nazmKuch Alfaaz

रहम ऐ नक़्क़ाद-ए-फ़न ये क्या सितम करता है तू कोई नोक-ए-ख़ार से छूता है नब्ज़-ए-रंग-ओ-बू शा'इरी और मंतक़ी बहसें ये कैसा क़त्ल-ए-आम बुर्रिश-ए-मिक़राज़ का देता है ज़ुल्फ़ों को पयाम क्यूँँ उठा है जिंस-ए-शायर के परखने के लिए क्या शमीम-ए-सुम्बुल-ओ-नस्रीं है चखने के लिए ऐ अदब ना-आश्ना ये भी नहीं तुझ को ख़याल नंग है बज़्म-ए-सुख़न में मदरसे की क़ील-ओ-क़ाल मंतक़ी काँटे पे रखता है कलाम-ए-दिल-पज़ीर काश इस नुक्ते को समझे तेरी तब-ए-हर्फ़-गीर या'नी इक लय से लब-ए-नाक़िद को खुलना चाहिए पंखुड़ी पर क़तरा-ए-शबनम को तुलना चाहिए शेर-फ़हमी के लिए हैं जो शराइत बे-ख़बर सोच तू पूरा उतरता भी है उस मेआर पर जलते देखा है कभी हस्ती के दिल का तू ने दाग़ आँच से जिस की ग़िज़ा पाता है शाइ'र का दिमाग़ दिल से अपने पूछ ओ ज़िन्दानी-ए-इल्म-ए-किताब हुस्न-ए-क़ुदरत को भी देखा है बर-अफ़गन्दा-नक़ाब तू पता असरार-ए-हस्ती का लगाता है कभी आलम-ए-महसूस से बाहर भी जाता है कभी क्या वहाँ भी उड़ के पहुँचा है कभी ऐ नुक्ता-चीं काँपता है जिस फ़ज़ा में शहपर रूहुल-अमीं ख़ामुशी की नग़्मा-रेज़ी पर भी सर धुनता है तू क़ल्ब-ए-फ़ितरत के धड़कने की सदा सुनता है तू अब बुतों की बज़्म में तू भी हुआ है बारयाब ख़ाक को परछाइयाँ जिन की बनाती हैं गुलाब जो तबस्सुम छीन लेते हैं शब-ए-महताब से जिन की बरनाई जगाती है दिलों को ख़्वाब से सच बता तू भी है क्या ऐ कुश्ता-ए-सद-हिर्स-ओ-आज़ राज़-दान-ए-काकुल-ए-शब-रंग ओ चश्म-ए-नीम-बाज़ तेरी नब्ज़ों में भी मचली है कभी बिजली की रौ सोज़-ए-ग़म से तेरा दिल भी क्या कभी देता है लौ सच बता ऐ आशिक़-ए-देरीना-ए-फ़िक्र-ए-मआश ज़हर में तिरयाक के उंसुर की भी की है तलाश मुझ से आँखें तो मिला ऐ दुश्मन-ए-सोज़-ओ-गुदाज़ तुझ पे क्या अज़दाद की तौहीद का इफ़शा है राज़ तेरी रातों की सियाही में भी ऐ ज़ुल्मत-मआब क्या कभी ताले हुआ है मुस्कुरा कर आफ़्ताब तू गया भी है निगार-ए-ग़म की महमिल के क़रीब आँच सी महसूस होती ही कभी दिल के क़रीब तौर-ए-मअ'नी पर भी ऐ ना-फ़हम चढ़ सकता है तू क्या मुसन्निफ़ की किताब-ए-दिल भी पढ़ सकता है तू ये नहीं तो फेर ले आँखें ये जल्वा और है तेरी दुनिया और है शाइ'र की दुनिया और है शे'र की तहलील से पहले मिरी तक़रीर सुन ख़ुद ज़बान-ए-शेर से आ शे'र की तफ़्सीर सुन दिल में जब अश'आर की होती है बारिश बे-शुमार नुत्क़ पर बूँदें टपक पड़ती हैं कुछ बे-इख़्तियार ढाल लेती है जिन्हें शाइ'र की तरकीब-ए-अदब ढल के गो वो गौहर-ए-ग़लताँ का पाती हैं लक़ब और होती हैं तजल्ली-बख़्श ताज-ए-ज़र-फ़िशाँ फिर भी वो शाइ'र की नज़रों में हैं ख़ाली सीपियाँ जिन के असरार-ए-दरख़्शाँ रूह की महफ़िल में हैं सीपियाँ हैं नुत्क़ की मौजों पे मोती दिल में हैं शा'इरी का ख़ानमाँ है नुत्क़ का लूटा हुआ उस का शीशा है ज़बाँ की ठेस से टूटा हुआ छाए रहते हैं जो शाइ'र के दिल-ए-सरशार पर टूट कर आते हैं वो नग़्में लब-ए-गुफ़्तार पर जागते रहते हैं दिल की महफ़िल-ए-ख़ामोश में बंद कर लेते हैं आँखें नुत्क़ के आग़ोश में लोग जिन की जाँ-गुदाज़ी से हैं दिल पकड़े हुए खोखले नग़्में हैं वो औज़ान में जकड़े हुए शे'र हो जाता है सिर्फ़ इक जुम्बिश-ए-लब से निढाल साँस की गर्मी से पड़ जाता है इस शीशे में बाल जाम में आते ही उड़ जाती है शाइ'र की शराब टूट जाता है किनारे आते आते ये हुबाब इस से बढ़ कर और हो सकती है क्या हैरत की बात शे'र को समझा अगर शाइ'र की तू ने काएनात शे'र किया जज़्ब-ए-दरूँ का एक नक़्श-ए-ना-तमाम मुश्तबा सा इक इशारा एक मुबहम सा कलाम कैफ़ में इक ''लग़्ज़िश-ए-पा'' किल्क-ए-गौहर-बार की ''इज़्तिरारी एक जुम्बिश सी'' लब-ए-गुफ़्तार की ''एक सौत-ए-ख़स्ता-ओ-मौहूम साज़-ए-ज़ौक़ की'' ''मुर्तइश सी एक आवाज़'' इंतिहा-ए-शौक़ की बे-हक़ीक़त नय के अंदर ज़मज़मा दाऊद का आरिज़-ए-महदूद पर इक अक्स ला-महदूद का 'शे'र' क्या अक़्ल ओ जुनूँ की मुश्तरक बज़्म-ए-जमाल 'शे'र' क्या है इश्क़ ओ हिकमत का मक़ाम-ए-इत्तिसाल ज़ुल्मत-ए-इबहाम में परछाईं तफ़सीलात की पेच ओ ख़म खाते बगूले में चमक ज़र्रात की जू-ए-क़ुदरत की रवानी दश्त-ए-मस्नूआत में टूटना रंगीं सितारे का अँधेरी रात में शे'र क्या है नीम बेदारी में बहना मौज का बर्ग-ए-गुल पर नींद में शबनम के गिरने की सदा तर-ज़बानी और ख़ामोशी की मुबहम गुफ़्तुगू लफ़्ज़ ओ मअ'नी में तवाज़ुन की नहुफ़्ता आरज़ू बादलों से माह-ए-नौ की इक उचटती सी ज़िया झाँकना क़तरे के रौज़न से उरूस-ए-बहर का मर के भी तू शा'इरी का भेद पा सकता नहीं अक़्ल में ये मसअला नाज़ुक है आ सकता नहीं तू समझता था जो कहना चाहिए था कह गया पूछ शाइ'र से कि वो क्या कह सका क्या रह गया कौन समझे शे'र ये कैसे हैं और कैसे नहीं दिल समझता है कि जैसे दिल में थे वैसे नहीं

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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फ़िरदौस बनाए हुए सावन के महीने इक गुल-रुख़ ओ नस्रीं-बदन ओ सर्व-ए-सही ने माथे पे इधर काकुल-ए-ज़ोलीदा की लहरें गर्दूं पे उधर अब्र-ए-ख़िरामाँ के सफ़ीने मेंह जितना बरसता था सर-ए-दामन-ए-कोहसार इतने ही ज़मीं अपनी उगलती थी दफ़ीने अल्लाह-रे ये फ़रमान कि इस मस्त हवा में हम मुँह से न बोलेंगे अगर पी न किसी ने वो मूनिस-ओ-ग़म-ख़्वार था जिस के लिए बरसों माँगी थीं दुआएँ मिरे आग़ोश-ए-तही ने गुल-रेज़ थे साहिल के लचकते हुए पौदे गुल-रंग थे तालाब के तर्शे हुए ज़ीने बारिश थी लगातार तो यूँँ गर्द थी मफ़क़ूद जिस तरह मय-ए-नाब से धुल जाते हैं सीने दम भर को भी थमती थीं अगर सर्द हवाएँ आते थे जवानी को पसीने पे पसीने भर दी थी चटानों में भी ग़ुंचों की सी नर्मी इक फ़ित्ना-ए-कौनैन की नाज़ुक-बदनी ने गेती से उबलते थे तमन्ना के सलीक़े गर्दूं से बरसते थे मोहब्बत के क़रीने क्या दिल की तमन्नाओं को मरबूत किया था सब्ज़े पे चमकती हुई सावन की झड़ी ने बदली थी फ़लक पर कि जुनूँ-ख़ेज़ जवानी बूँदें थीं ज़मीं पर कि अँगूठी के नगीने शाख़ों पे परिंदे थे झटकते हुए शहपर नहरों में बतें अपने उभारे हुए सीने इस फ़स्ल में इस दर्जा रहा बे-ख़ुद ओ सरशार मयख़ाने से बाहर मुझे देखा न किसी ने क्या लम्हा-ए-फ़ानी था कि मुड़ कर भी न देखा दी कितनी ही आवाज़ हयात-ए-अबदी ने

Josh Malihabadi

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अलस्सबाह कि थी काएनात सर-ब-सुजूद फ़लक पे शोर-ए-अज़ाँ था ज़मीं पे बाँग-ए-दुरूद बहार शबनम-आसूदा थी कि रूह-ए-ख़लील फ़रोग़-ए-लाला-ओ-गुल था कि आतिश-ए-नमरूद जला रही थी हवा बज़्म-ए-जाँ में शम-ए-तरब मिटा रही थी सबा लौह-ए-दिल से नक़्श-ए-जुमूद गुलों के रंग में थी शान-ए-ख़ंदा-ए-यूसुफ़ कली के साज़ में था लुत्फ़-ए-नग़्मा-ए-दाऊद हर इक जबीं पे दरख़्शाँ था नय्यर-ए-इक़बाल हर एक फ़र्क़ पे ताबाँ था ताला-ए-मसऊद फ़ज़ा-ए-चर्ख़ में दौड़ी हुई थी रूह-ए-ज़ुहूर बिसात-ए-ख़ाक पे छाया हुआ था रंग-ए-नुमूद हसीन ख़्वाब से चौंके थे रसमसाए हुए मचल रही थी हवाओं में बू-ए-अम्बर-ओ-बूद ये रंग देख कर आया मुझे ख़याल-ए-नमाज़ मिरी नमाज़ कि है शाहिद-ओ-शराब-ओ-सुरूद मिरी नमाज़ कि है नग़मा-ए-हुवल-बाक़ी मिरी नमाज़ कि है नारा-ए-हुवल-मौजूद मिरी नमाज़ कि है इश्क़-ए-नाज़िर-ओ-मंज़ूर मिरी नमाज़ कि है हुब्ब-ए-शाहिद-ओ-मशहूद मिरी नमाज़ कि है एक साज़-ए-ला-फ़ानी मरी नमाज़ कि है एक सोज़-ए-ला-महदूद मिरी नमाज़ कि है दीद रू-ए-नाशुस्ता मिरी नमाज़ कि है तौफ़-ए-हुस्न-ए-ख़्वाब-आलूद मिरी नमाज़ ''नज़र'' शैख़ की नमाज़ ''अल्फ़ाज़'' यहाँ चराग़ वहाँ सिर्फ़ शम-ए-कुश्ता का दूद यहाँ है रिश्ता-ए-अन्फ़ास में तरन्नुम-ए-दोस्त यहाँ लताफ़त-ए-एहसास से ज़ियाँ है न सूद फ़ुग़ाँ कि ''जुम्बिश-ए-आज़ा'' वहाँ असास-ए-नमाज़ ख़ोशा कि लर्ज़िश-ए-दिल है यहाँ क़याम ओ क़ूऊद किसी मक़ाम पे हासिल नहीं क़रार मुझे सहर को हूँ जो बरहमन तो शाम को महमूद ग़रज़ कि आते ही वक़्त-ए-सहर ख़याल-ए-नमाज़ जबीं थी पा-ए-सनम पर ज़बाँ पे ''या-माबूद!'' तमाम राज़-ए-निहाँ खुल गए मिरे दिल पर ज़े-तकिया-गाह-ए-अदम ता-ब-कारगाह-ए-वजूद सर-ए-नियाज़ से ज़ाहिर हुआ तबस्सुम-ए-नाज़ बुतून-ए-ख़ाक से पैदा हुआ दुर-ए-मक़सूद उठा के फिर सर-ए-पुर-शौक़ पा-ए-जानाँ से कहा ये मैं ने कि ऐ सर्व-ए-बोस्वतान-ए-जूद बिया बिया कि तिरा तंग दर कनार कुशेम ज़े-बोसा-मेहर-कुनम बर-लब-ए-शकर-आलूद मिरे लबों को भी दे रुख़्सत-ए-तराना-ए-हम्द हर एक ज़र्रा है इस वक़्त आशना-ए-दुरूद ये सुन के शर्म से कोई जवाब बन न पड़ा झुकी निगाह-ए-जबीं हो गई अरक़-आलूद हया ने बढ़ के पुकारा ये ''काहिशें बे-कार'' नज़र ने झुक के सदा दी ये ''काविशें बे-सूद'' ''दहान-ए-यार कि दरमान-ए-दर्द-ए-'हाफ़िज़' दाश्त फ़ुग़ाँ कि वक़्त-ए-मुरव्वत चे तंग हौसला बूद''

Josh Malihabadi

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छट गए जब आप ही ऊदी घटा छाई तो क्या तुर्बत-ए-पामाल के सब्ज़े पे लहर आई तो क्या जब ज़रूरत ही रही बाक़ी न लहन-ओ-रंग की कोयलें कूकीं तो क्या सावन की रुत आई तो क्या हिज्र के आलाम से जब छुट चुकी नब्ज़-ए-नशात अब हवा ने ख़ार-ओ-ख़स में रूह दौड़ाई तो क्या हो चुकी ज़ौक़-ए-तबस्सुम ही से जब बेगानगी अब चमन-अफ़रोज़ फूलों को हँसी आई तो क्या मुड़ चुकी जब मौत के जादे की जानिब ज़िंदगी अब किसी ने आफ़ियत की राह दिखलाई तो क्या हर नफ़स के साथ दिल से जब धुआँ उठने लगा बादलों से छन के अब ठंडी हवा आई तो क्या सामने जब आप के गेसू की लहरें ही नहीं बदलियों ने चर्ख़ पर अब ज़ुल्फ़ बिखराई तो क्या हो चुका पायाब जब बहर-ए-सर-ओ-बर्ग-ए-शबाब अब समुंदर की जवानी बाढ़ पर आई तो क्या ग़ुंचा-ए-अहद-ए-तरब ही मिल चुका अब ख़ाक में ख़ाक-ए-गुलशन अब गुल-ए-तर बन के इतराई तो क्या मिट चुके जब वालिहाना बाँकपन के वलवले आई अब दोशीज़ा-ए-मौसम को अँगड़ाई तो क्या खुल चुका जब परचम-ए-ग़म ज़िंदगी के क़स्र पर अब हवाओं ने कमर पौदों की लचकाई तो क्या आँसुओं में बह गईं जब ख़ून की जौलानियाँ जंगलों की छाँव में बरसात इठलाई तो क्या 'जोश' के पहलू में जब तुम ही मचल सकते नहीं फिर घटा के दामनों में बर्क़ लहराई तो क्या

Josh Malihabadi

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ऐ यार-ए-दिल-नशीं वो अदा कौन ले गया तेरे नगीं से नक़्श-ए-वफ़ा कौन ले गया हल कर दिया था जिस ने मुअ'म्मा शबाब का तुझ से वो फ़िक्र-ए-उक़्दा-कुशा कौन ले गया था लुत्फ़ पहले क़हर में अब सिर्फ़ क़हर है ज़ुल्मत से मौज-ए-आब-ए-बक़ा कौन ले गया क्यूँँ दफ़्अ'तन लबों पे ख़मोशी सी छा गई इस साज़-ए-दिल-नशीं की सदा कौन ले गया आँखों से शान-ए-बज़्ल-ओ-सख़ा किस ने छीन ली सीने से ज़ौक़-ए-लुत्फ़-ओ-अता कौन ले गया थीं जिस की रौ से ख़ून-ए-तमन्ना में सुर्ख़ियाँ रुख़्सार से वो रंग-ए-वफ़ा कौन ले गया रातों को माँगना था दुआ मेरी दीद की वो मिन्नतें वो ज़ौक़-ए-दुआ कौन ले गया ऐ शाह बंदा-पर्वर-ए-सुल्तान-ए-नर्म-दिल दिल से तिरे ख़याल-ए-गदा कौन ले गया पहली सी वो कलाम में नर्मी नहीं रही गुफ़्तार से मिज़ाज-ए-सबा कौन ले गया अब 'जोश' के लिए हैं न आँसू न आह-ए-सर्द इस गुल्सिताँ की आब-ओ-हवा कौन ले गया

Josh Malihabadi

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अब सबा कूचा-ए-जानाँ में गुज़रे है कि नहीं तुझ को इस फ़ित्ना-ए-आलम की ख़बर है कि नहीं बुझ गया मेहर का फ़ानूस कि रौशन है अभी अब उन आँखों में लगावट का असर है कि नहीं अब मेरे नाम का पढ़ता है वज़ीफ़ा कोई अब मिरा ज़िक्र-ए-वफ़ा दर्द-ए-सहर है कि नहीं अब भी तकती हैं मिरी राह वो काफ़िर आँखें अब भी दुज़्दीदा नज़र जानिब-ए-दर है कि नहीं छुप के रातों को मिरी याद में रोता है कोई मौजज़न आँख में अब ख़ून-ए-जिगर है कि नहीं हुस्न को पुर्सिश-ए-बीमार का है अब भी ख़याल मेहर की ज़र्रा ख़ाकी पे नज़र है कि नहीं बे-ख़बर मुझ को ज़माने से किया है जिस ने कुछ उसे मेरी तबाही की ख़बर है कि नहीं खाए जाता है मुझे दर्द-ए-ग़रीब-उल-वतनी दिल पर इस जान-ए-वतन के भी असर है कि नहीं 'जोश' ख़ामोश भी हो पूछ रहा है क्या क्या कुछ तुझे ताड़ने वालों की ख़बर है कि नहीं

Josh Malihabadi

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