इक अज़िय्यत हर एक लज़्ज़त हर इक तबस्सुम हर एक आँसू हर एक नग़्मा हर एक ख़ुशबू वो ज़ख़्म का दर्द हो कि वो लम्स का हो जादू ख़ुद अपनी आवाज़ हो कि माहौल की सदाएँ ये ज़ेहन में बनती और बिगड़ती हुई फ़ज़ाएँ वो फ़िक्र में आए ज़लज़ले हों कि दिल की हलचल तमाम एहसास सारे जज़्बे ये जैसे पत्ते हैं बहते पानी की सतह पर जैसे तैरते हैं अभी यहाँ हैं अभी वहाँ हैं और अब हैं ओझल दिखाई देता नहीं है लेकिन ये कुछ तो है जो कि बह रहा है ये कैसा दरिया है किन पहाड़ों से आ रहा है ये किस समुंदर को जा रहा है ये वक़्त क्या है कभी कभी मैं ये सोचता हूँ कि चलती गाड़ी से पेड़ देखो तो ऐसा लगता है दूसरी सम्त जा रहे हैं मगर हक़ीक़त में पेड़ अपनी जगह खड़े हैं तो क्या ये मुमकिन है सारी सदियाँ क़तार-अंदर-क़तार अपनी जगह खड़ी हों ये वक़्त साकित हो और हम ही गुज़र रहे हों इस एक लम्हे में सारे लम्हे तमाम सदियाँ छुपी हुई हों न कोई आइंदा न गुज़िश्ता जो हो चुका है जो हो रहा है जो होने वाला है हो रहा है मैं सोचता हूँ कि क्या ये मुमकिन है सच ये हो कि सफ़र में हम हैं गुज़रते हम हैं जिसे समझते हैं हम गुज़रता है वो थमा है गुज़रता है या थमा हुआ है इकाई है या बटा हुआ है है मुंजमिद या पिघल रहा है किसे ख़बर है किसे पता है ये वक़्त क्या है ये काएनात-ए-अज़ीम लगता है अपनी अज़्मत से आज भी मुतइन नहीं है कि लम्हा लम्हा वसीअ-तर और वसीअ-तर होती जा रही है ये अपनी बाँहें पसारती है ये कहकशाओं की उँगलियों से नए ख़लाओं को छू रही है अगर ये सच है तो हर तसव्वुर की हद से बाहर मगर कहीं पर यक़ीनन ऐसा कोई ख़ला है कि जिस को इन कहकशाओं की उँगलियों ने अब तक छुआ नहीं है ख़ला जहाँ कुछ हुआ नहीं है ख़ला कि जिस ने किसी से भी ''कुन'' सुना नहीं है जहाँ अभी तक ख़ुदा नहीं है वहाँ कोई वक़्त भी न होगा ये काएनात-ए-अज़ीम इक दिन छुएगी इस अन-छुए ख़ला को और अपने सारे वजूद से जब पुकारेगी ''कुन'' तो वक़्त को भी जनम मिलेगा अगर जनम है तो मौत भी है मैं सोचता हूँ ये सच नहीं है कि वक़्त की कोई इब्तिदा है न इंतिहा है ये डोर लंबी बहुत है लेकिन कहीं तो इस डोर का सिरा है अभी ये इंसाँ उलझ रहा है कि वक़्त के इस क़फ़स में पैदा हुआ यहीं वो पला-बढ़ा है मगर उसे इल्म हो गया है कि वक़्त के इस क़फ़स से बाहर भी इक फ़ज़ा है तो सोचता है वो पूछता है ये वक़्त क्या है

Javed Akhtar

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू ले कर चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज् का साहिल कहीं तो जा के रुकेगा सफ़िना-ए-ग़म-ए-दिल जवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों से चले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े दयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों से पुकारती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगन बहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामन सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी दबी थी थकन सुना है हो भी चुका है फ़िरक़-ए-ज़ुल्मत-ए-नूर सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम बदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूर निशात-ए-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाब-ए-हिज्र-ए-हराम जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन किसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहीं कहाँ से आई निगार-ए-सबा, किधर को गई अभी चिराग़-ए-सर-ए-रह को कुछ ख़बर ही नहीं अभी गरानि-ए-शब में कमी नहीं आई नजात-ए-दीद-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई

Faiz Ahmad Faiz

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अब सबा कूचा-ए-जानाँ में गुज़रे है कि नहीं तुझ को इस फ़ित्ना-ए-आलम की ख़बर है कि नहीं बुझ गया मेहर का फ़ानूस कि रौशन है अभी अब उन आँखों में लगावट का असर है कि नहीं अब मेरे नाम का पढ़ता है वज़ीफ़ा कोई अब मिरा ज़िक्र-ए-वफ़ा दर्द-ए-सहर है कि नहीं अब भी तकती हैं मिरी राह वो काफ़िर आँखें अब भी दुज़्दीदा नज़र जानिब-ए-दर है कि नहीं छुप के रातों को मिरी याद में रोता है कोई मौजज़न आँख में अब ख़ून-ए-जिगर है कि नहीं हुस्न को पुर्सिश-ए-बीमार का है अब भी ख़याल मेहर की ज़र्रा ख़ाकी पे नज़र है कि नहीं बे-ख़बर मुझ को ज़माने से किया है जिस ने कुछ उसे मेरी तबाही की ख़बर है कि नहीं खाए जाता है मुझे दर्द-ए-ग़रीब-उल-वतनी दिल पर इस जान-ए-वतन के भी असर है कि नहीं 'जोश' ख़ामोश भी हो पूछ रहा है क्या क्या कुछ तुझे ताड़ने वालों की ख़बर है कि नहीं

Josh Malihabadi

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क्या हाल कहें उस मौसम का जब जिंस-ए-जवानी सस्ती थी जिस फूल को चूमो खुलता था जिस शय को देखो हँसती थी जीना सच्चा जीना था हस्ती ऐन हस्ती थी अफ़्साना जादू अफ़्सूँ था ग़फ़लत नींदें मस्ती थी उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी ग़फ़लत नींदें हस्ती थी आँखें क्या पैमाने थे हर रोज़ जवानी बिकती थी हर शाम-ओ-सहर बैआ'ने थे हर ख़ार में इक बुत-ख़ाना था हर फूल में सौ मय-ख़ाने थे काली काली ज़ुल्फ़ें थीं गोरे गोरे शाने थे उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी गोरे गोरे शाने थे हल्की-फुल्की बाँहें थीं हर-गाम पे ख़ल्वत-ख़ाने थे हर मोड़ पे इशरत-गाहें थीं तुग़्यान ख़ुशी के आँसू थे तकमील-ए-तरब की आहें थीं इश्वे चुहलें ग़म्ज़े थे पल्तीं ख़ुशियाँ चाहीं थीं उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी

Josh Malihabadi

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छा गई बरसात की पहली घटा अब क्या करूँँ ख़ौफ़ था जिस का वो आ पहुँची बला अब क्या करूँँ हिज्र को बहला चली थी गर्म मौसम की सुमूम ना-गहाँ चलने लगी ठंडी हवा अब क्या करूँँ आँख उठी ही थी कि अब्र-ए-लाला-गूँ की छाँव में दर्द से कहने लगा कुछ झुटपुटा अब क्या करूँँ अश्क अभी थमने न पाए थे कि बे-दर्दी के साथ बूंदियों से बोस्ताँ बजने लगा अब क्या करूँँ ज़ख़्म अब भरने न पाए थे कि बादल चर्ख़ पर आ गया अंगड़ाइयाँ लेता हुआ अब क्या करूँँ आ चुकी थी नींद सी ग़म को कि मौसम ना-गहाँ बहर-ओ-बर में करवटें लेने लगा अब क्या करूँँ चर्ख़ की बे-रंगियों से सुस्त थी रफ़्तार-ए-ग़म यक-ब-यक हर ज़र्रा गुलशन बन गया अब क्या करूँँ क़ुफ़्ल-ए-बाब-ए-शौक़ थीं माहौल की ख़ामोशियाँ दफ़अ'तन काफ़िर पपीहा बोल उठा अब क्या करूँँ हिज्र का सीने में कुछ कम हो चला था पेच-ओ-ताब बाल बिखराने लगी काली घटा अब क्या करूँँ आँख झपकाने लगी थी दिल में याद-ए-लहन-ए-याद मोर की आने लगी बन से सदा अब क्या करूँँ घट चला था ग़म की रंगीं बदलियों की आड़ से उन का चेहरा सामने आने लगा अब क्या करूँँ आ रही हैं अब्र से उन की सदाएँ 'जोश' 'जोश' ऐ ख़ुदा अब क्या करूँँ बार-ए-ख़ुदा अब क्या करूँँ

Josh Malihabadi

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रहम ऐ नक़्क़ाद-ए-फ़न ये क्या सितम करता है तू कोई नोक-ए-ख़ार से छूता है नब्ज़-ए-रंग-ओ-बू शा'इरी और मंतक़ी बहसें ये कैसा क़त्ल-ए-आम बुर्रिश-ए-मिक़राज़ का देता है ज़ुल्फ़ों को पयाम क्यूँँ उठा है जिंस-ए-शायर के परखने के लिए क्या शमीम-ए-सुम्बुल-ओ-नस्रीं है चखने के लिए ऐ अदब ना-आश्ना ये भी नहीं तुझ को ख़याल नंग है बज़्म-ए-सुख़न में मदरसे की क़ील-ओ-क़ाल मंतक़ी काँटे पे रखता है कलाम-ए-दिल-पज़ीर काश इस नुक्ते को समझे तेरी तब-ए-हर्फ़-गीर या'नी इक लय से लब-ए-नाक़िद को खुलना चाहिए पंखुड़ी पर क़तरा-ए-शबनम को तुलना चाहिए शेर-फ़हमी के लिए हैं जो शराइत बे-ख़बर सोच तू पूरा उतरता भी है उस मेआर पर जलते देखा है कभी हस्ती के दिल का तू ने दाग़ आँच से जिस की ग़िज़ा पाता है शाइ'र का दिमाग़ दिल से अपने पूछ ओ ज़िन्दानी-ए-इल्म-ए-किताब हुस्न-ए-क़ुदरत को भी देखा है बर-अफ़गन्दा-नक़ाब तू पता असरार-ए-हस्ती का लगाता है कभी आलम-ए-महसूस से बाहर भी जाता है कभी क्या वहाँ भी उड़ के पहुँचा है कभी ऐ नुक्ता-चीं काँपता है जिस फ़ज़ा में शहपर रूहुल-अमीं ख़ामुशी की नग़्मा-रेज़ी पर भी सर धुनता है तू क़ल्ब-ए-फ़ितरत के धड़कने की सदा सुनता है तू अब बुतों की बज़्म में तू भी हुआ है बारयाब ख़ाक को परछाइयाँ जिन की बनाती हैं गुलाब जो तबस्सुम छीन लेते हैं शब-ए-महताब से जिन की बरनाई जगाती है दिलों को ख़्वाब से सच बता तू भी है क्या ऐ कुश्ता-ए-सद-हिर्स-ओ-आज़ राज़-दान-ए-काकुल-ए-शब-रंग ओ चश्म-ए-नीम-बाज़ तेरी नब्ज़ों में भी मचली है कभी बिजली की रौ सोज़-ए-ग़म से तेरा दिल भी क्या कभी देता है लौ सच बता ऐ आशिक़-ए-देरीना-ए-फ़िक्र-ए-मआश ज़हर में तिरयाक के उंसुर की भी की है तलाश मुझ से आँखें तो मिला ऐ दुश्मन-ए-सोज़-ओ-गुदाज़ तुझ पे क्या अज़दाद की तौहीद का इफ़शा है राज़ तेरी रातों की सियाही में भी ऐ ज़ुल्मत-मआब क्या कभी ताले हुआ है मुस्कुरा कर आफ़्ताब तू गया भी है निगार-ए-ग़म की महमिल के क़रीब आँच सी महसूस होती ही कभी दिल के क़रीब तौर-ए-मअ'नी पर भी ऐ ना-फ़हम चढ़ सकता है तू क्या मुसन्निफ़ की किताब-ए-दिल भी पढ़ सकता है तू ये नहीं तो फेर ले आँखें ये जल्वा और है तेरी दुनिया और है शाइ'र की दुनिया और है शे'र की तहलील से पहले मिरी तक़रीर सुन ख़ुद ज़बान-ए-शेर से आ शे'र की तफ़्सीर सुन दिल में जब अश'आर की होती है बारिश बे-शुमार नुत्क़ पर बूँदें टपक पड़ती हैं कुछ बे-इख़्तियार ढाल लेती है जिन्हें शाइ'र की तरकीब-ए-अदब ढल के गो वो गौहर-ए-ग़लताँ का पाती हैं लक़ब और होती हैं तजल्ली-बख़्श ताज-ए-ज़र-फ़िशाँ फिर भी वो शाइ'र की नज़रों में हैं ख़ाली सीपियाँ जिन के असरार-ए-दरख़्शाँ रूह की महफ़िल में हैं सीपियाँ हैं नुत्क़ की मौजों पे मोती दिल में हैं शा'इरी का ख़ानमाँ है नुत्क़ का लूटा हुआ उस का शीशा है ज़बाँ की ठेस से टूटा हुआ छाए रहते हैं जो शाइ'र के दिल-ए-सरशार पर टूट कर आते हैं वो नग़्में लब-ए-गुफ़्तार पर जागते रहते हैं दिल की महफ़िल-ए-ख़ामोश में बंद कर लेते हैं आँखें नुत्क़ के आग़ोश में लोग जिन की जाँ-गुदाज़ी से हैं दिल पकड़े हुए खोखले नग़्में हैं वो औज़ान में जकड़े हुए शे'र हो जाता है सिर्फ़ इक जुम्बिश-ए-लब से निढाल साँस की गर्मी से पड़ जाता है इस शीशे में बाल जाम में आते ही उड़ जाती है शाइ'र की शराब टूट जाता है किनारे आते आते ये हुबाब इस से बढ़ कर और हो सकती है क्या हैरत की बात शे'र को समझा अगर शाइ'र की तू ने काएनात शे'र किया जज़्ब-ए-दरूँ का एक नक़्श-ए-ना-तमाम मुश्तबा सा इक इशारा एक मुबहम सा कलाम कैफ़ में इक ''लग़्ज़िश-ए-पा'' किल्क-ए-गौहर-बार की ''इज़्तिरारी एक जुम्बिश सी'' लब-ए-गुफ़्तार की ''एक सौत-ए-ख़स्ता-ओ-मौहूम साज़-ए-ज़ौक़ की'' ''मुर्तइश सी एक आवाज़'' इंतिहा-ए-शौक़ की बे-हक़ीक़त नय के अंदर ज़मज़मा दाऊद का आरिज़-ए-महदूद पर इक अक्स ला-महदूद का 'शे'र' क्या अक़्ल ओ जुनूँ की मुश्तरक बज़्म-ए-जमाल 'शे'र' क्या है इश्क़ ओ हिकमत का मक़ाम-ए-इत्तिसाल ज़ुल्मत-ए-इबहाम में परछाईं तफ़सीलात की पेच ओ ख़म खाते बगूले में चमक ज़र्रात की जू-ए-क़ुदरत की रवानी दश्त-ए-मस्नूआत में टूटना रंगीं सितारे का अँधेरी रात में शे'र क्या है नीम बेदारी में बहना मौज का बर्ग-ए-गुल पर नींद में शबनम के गिरने की सदा तर-ज़बानी और ख़ामोशी की मुबहम गुफ़्तुगू लफ़्ज़ ओ मअ'नी में तवाज़ुन की नहुफ़्ता आरज़ू बादलों से माह-ए-नौ की इक उचटती सी ज़िया झाँकना क़तरे के रौज़न से उरूस-ए-बहर का मर के भी तू शा'इरी का भेद पा सकता नहीं अक़्ल में ये मसअला नाज़ुक है आ सकता नहीं तू समझता था जो कहना चाहिए था कह गया पूछ शाइ'र से कि वो क्या कह सका क्या रह गया कौन समझे शे'र ये कैसे हैं और कैसे नहीं दिल समझता है कि जैसे दिल में थे वैसे नहीं

Josh Malihabadi

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झुट-पुटे का नर्म-रौ दरिया शफ़क़ का इज़्तिराब खेतियाँ मैदान ख़ामोशी ग़ुरूब-ए-आफ़्ताब दश्त के काम-ओ-दहन को दिन की तल्ख़ी से फ़राग़ दूर दरिया के किनारे धुँदले धुँदले से चराग़ ज़ेर-ए-लब अर्ज़ ओ समा में बाहमी गुफ़्त-ओ-शुनूद मिशअल-ए-गर्दूं के बुझ जाने से इक हल्का सा दूद वुसअतें मैदान की सूरज के छुप जाने से तंग सब्ज़ा-ए-अफ़्सुर्दा पर ख़्वाब-आफ़रीं हल्का सा रंग ख़ामुशी और ख़ामुशी में सनसनाहट की सदा शाम की ख़ुनकी से गोया दिन की गर्मी का गिला अपने दामन को बराबर क़त्अ सा करता हुआ तीरगी में खेतियों के दरमियाँ का फ़ासला ख़ार-ओ-ख़स पर एक दर्द-अंगेज़ अफ़्साने की शान बाम-ए-गर्दूं पर किसी के रूठ कर जाने की शान दूब की ख़ुश्बू में शबनम की नमी से इक सुरूर चर्ख़ पर बादल ज़मीं पर तितलियाँ सर पर तुयूर पारा पारा अब्र सुर्ख़ी सुर्ख़ियों में कुछ धुआँ भूली-भटकी सी ज़मीं खोया हुआ सा आसमाँ पत्तियाँ मख़मूर कलियाँ आँख झपकाती हुई नर्म-जाँ पौदों को गोया नींद सी आती हुई ये समाँ और इक क़वी इंसान या'नी काश्त-कार इर्तिक़ा का पेशवा तहज़ीब का परवरदिगार जिस के माथे के पसीने से पए-इज़्ज़-ओ-वक़ार करती है दरयूज़ा-ए-ताबिश कुलाह-ए-ताजदार सर-निगूँ रहती हैं जिस से क़ुव्वतें तख़रीब की जिस के बूते पर लचकती है कमर तहज़ीब की जिस की मेहनत से फबकता है तन-आसानी का बाग़ जिस की ज़ुल्मत की हथेली पर तमद्दुन का चराग़ जिस के बाज़ू की सलाबत पर नज़ाकत का मदार जिस के कस-बल पर अकड़ता है ग़ुरूर-ए-शहरयार धूप के झुलसे हुए रुख़ पर मशक़्क़त के निशाँ खेत से फेरे हुए मुँह घर की जानिब है रवाँ टोकरा सर पर बग़ल में फावड़ा तेवरी पे बल सामने बैलों की जोड़ी दोश पर मज़बूत हल कौन हल ज़ुल्मत-शिकन क़िंदील-ए-बज़्म-ए-आब-ओ-गिल क़स्र-ए-गुलशन का दरीचा सीना-ए-गीती का दिल ख़ुशनुमा शहरों का बानी राज़-ए-फ़ितरत का सुराग़ ख़ानदान-ए-तेग़-ए-जौहर-दार का चश्म-ओ-चराग़ धार पर जिस की चमन-परवर शगूफ़ों का निज़ाम शाम-ए-ज़ेर-ए-अर्ज़ को सुब्ह-ए-दरख़्शाँ का पयाम डूबता है ख़ाक में जो रूह दौड़ाता हुआ मुज़्महिल ज़र्रों की मौसीक़ी को चौंकाता हुआ जिस के छू जाते ही मिस्ल-ए-नाज़नीन-ए-मह-जबीं करवटों पर करवटें लेती है लैला-ए-ज़मीं पर्दा-हा-ए-ख़्वाब हो जाते हैं जिस से चाक चाक मुस्कुरा कर अपनी चादर को हटा देती है ख़ाक जिस की ताबिश में दरख़शानी हिलाल-ए-ईद की ख़ाक के मायूस मतला पर किरन उम्मीद की तिफ़्ल-ए-बाराँ ताजदार-ए-ख़ाक अमीर-ए-बोस्ताँ माहिर-ए-आईन-ए-क़ुदरत नाज़िम-ए-बज़्म-ए-जहाँ नाज़िर-ए-गुल पासबान-ए-रंग-ओ-बू गुलशन-पनाह नाज़-परवर लहलहाती खेतियों का बादशाह वारिस-ए-असरार-ए-फ़ितरत फ़ातेह-ए-उम्मीद-ओ-बीम महरम-ए-आसार-ए-बाराँ वाक़िफ़-ए-तब्अ-ए-नसीम सुब्ह का फ़रज़ंद ख़ुर्शीद-ए-ज़र-अफ़शाँ का अलम मेहनत-ए-पैहम का पैमाँ सख़्त-कोशी की क़सम जल्वा-ए-क़ुदरत का शाहिद हुस्न-ए-फ़ितरत का गवाह माह का दिल मेहर-ए-आलम-ताब का नूर-ए-निगाह क़ल्ब पर जिस के नुमायाँ नूर ओ ज़ुल्मत का निज़ाम मुन्कशिफ़ जिस की फ़रासत पर मिज़ाज-ए-सुब्ह-ओ-शाम ख़ून है जिस की जवानी का बहार-ए-रोज़गार जिस के अश्कों पर फ़राग़त के तबस्सुम का मदार जिस की मेहनत का अरक़ तय्यार करता है शराब उड़ के जिस का रंग बिन जाता है जाँ-परवर गुलाब क़ल्ब-ए-आहन जिस के नक़्श-ए-पास होता है रक़ीक़ शो'ला-ख़ू झोंकों का हमदम तेज़ किरनों का रफ़ीक़ ख़ून जिस का बिजलियों की अंजुमन में बारयाब जिस के सर पर जगमगाती है कुलाह-ए-आफ़्ताब लहर खाता है रग-ए-ख़ाशाक में जिस का लहू जिस के दिल की आँच बन जाती है सैल-ए-रंग-ओ-बू दौड़ती है रात को जिस की नज़र अफ़्लाक पर दिन को जिस की उँगलियाँ रहती हैं नब्ज़-ए-ख़ाक पर जिस की जाँकाही से टपकाती है अमृत नब्ज़-ए-ताक जिस के दम से लाला-ओ-गुल बन के इतराती है ख़ाक साज़-ए-दौलत को अता करती है नग़्में जिस की आह माँगता है भीक ताबानी की जिस से रू-ए-शाह ख़ून जिस का दौड़ता है नब्ज़-ए-इस्तिक़्लाल में लोच भर देता है जो शहज़ादियों की चाल में जिस का मस ख़ाशाक में बनता है इक चादर महीन जिस का लोहा मान कर सोना उगलती है ज़मीन हल पे दहक़ाँ के चमकती हैं शफ़क़ की सुर्ख़ियाँ और दहक़ाँ सर झुकाए घर की जानिब है रवाँ उस सियासी रथ के पहियों पर जमाए है नज़र जिस में आ जाती है तेज़ी खेतियों को रौंद कर अपनी दौलत को जिगर पर तीर-ए-ग़म खाते हुए देखता है मुल्क-ए-दुश्मन की तरफ़ जाते हुए क़त्अ होती ही नहीं तारीकी-ए-हिरमाँ से राह फ़ाक़ा-कश बच्चों के धुँदले आँसुओं पर है निगाह सोचता जाता है किन आँखों से देखा जाएगा बे-रिदा बीवी का सर बच्चों का मुँह उतरा हुआ सीम-ओ-ज़र नान-ओ-नमक आब-ओ-ग़िज़ा कुछ भी नहीं घर में इक ख़ामोश मातम के सिवा कुछ भी नहीं एक दिल और ये हुजूम-ए-सोगवारी हाए हाए ये सितम ऐ संग-दिल सरमाया-दारी हाए हाए तेरी आँखों में हैं ग़लताँ वो शक़ावत के शरार जिन के आगे ख़ंजर-ए-चंगेज़ की मुड़ती है धार बेकसों के ख़ून में डूबे हुए हैं तेरे हात क्या चबा डालेगी ओ कम्बख़्त सारी काएनात ज़ुल्म और इतना कोई हद भी है इस तूफ़ान की बोटियाँ हैं तेरे जबड़ों में ग़रीब इंसान की देख कर तेरे सितम ऐ हामी-ए-अम्न-ओ-अमाँ गुर्ग रह जाते हैं दाँतों में दबा कर उँगलियाँ इद्दिआ-ए-पैरवी-ए-दीन-ओ-ईमाँ और तू देख अपनी कुहनीयाँ जिन से टपकता है लहू हाँ सँभल जा अब कि ज़हर-ए-अहल-ए-दिल के आब हैं कितने तूफ़ान तेरी कश्ती के लिए बे-ताब हैं

Josh Malihabadi

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