nazmKuch Alfaaz

फ़िरदौस बनाए हुए सावन के महीने इक गुल-रुख़ ओ नस्रीं-बदन ओ सर्व-ए-सही ने माथे पे इधर काकुल-ए-ज़ोलीदा की लहरें गर्दूं पे उधर अब्र-ए-ख़िरामाँ के सफ़ीने मेंह जितना बरसता था सर-ए-दामन-ए-कोहसार इतने ही ज़मीं अपनी उगलती थी दफ़ीने अल्लाह-रे ये फ़रमान कि इस मस्त हवा में हम मुँह से न बोलेंगे अगर पी न किसी ने वो मूनिस-ओ-ग़म-ख़्वार था जिस के लिए बरसों माँगी थीं दुआएँ मिरे आग़ोश-ए-तही ने गुल-रेज़ थे साहिल के लचकते हुए पौदे गुल-रंग थे तालाब के तर्शे हुए ज़ीने बारिश थी लगातार तो यूँँ गर्द थी मफ़क़ूद जिस तरह मय-ए-नाब से धुल जाते हैं सीने दम भर को भी थमती थीं अगर सर्द हवाएँ आते थे जवानी को पसीने पे पसीने भर दी थी चटानों में भी ग़ुंचों की सी नर्मी इक फ़ित्ना-ए-कौनैन की नाज़ुक-बदनी ने गेती से उबलते थे तमन्ना के सलीक़े गर्दूं से बरसते थे मोहब्बत के क़रीने क्या दिल की तमन्नाओं को मरबूत किया था सब्ज़े पे चमकती हुई सावन की झड़ी ने बदली थी फ़लक पर कि जुनूँ-ख़ेज़ जवानी बूँदें थीं ज़मीं पर कि अँगूठी के नगीने शाख़ों पे परिंदे थे झटकते हुए शहपर नहरों में बतें अपने उभारे हुए सीने इस फ़स्ल में इस दर्जा रहा बे-ख़ुद ओ सरशार मयख़ाने से बाहर मुझे देखा न किसी ने क्या लम्हा-ए-फ़ानी था कि मुड़ कर भी न देखा दी कितनी ही आवाज़ हयात-ए-अबदी ने

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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अलस्सबाह कि थी काएनात सर-ब-सुजूद फ़लक पे शोर-ए-अज़ाँ था ज़मीं पे बाँग-ए-दुरूद बहार शबनम-आसूदा थी कि रूह-ए-ख़लील फ़रोग़-ए-लाला-ओ-गुल था कि आतिश-ए-नमरूद जला रही थी हवा बज़्म-ए-जाँ में शम-ए-तरब मिटा रही थी सबा लौह-ए-दिल से नक़्श-ए-जुमूद गुलों के रंग में थी शान-ए-ख़ंदा-ए-यूसुफ़ कली के साज़ में था लुत्फ़-ए-नग़्मा-ए-दाऊद हर इक जबीं पे दरख़्शाँ था नय्यर-ए-इक़बाल हर एक फ़र्क़ पे ताबाँ था ताला-ए-मसऊद फ़ज़ा-ए-चर्ख़ में दौड़ी हुई थी रूह-ए-ज़ुहूर बिसात-ए-ख़ाक पे छाया हुआ था रंग-ए-नुमूद हसीन ख़्वाब से चौंके थे रसमसाए हुए मचल रही थी हवाओं में बू-ए-अम्बर-ओ-बूद ये रंग देख कर आया मुझे ख़याल-ए-नमाज़ मिरी नमाज़ कि है शाहिद-ओ-शराब-ओ-सुरूद मिरी नमाज़ कि है नग़मा-ए-हुवल-बाक़ी मिरी नमाज़ कि है नारा-ए-हुवल-मौजूद मिरी नमाज़ कि है इश्क़-ए-नाज़िर-ओ-मंज़ूर मिरी नमाज़ कि है हुब्ब-ए-शाहिद-ओ-मशहूद मिरी नमाज़ कि है एक साज़-ए-ला-फ़ानी मरी नमाज़ कि है एक सोज़-ए-ला-महदूद मिरी नमाज़ कि है दीद रू-ए-नाशुस्ता मिरी नमाज़ कि है तौफ़-ए-हुस्न-ए-ख़्वाब-आलूद मिरी नमाज़ ''नज़र'' शैख़ की नमाज़ ''अल्फ़ाज़'' यहाँ चराग़ वहाँ सिर्फ़ शम-ए-कुश्ता का दूद यहाँ है रिश्ता-ए-अन्फ़ास में तरन्नुम-ए-दोस्त यहाँ लताफ़त-ए-एहसास से ज़ियाँ है न सूद फ़ुग़ाँ कि ''जुम्बिश-ए-आज़ा'' वहाँ असास-ए-नमाज़ ख़ोशा कि लर्ज़िश-ए-दिल है यहाँ क़याम ओ क़ूऊद किसी मक़ाम पे हासिल नहीं क़रार मुझे सहर को हूँ जो बरहमन तो शाम को महमूद ग़रज़ कि आते ही वक़्त-ए-सहर ख़याल-ए-नमाज़ जबीं थी पा-ए-सनम पर ज़बाँ पे ''या-माबूद!'' तमाम राज़-ए-निहाँ खुल गए मिरे दिल पर ज़े-तकिया-गाह-ए-अदम ता-ब-कारगाह-ए-वजूद सर-ए-नियाज़ से ज़ाहिर हुआ तबस्सुम-ए-नाज़ बुतून-ए-ख़ाक से पैदा हुआ दुर-ए-मक़सूद उठा के फिर सर-ए-पुर-शौक़ पा-ए-जानाँ से कहा ये मैं ने कि ऐ सर्व-ए-बोस्वतान-ए-जूद बिया बिया कि तिरा तंग दर कनार कुशेम ज़े-बोसा-मेहर-कुनम बर-लब-ए-शकर-आलूद मिरे लबों को भी दे रुख़्सत-ए-तराना-ए-हम्द हर एक ज़र्रा है इस वक़्त आशना-ए-दुरूद ये सुन के शर्म से कोई जवाब बन न पड़ा झुकी निगाह-ए-जबीं हो गई अरक़-आलूद हया ने बढ़ के पुकारा ये ''काहिशें बे-कार'' नज़र ने झुक के सदा दी ये ''काविशें बे-सूद'' ''दहान-ए-यार कि दरमान-ए-दर्द-ए-'हाफ़िज़' दाश्त फ़ुग़ाँ कि वक़्त-ए-मुरव्वत चे तंग हौसला बूद''

Josh Malihabadi

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अब सबा कूचा-ए-जानाँ में गुज़रे है कि नहीं तुझ को इस फ़ित्ना-ए-आलम की ख़बर है कि नहीं बुझ गया मेहर का फ़ानूस कि रौशन है अभी अब उन आँखों में लगावट का असर है कि नहीं अब मेरे नाम का पढ़ता है वज़ीफ़ा कोई अब मिरा ज़िक्र-ए-वफ़ा दर्द-ए-सहर है कि नहीं अब भी तकती हैं मिरी राह वो काफ़िर आँखें अब भी दुज़्दीदा नज़र जानिब-ए-दर है कि नहीं छुप के रातों को मिरी याद में रोता है कोई मौजज़न आँख में अब ख़ून-ए-जिगर है कि नहीं हुस्न को पुर्सिश-ए-बीमार का है अब भी ख़याल मेहर की ज़र्रा ख़ाकी पे नज़र है कि नहीं बे-ख़बर मुझ को ज़माने से किया है जिस ने कुछ उसे मेरी तबाही की ख़बर है कि नहीं खाए जाता है मुझे दर्द-ए-ग़रीब-उल-वतनी दिल पर इस जान-ए-वतन के भी असर है कि नहीं 'जोश' ख़ामोश भी हो पूछ रहा है क्या क्या कुछ तुझे ताड़ने वालों की ख़बर है कि नहीं

Josh Malihabadi

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क्या हाल कहें उस मौसम का जब जिंस-ए-जवानी सस्ती थी जिस फूल को चूमो खुलता था जिस शय को देखो हँसती थी जीना सच्चा जीना था हस्ती ऐन हस्ती थी अफ़्साना जादू अफ़्सूँ था ग़फ़लत नींदें मस्ती थी उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी ग़फ़लत नींदें हस्ती थी आँखें क्या पैमाने थे हर रोज़ जवानी बिकती थी हर शाम-ओ-सहर बैआ'ने थे हर ख़ार में इक बुत-ख़ाना था हर फूल में सौ मय-ख़ाने थे काली काली ज़ुल्फ़ें थीं गोरे गोरे शाने थे उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी गोरे गोरे शाने थे हल्की-फुल्की बाँहें थीं हर-गाम पे ख़ल्वत-ख़ाने थे हर मोड़ पे इशरत-गाहें थीं तुग़्यान ख़ुशी के आँसू थे तकमील-ए-तरब की आहें थीं इश्वे चुहलें ग़म्ज़े थे पल्तीं ख़ुशियाँ चाहीं थीं उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी

Josh Malihabadi

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ऐ दिल-ए-अफ़सुर्दा वो असरार-ए-बातिन क्या हुए सोज़ की रातें कहाँ हैं साज़ के दिन क्या हुए आँसुओं की वो झड़ी वो ग़म का सामाँ क्या हुआ तेरा सावन का महीना चश्म-ए-गिर्यां क्या हुआ क्या हुई बाला-ए-सर वो लुत्फ़-ए-यज़्दाँ की घटा आसमान-ए-दिल पे वो घनघोर इरफ़ाँ की घटा अब वो नालों की गरज है अब न वो शोर-ए-फ़ुग़ाँ अब न उठता है कलेजा से मोहब्बत का धुआँ अपने अफ़आ'ल-ए-सियह पर अब पशेमानी नहीं अब पसीने के सितारे ज़ेब-ए-पेशानी नहीं दर्द की मुद्दत से अब दिल में चमक होती नहीं वो तपक छालों की कौंदे की लपक होती नहीं ज़िक्र-ए-मौला से लबों पर अब वो नर्मी ही नहीं भाप सीने से उठे क्या दिल में गर्मी ही नहीं अब शरारे सोज़-ए-ग़म के दिल में रहते ही नहीं अश्क अब पिछले पहर आँखों से बहते ही नहीं मअ'रिफ़त दिल में न अब वो रूह में एहसास है लोग कहते हैं कि है लेकिन हमें तो यास है अब न वो आँखों में अश्क-ए-ख़ूँ न वो दिल में गुदाज़ अब न वो शाम-ए-तमन्ना है न वो सुब्ह-ए-नियाज़ ख़ुश्क हैं आँखें जबीनें तंग सीने सर्द हैं अब न वो दुखते हुए दिल हैं न चेहरे ज़र्द हैं आह की और दिल उमँड आया ये होता ही नहीं डूब कर ज़ौक़-ए-फ़ना में कोई रोता ही नहीं फूल दाग़ों से खिले थे जिस दिल-ए-सरशार में ख़ाक अब मुद्दत से उड़ती है उसी गुलज़ार में आँसुओं से नम जो रहता था वो दामाँ जल गया लहलहाता था जो सीने में गुलिस्ताँ जल गया रूह में बालीदगी की क़ुव्वतें मादूम हैं दोनों आँखें आँसुओं के फ़ैज़ से महरूम हैं पेच-ओ-ख़म से बहने वाला दिल का दरिया ख़ुश्क है वो भरी बरसात या'नी चश्म-ए-बीना ख़ुश्क है ख़ून है दिल में मगर पहली सी तुग़्यानी नहीं अब्र है बाद-ए-मुख़ालिफ़ से मगर पानी नहीं जब ये आलम है तो बारिश की शिकायत किस लिए बे-महल ये हसरत-ए-बारान-ए-रहमत किस लिए इक मुजस्सम ख़ुश्क-साली ख़ुद हमारी ज़ात है ज़िद हमारी हस्तियों की अब्र है बरसात है रहमतों से जोश में आने की ख़्वाहिश क्या करें ख़ुद सरापा क़हत हैं उम्मीद-ए-बारिश क्या करें

Josh Malihabadi

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झुट-पुटे का नर्म-रौ दरिया शफ़क़ का इज़्तिराब खेतियाँ मैदान ख़ामोशी ग़ुरूब-ए-आफ़्ताब दश्त के काम-ओ-दहन को दिन की तल्ख़ी से फ़राग़ दूर दरिया के किनारे धुँदले धुँदले से चराग़ ज़ेर-ए-लब अर्ज़ ओ समा में बाहमी गुफ़्त-ओ-शुनूद मिशअल-ए-गर्दूं के बुझ जाने से इक हल्का सा दूद वुसअतें मैदान की सूरज के छुप जाने से तंग सब्ज़ा-ए-अफ़्सुर्दा पर ख़्वाब-आफ़रीं हल्का सा रंग ख़ामुशी और ख़ामुशी में सनसनाहट की सदा शाम की ख़ुनकी से गोया दिन की गर्मी का गिला अपने दामन को बराबर क़त्अ सा करता हुआ तीरगी में खेतियों के दरमियाँ का फ़ासला ख़ार-ओ-ख़स पर एक दर्द-अंगेज़ अफ़्साने की शान बाम-ए-गर्दूं पर किसी के रूठ कर जाने की शान दूब की ख़ुश्बू में शबनम की नमी से इक सुरूर चर्ख़ पर बादल ज़मीं पर तितलियाँ सर पर तुयूर पारा पारा अब्र सुर्ख़ी सुर्ख़ियों में कुछ धुआँ भूली-भटकी सी ज़मीं खोया हुआ सा आसमाँ पत्तियाँ मख़मूर कलियाँ आँख झपकाती हुई नर्म-जाँ पौदों को गोया नींद सी आती हुई ये समाँ और इक क़वी इंसान या'नी काश्त-कार इर्तिक़ा का पेशवा तहज़ीब का परवरदिगार जिस के माथे के पसीने से पए-इज़्ज़-ओ-वक़ार करती है दरयूज़ा-ए-ताबिश कुलाह-ए-ताजदार सर-निगूँ रहती हैं जिस से क़ुव्वतें तख़रीब की जिस के बूते पर लचकती है कमर तहज़ीब की जिस की मेहनत से फबकता है तन-आसानी का बाग़ जिस की ज़ुल्मत की हथेली पर तमद्दुन का चराग़ जिस के बाज़ू की सलाबत पर नज़ाकत का मदार जिस के कस-बल पर अकड़ता है ग़ुरूर-ए-शहरयार धूप के झुलसे हुए रुख़ पर मशक़्क़त के निशाँ खेत से फेरे हुए मुँह घर की जानिब है रवाँ टोकरा सर पर बग़ल में फावड़ा तेवरी पे बल सामने बैलों की जोड़ी दोश पर मज़बूत हल कौन हल ज़ुल्मत-शिकन क़िंदील-ए-बज़्म-ए-आब-ओ-गिल क़स्र-ए-गुलशन का दरीचा सीना-ए-गीती का दिल ख़ुशनुमा शहरों का बानी राज़-ए-फ़ितरत का सुराग़ ख़ानदान-ए-तेग़-ए-जौहर-दार का चश्म-ओ-चराग़ धार पर जिस की चमन-परवर शगूफ़ों का निज़ाम शाम-ए-ज़ेर-ए-अर्ज़ को सुब्ह-ए-दरख़्शाँ का पयाम डूबता है ख़ाक में जो रूह दौड़ाता हुआ मुज़्महिल ज़र्रों की मौसीक़ी को चौंकाता हुआ जिस के छू जाते ही मिस्ल-ए-नाज़नीन-ए-मह-जबीं करवटों पर करवटें लेती है लैला-ए-ज़मीं पर्दा-हा-ए-ख़्वाब हो जाते हैं जिस से चाक चाक मुस्कुरा कर अपनी चादर को हटा देती है ख़ाक जिस की ताबिश में दरख़शानी हिलाल-ए-ईद की ख़ाक के मायूस मतला पर किरन उम्मीद की तिफ़्ल-ए-बाराँ ताजदार-ए-ख़ाक अमीर-ए-बोस्ताँ माहिर-ए-आईन-ए-क़ुदरत नाज़िम-ए-बज़्म-ए-जहाँ नाज़िर-ए-गुल पासबान-ए-रंग-ओ-बू गुलशन-पनाह नाज़-परवर लहलहाती खेतियों का बादशाह वारिस-ए-असरार-ए-फ़ितरत फ़ातेह-ए-उम्मीद-ओ-बीम महरम-ए-आसार-ए-बाराँ वाक़िफ़-ए-तब्अ-ए-नसीम सुब्ह का फ़रज़ंद ख़ुर्शीद-ए-ज़र-अफ़शाँ का अलम मेहनत-ए-पैहम का पैमाँ सख़्त-कोशी की क़सम जल्वा-ए-क़ुदरत का शाहिद हुस्न-ए-फ़ितरत का गवाह माह का दिल मेहर-ए-आलम-ताब का नूर-ए-निगाह क़ल्ब पर जिस के नुमायाँ नूर ओ ज़ुल्मत का निज़ाम मुन्कशिफ़ जिस की फ़रासत पर मिज़ाज-ए-सुब्ह-ओ-शाम ख़ून है जिस की जवानी का बहार-ए-रोज़गार जिस के अश्कों पर फ़राग़त के तबस्सुम का मदार जिस की मेहनत का अरक़ तय्यार करता है शराब उड़ के जिस का रंग बिन जाता है जाँ-परवर गुलाब क़ल्ब-ए-आहन जिस के नक़्श-ए-पास होता है रक़ीक़ शो'ला-ख़ू झोंकों का हमदम तेज़ किरनों का रफ़ीक़ ख़ून जिस का बिजलियों की अंजुमन में बारयाब जिस के सर पर जगमगाती है कुलाह-ए-आफ़्ताब लहर खाता है रग-ए-ख़ाशाक में जिस का लहू जिस के दिल की आँच बन जाती है सैल-ए-रंग-ओ-बू दौड़ती है रात को जिस की नज़र अफ़्लाक पर दिन को जिस की उँगलियाँ रहती हैं नब्ज़-ए-ख़ाक पर जिस की जाँकाही से टपकाती है अमृत नब्ज़-ए-ताक जिस के दम से लाला-ओ-गुल बन के इतराती है ख़ाक साज़-ए-दौलत को अता करती है नग़्में जिस की आह माँगता है भीक ताबानी की जिस से रू-ए-शाह ख़ून जिस का दौड़ता है नब्ज़-ए-इस्तिक़्लाल में लोच भर देता है जो शहज़ादियों की चाल में जिस का मस ख़ाशाक में बनता है इक चादर महीन जिस का लोहा मान कर सोना उगलती है ज़मीन हल पे दहक़ाँ के चमकती हैं शफ़क़ की सुर्ख़ियाँ और दहक़ाँ सर झुकाए घर की जानिब है रवाँ उस सियासी रथ के पहियों पर जमाए है नज़र जिस में आ जाती है तेज़ी खेतियों को रौंद कर अपनी दौलत को जिगर पर तीर-ए-ग़म खाते हुए देखता है मुल्क-ए-दुश्मन की तरफ़ जाते हुए क़त्अ होती ही नहीं तारीकी-ए-हिरमाँ से राह फ़ाक़ा-कश बच्चों के धुँदले आँसुओं पर है निगाह सोचता जाता है किन आँखों से देखा जाएगा बे-रिदा बीवी का सर बच्चों का मुँह उतरा हुआ सीम-ओ-ज़र नान-ओ-नमक आब-ओ-ग़िज़ा कुछ भी नहीं घर में इक ख़ामोश मातम के सिवा कुछ भी नहीं एक दिल और ये हुजूम-ए-सोगवारी हाए हाए ये सितम ऐ संग-दिल सरमाया-दारी हाए हाए तेरी आँखों में हैं ग़लताँ वो शक़ावत के शरार जिन के आगे ख़ंजर-ए-चंगेज़ की मुड़ती है धार बेकसों के ख़ून में डूबे हुए हैं तेरे हात क्या चबा डालेगी ओ कम्बख़्त सारी काएनात ज़ुल्म और इतना कोई हद भी है इस तूफ़ान की बोटियाँ हैं तेरे जबड़ों में ग़रीब इंसान की देख कर तेरे सितम ऐ हामी-ए-अम्न-ओ-अमाँ गुर्ग रह जाते हैं दाँतों में दबा कर उँगलियाँ इद्दिआ-ए-पैरवी-ए-दीन-ओ-ईमाँ और तू देख अपनी कुहनीयाँ जिन से टपकता है लहू हाँ सँभल जा अब कि ज़हर-ए-अहल-ए-दिल के आब हैं कितने तूफ़ान तेरी कश्ती के लिए बे-ताब हैं

Josh Malihabadi

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