nazmKuch Alfaaz

झुट-पुटे का नर्म-रौ दरिया शफ़क़ का इज़्तिराब खेतियाँ मैदान ख़ामोशी ग़ुरूब-ए-आफ़्ताब दश्त के काम-ओ-दहन को दिन की तल्ख़ी से फ़राग़ दूर दरिया के किनारे धुँदले धुँदले से चराग़ ज़ेर-ए-लब अर्ज़ ओ समा में बाहमी गुफ़्त-ओ-शुनूद मिशअल-ए-गर्दूं के बुझ जाने से इक हल्का सा दूद वुसअतें मैदान की सूरज के छुप जाने से तंग सब्ज़ा-ए-अफ़्सुर्दा पर ख़्वाब-आफ़रीं हल्का सा रंग ख़ामुशी और ख़ामुशी में सनसनाहट की सदा शाम की ख़ुनकी से गोया दिन की गर्मी का गिला अपने दामन को बराबर क़त्अ सा करता हुआ तीरगी में खेतियों के दरमियाँ का फ़ासला ख़ार-ओ-ख़स पर एक दर्द-अंगेज़ अफ़्साने की शान बाम-ए-गर्दूं पर किसी के रूठ कर जाने की शान दूब की ख़ुश्बू में शबनम की नमी से इक सुरूर चर्ख़ पर बादल ज़मीं पर तितलियाँ सर पर तुयूर पारा पारा अब्र सुर्ख़ी सुर्ख़ियों में कुछ धुआँ भूली-भटकी सी ज़मीं खोया हुआ सा आसमाँ पत्तियाँ मख़मूर कलियाँ आँख झपकाती हुई नर्म-जाँ पौदों को गोया नींद सी आती हुई ये समाँ और इक क़वी इंसान या'नी काश्त-कार इर्तिक़ा का पेशवा तहज़ीब का परवरदिगार जिस के माथे के पसीने से पए-इज़्ज़-ओ-वक़ार करती है दरयूज़ा-ए-ताबिश कुलाह-ए-ताजदार सर-निगूँ रहती हैं जिस से क़ुव्वतें तख़रीब की जिस के बूते पर लचकती है कमर तहज़ीब की जिस की मेहनत से फबकता है तन-आसानी का बाग़ जिस की ज़ुल्मत की हथेली पर तमद्दुन का चराग़ जिस के बाज़ू की सलाबत पर नज़ाकत का मदार जिस के कस-बल पर अकड़ता है ग़ुरूर-ए-शहरयार धूप के झुलसे हुए रुख़ पर मशक़्क़त के निशाँ खेत से फेरे हुए मुँह घर की जानिब है रवाँ टोकरा सर पर बग़ल में फावड़ा तेवरी पे बल सामने बैलों की जोड़ी दोश पर मज़बूत हल कौन हल ज़ुल्मत-शिकन क़िंदील-ए-बज़्म-ए-आब-ओ-गिल क़स्र-ए-गुलशन का दरीचा सीना-ए-गीती का दिल ख़ुशनुमा शहरों का बानी राज़-ए-फ़ितरत का सुराग़ ख़ानदान-ए-तेग़-ए-जौहर-दार का चश्म-ओ-चराग़ धार पर जिस की चमन-परवर शगूफ़ों का निज़ाम शाम-ए-ज़ेर-ए-अर्ज़ को सुब्ह-ए-दरख़्शाँ का पयाम डूबता है ख़ाक में जो रूह दौड़ाता हुआ मुज़्महिल ज़र्रों की मौसीक़ी को चौंकाता हुआ जिस के छू जाते ही मिस्ल-ए-नाज़नीन-ए-मह-जबीं करवटों पर करवटें लेती है लैला-ए-ज़मीं पर्दा-हा-ए-ख़्वाब हो जाते हैं जिस से चाक चाक मुस्कुरा कर अपनी चादर को हटा देती है ख़ाक जिस की ताबिश में दरख़शानी हिलाल-ए-ईद की ख़ाक के मायूस मतला पर किरन उम्मीद की तिफ़्ल-ए-बाराँ ताजदार-ए-ख़ाक अमीर-ए-बोस्ताँ माहिर-ए-आईन-ए-क़ुदरत नाज़िम-ए-बज़्म-ए-जहाँ नाज़िर-ए-गुल पासबान-ए-रंग-ओ-बू गुलशन-पनाह नाज़-परवर लहलहाती खेतियों का बादशाह वारिस-ए-असरार-ए-फ़ितरत फ़ातेह-ए-उम्मीद-ओ-बीम महरम-ए-आसार-ए-बाराँ वाक़िफ़-ए-तब्अ-ए-नसीम सुब्ह का फ़रज़ंद ख़ुर्शीद-ए-ज़र-अफ़शाँ का अलम मेहनत-ए-पैहम का पैमाँ सख़्त-कोशी की क़सम जल्वा-ए-क़ुदरत का शाहिद हुस्न-ए-फ़ितरत का गवाह माह का दिल मेहर-ए-आलम-ताब का नूर-ए-निगाह क़ल्ब पर जिस के नुमायाँ नूर ओ ज़ुल्मत का निज़ाम मुन्कशिफ़ जिस की फ़रासत पर मिज़ाज-ए-सुब्ह-ओ-शाम ख़ून है जिस की जवानी का बहार-ए-रोज़गार जिस के अश्कों पर फ़राग़त के तबस्सुम का मदार जिस की मेहनत का अरक़ तय्यार करता है शराब उड़ के जिस का रंग बिन जाता है जाँ-परवर गुलाब क़ल्ब-ए-आहन जिस के नक़्श-ए-पास होता है रक़ीक़ शो'ला-ख़ू झोंकों का हमदम तेज़ किरनों का रफ़ीक़ ख़ून जिस का बिजलियों की अंजुमन में बारयाब जिस के सर पर जगमगाती है कुलाह-ए-आफ़्ताब लहर खाता है रग-ए-ख़ाशाक में जिस का लहू जिस के दिल की आँच बन जाती है सैल-ए-रंग-ओ-बू दौड़ती है रात को जिस की नज़र अफ़्लाक पर दिन को जिस की उँगलियाँ रहती हैं नब्ज़-ए-ख़ाक पर जिस की जाँकाही से टपकाती है अमृत नब्ज़-ए-ताक जिस के दम से लाला-ओ-गुल बन के इतराती है ख़ाक साज़-ए-दौलत को अता करती है नग़्में जिस की आह माँगता है भीक ताबानी की जिस से रू-ए-शाह ख़ून जिस का दौड़ता है नब्ज़-ए-इस्तिक़्लाल में लोच भर देता है जो शहज़ादियों की चाल में जिस का मस ख़ाशाक में बनता है इक चादर महीन जिस का लोहा मान कर सोना उगलती है ज़मीन हल पे दहक़ाँ के चमकती हैं शफ़क़ की सुर्ख़ियाँ और दहक़ाँ सर झुकाए घर की जानिब है रवाँ उस सियासी रथ के पहियों पर जमाए है नज़र जिस में आ जाती है तेज़ी खेतियों को रौंद कर अपनी दौलत को जिगर पर तीर-ए-ग़म खाते हुए देखता है मुल्क-ए-दुश्मन की तरफ़ जाते हुए क़त्अ होती ही नहीं तारीकी-ए-हिरमाँ से राह फ़ाक़ा-कश बच्चों के धुँदले आँसुओं पर है निगाह सोचता जाता है किन आँखों से देखा जाएगा बे-रिदा बीवी का सर बच्चों का मुँह उतरा हुआ सीम-ओ-ज़र नान-ओ-नमक आब-ओ-ग़िज़ा कुछ भी नहीं घर में इक ख़ामोश मातम के सिवा कुछ भी नहीं एक दिल और ये हुजूम-ए-सोगवारी हाए हाए ये सितम ऐ संग-दिल सरमाया-दारी हाए हाए तेरी आँखों में हैं ग़लताँ वो शक़ावत के शरार जिन के आगे ख़ंजर-ए-चंगेज़ की मुड़ती है धार बेकसों के ख़ून में डूबे हुए हैं तेरे हात क्या चबा डालेगी ओ कम्बख़्त सारी काएनात ज़ुल्म और इतना कोई हद भी है इस तूफ़ान की बोटियाँ हैं तेरे जबड़ों में ग़रीब इंसान की देख कर तेरे सितम ऐ हामी-ए-अम्न-ओ-अमाँ गुर्ग रह जाते हैं दाँतों में दबा कर उँगलियाँ इद्दिआ-ए-पैरवी-ए-दीन-ओ-ईमाँ और तू देख अपनी कुहनीयाँ जिन से टपकता है लहू हाँ सँभल जा अब कि ज़हर-ए-अहल-ए-दिल के आब हैं कितने तूफ़ान तेरी कश्ती के लिए बे-ताब हैं

Related Nazm

उस का चेहरा सिंपल सादा सा भोला चेहरा है यार क़सम से वो प्यारा चेहरा है पेड़ नदी ये फूल सभी छोड़ो उस को देखो उस का चेहरा है दुनिया लाख हसीन हो सकती है लेकिन उस का चेहरा चेहरा है देख उसे कह डाला हम ने भी बातें प्यारी हैं प्यारा चेहरा है इक तिल होट पे, गाल के नीचे इक और वो चाँद सा नाक पे नूर लिए दो प्यारी आँखें, और सुर्ख़ से लब प्यार मिलाकर अपना रंगों में हम ने बनाया उस का चेहरा है भोली सूरत पे वो अकड़ देखो ग़लती कर के घुमाया चेहरा है रूठ गई जो हम सेे कभी वो दोस्त सब सेे पहले चुराया चेहरा है जब भी उस को चूमने आए हम होट से पहले आया चेहरा है मुँह से इक वो स्वाद नहीं जाता जबसे उस का चूमा चेहरा है रात का होना उस की आँखें हैं दिन का निकलना उस का चेहरा है दुनिया में है उस के चेहरे से है नूर रौशनी लाया उस का चेहरा है हम जैसे भी दरिया करेंगे पार ! अब जो सहारा उस का चेहरा है हम आबाद रहेंगे ऐसे ही हम पे गर साया वो चेहरा है वो चेहरा है बस वो चेहरा है हम को बस वो चेहरा चेहरा है हम ने चाहा बस वो चेहरा है हम ने माँगा बस वो चेहरा है हम ने देखा भी तो वो चेहरा हम ने सोचा बस वो चेहरा है

BR SUDHAKAR

12 likes

पल दो पल जी लेते हैं यादों के गहरे दरिया में हम हर दिन डुबकी लेते हैं ख़्वाबों में तुम मिल जाते हो फिर पल दो पल जी लेते हैं इश्क़ अधूरा अपना है जो मुमकिन है पूरा कब होना हम दोनों ने ख़्वाब बुने जो फ़ितरत है उन की बस रोना दर्द दवा अपनी है केवल उस को ही अब पी लेते हैं सावन आया प्यारा सब को हम दोनों के तन मन बहके सबकी आज मिलन की बेला बूँद हमें शोलों सी दहके अंबर भी रोते रह-रह कर जब जब हम सिसकी लेते हैं बेगानों में कौन सुनेगा किस को जा कर दर्द सुनाएँ ज़हर ज़ुदाई का पीना है गीत विरह के आओ गाएँ बाग़ों में चातक के सुर पर रागों की मुरकी लेते हैं

Nityanand Vajpayee

3 likes

"नज़्म क्या है" शा'इरी की दो सिंफ़ें हैं नज़्म-ओ-ग़ज़ल उर्दू में इन की शोहरत है बच्चो अटल नज़्म पाबंद है नज़्म आज़ाद भी ये कभी नस्र है और मुअर्रा कभी नज़्म-ए-पाबंद में वज़्न होगा म्याँ और आज़ाद में भी है इस का निशाँ नज़्म-ए-पाबंद का तर्ज़ है जो लतीफ़ इस में पाओगे तुम क़ाफ़िया-ओ-रदीफ़ नसरी नज़्मों में बस नस्र ही नस्र है वज़्न और क़ाफ़िया है न ही बहर है वज़्न और क़ाफ़िए जिन को मुश्किल हुए नसरी नज़्में उमूमन वो कहते लगे वज़्न नज़्म-ए-मुअर्रा में है दोस्तो इस को तुम बे-रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी कहो मसनवी हो क़सीदा हो या मर्सिया नज़्म का मिलता है बच्चो हम को पता नज़्म में सिलसिला है ख़यालात का एक दरिया सा है देखो जज़्बात का वो मुख़म्मस हो या हो मुसद्दस कोई ये भी इक शक्ल है नज़्म-ए-पाबंद की वो ग़ज़ल हो कि हो नज़्म बच्चो सुनो दोनों यकसाँ हैं शोहरत में बस जान लो 'जोश' की नज़्में मशहूर हैं हर जगह हैं ग़ज़ल के 'जिगर' वाक़ई बादशह नज़्म में जो कहानी कही जाएगी शौक़ से ऐ मियाँ वो सुनी जाएगी नज़्में सीमाब-ओ-इक़बाल ने भी लिखीं जो निहायत ही मशहूर साबित हुईं करता हूँ बच्चों के वास्ते मैं दुआ नज़्में बच्चों की लिखता हूँ 'हाफ़िज़' सदा

Amjad Husain Hafiz Karnataki

13 likes

फेंक दे ऐ दोस्त अब भी फेंक दे अपना रुबाब उठने ही वाला है कोई दम में शोर-ए-इंक़लाब आ रहे हैं जंग के बादल वो मंडलाते हुए आग दामन में छुपाए ख़ून बरसाते हुए कोह-ओ-सहरा में ज़मीं से ख़ून उबलेगा अभी रंग के बदले गुलों से ख़ून टपकेगा अभी बढ़ रहे हैं देख वो मज़दूर दर्राते हुए इक जुनूँ-अंगेज़ लय में जाने क्या गाते हुए सर-कशी की तुंद आँधी दम-ब-दम चढ़ती हुई हर तरफ़ यलग़ार करती हर तरफ़ बढ़ती हुई भूक के मारे हुए इंसाँ की फ़रियादों के साथ फ़ाक़ा-मस्तों के जिलौ में ख़ाना-बर्बादों के साथ ख़त्म हो जाएगा ये सरमाया-दारी का निज़ाम रंग लाने को है मज़दूरों का जोश-ए-इंतिक़ाम गिर पड़ेंगे ख़ौफ़ से ऐवान-ए-इशरत के सुतूँ ख़ून बन जाएगी शीशों में शराब-ए-लाला-गूँ ख़ून की बू ले के जंगल से हवाएँ आएँगी ख़ूँ ही ख़ूँ होगा निगाहें जिस तरफ़ भी जाएँगी झोंपड़ों में ख़ूँ, महल में ख़ूँ, शबिस्तानों में ख़ूँ दश्त में ख़ूँ, वादियों में ख़ूँ, बयाबानों में ख़ूँ पुर-सुकूँ सहरा में ख़ूँ, बेताब दरियाओं में ख़ूँ दैर में ख़ूँ, मस्जिद में ख़ूँ, कलीसाओं में ख़ूँ ख़ून के दरिया नज़र आएँगे हर मैदान में डूब जाएँगी चटानें ख़ून के तूफ़ान में ख़ून की रंगीनियों में डूब जाएगी बहार रेग-ए-सहरा पर नज़र आएँगे लाखों लाला-ज़ार ख़ून से रंगीं फ़ज़ा-ए-बोस्ताँ हो जाएगी नर्गिस-ए-मख़मूर चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ हो जाएगी कोहसारों की तरफ़ से ''सुर्ख़-आंधी'' आएगी

Asrar Ul Haq Majaz

3 likes

मैं जब भी ज़िंदगी की चिलचिलाती धूप में तप कर मैं जब भी दूसरों के और अपने झूट से थक कर मैं सब से लड़ के ख़ुद से हार के जब भी उस एक कमरे में जाता था वो हल्के और गहरे कत्थई रंगों का इक कमरा वो बेहद मेहरबाँ कमरा जो अपनी नर्म मुट्ठी में मुझे ऐसे छुपा लेता था जैसे कोई माँ बच्चे को आँचल में छुपा ले प्यार से डाँटे ये क्या आदत है जलती दोपहर में मारे मारे घूमते हो तुम वो कमरा याद आता है दबीज़ और ख़ासा भारी कुछ ज़रा मुश्किल से खुलने वाला वो शीशम का दरवाज़ा कि जैसे कोई अक्खड़ बाप अपने खुरदुरे सीने में शफ़क़त के समुंदर को छुपाए हो वो कुर्सी और उस के साथ वो जुड़वाँ बहन उस की वो दोनों दोस्त थीं मेरी वो इक गुस्ताख़ मुँह-फट आईना जो दिल का अच्छा था वो बे-हँगम सी अलमारी जो कोने में खड़ी इक बूढ़ी अन्ना की तरह आईने को तंबीह करती थी वो इक गुल-दान नन्हा सा बहुत शैतान उन दिनों पे हँसता था दरीचा या ज़ेहानत से भरी इक मुस्कुराहट और दरीचे पर झुकी वो बेल कोई सब्ज़ सरगोशी किताबें ताक़ में और शेल्फ़ पर संजीदा उस्तानी बनी बैठीं मगर सब मुंतज़िर इस बात की मैं उन से कुछ पूछूँ सिरहाने नींद का साथी थकन का चारा-गर वो नर्म-दिल तकिया मैं जिस की गोद में सर रख के छत को देखता था छत की कड़ियों में न जाने कितने अफ़्सानों की कड़ियाँ थीं वो छोटी मेज़ पर और सामने दीवार पर आवेज़ां तस्वीरें मुझे अपनाइयत से और यक़ीं से देखती थीं मुस्कुराती थीं उन्हें शक भी नहीं था एक दिन मैं उन को ऐसे छोड़ जाऊँगा मैं इक दिन यूँँ भी जाऊँगा कि फिर वापस न आऊँगा मैं अब जिस घर में रहता हूँ बहुत ही ख़ूब-सूरत है मगर अक्सर यहाँ ख़ामोश बैठा याद करता हूँ वो कमरा बात करता था

Javed Akhtar

4 likes

More from Josh Malihabadi

अब सबा कूचा-ए-जानाँ में गुज़रे है कि नहीं तुझ को इस फ़ित्ना-ए-आलम की ख़बर है कि नहीं बुझ गया मेहर का फ़ानूस कि रौशन है अभी अब उन आँखों में लगावट का असर है कि नहीं अब मेरे नाम का पढ़ता है वज़ीफ़ा कोई अब मिरा ज़िक्र-ए-वफ़ा दर्द-ए-सहर है कि नहीं अब भी तकती हैं मिरी राह वो काफ़िर आँखें अब भी दुज़्दीदा नज़र जानिब-ए-दर है कि नहीं छुप के रातों को मिरी याद में रोता है कोई मौजज़न आँख में अब ख़ून-ए-जिगर है कि नहीं हुस्न को पुर्सिश-ए-बीमार का है अब भी ख़याल मेहर की ज़र्रा ख़ाकी पे नज़र है कि नहीं बे-ख़बर मुझ को ज़माने से किया है जिस ने कुछ उसे मेरी तबाही की ख़बर है कि नहीं खाए जाता है मुझे दर्द-ए-ग़रीब-उल-वतनी दिल पर इस जान-ए-वतन के भी असर है कि नहीं 'जोश' ख़ामोश भी हो पूछ रहा है क्या क्या कुछ तुझे ताड़ने वालों की ख़बर है कि नहीं

Josh Malihabadi

0 likes

क्या हाल कहें उस मौसम का जब जिंस-ए-जवानी सस्ती थी जिस फूल को चूमो खुलता था जिस शय को देखो हँसती थी जीना सच्चा जीना था हस्ती ऐन हस्ती थी अफ़्साना जादू अफ़्सूँ था ग़फ़लत नींदें मस्ती थी उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी ग़फ़लत नींदें हस्ती थी आँखें क्या पैमाने थे हर रोज़ जवानी बिकती थी हर शाम-ओ-सहर बैआ'ने थे हर ख़ार में इक बुत-ख़ाना था हर फूल में सौ मय-ख़ाने थे काली काली ज़ुल्फ़ें थीं गोरे गोरे शाने थे उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी गोरे गोरे शाने थे हल्की-फुल्की बाँहें थीं हर-गाम पे ख़ल्वत-ख़ाने थे हर मोड़ पे इशरत-गाहें थीं तुग़्यान ख़ुशी के आँसू थे तकमील-ए-तरब की आहें थीं इश्वे चुहलें ग़म्ज़े थे पल्तीं ख़ुशियाँ चाहीं थीं उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी

Josh Malihabadi

0 likes

ज़ोफ़ से आँखों के नीचे तितलियाँ फिरती हुई औज-ए-ख़ुद्दारी से दिल पर बिजलियाँ गिरती हुई लाश काँधे पर ख़ुद अपने जज़्बा-ए-तकरीम की मुल्तजी चेहरे पे लहरें सी उम्मीद-ओ-बीम की इज़्ज़त-ए-अज्दाद के सर पर दमा-दम ठोकरें रिश्ता-ए-आवाज़ पर लफ़्ज़ों की पैहम ठोकरें चहरा-ए-अफ़्सुर्दा पर ठंडा पसीना शर्म का सुस्त नब्ज़ें भीक का लहजे के अंदर ठीकरा क़र्ज़ की दरख़्वास्त की उलझी हुई तक़रीर में कपकपी आसाब की बेचैन दिल की लरज़िशें इक तरफ़ हाजत की शिद्दत इक तरफ़ ग़ैरत का जोश नुत्क़ पर हर्फ़-ए-तमन्ना दिल में ग़ुस्से का ख़रोश जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ के ज़ेर-ए-साया नादारी की रात जौहर-ए-इंसानियत जोड़े हुए आँखों में हात साँस दहशत से ज़मीं की आसमाँ रोके हुए मुफ़लिसी मर्दाना लहजे की इनाँ रोके हुए लब पे ख़ुश्की रुख़ पे ज़र्दी आँख शरमाई हुई चश्म ओ अबरू में ख़ुदी की आग कजलाई हुई नफ़स में शे'राना तेवर आरज़ू रूबा-मिज़ाज एहतियाज ओ एहतियाज ओ एहतियाज ओ एहतियाज!

Josh Malihabadi

0 likes

ऐ शम-ए-'जोश' ओ मशअ'ल-ए-ऐवान-ए-आरज़ू ऐ मेहर-ए-नाज़ ओ माह-ए-शबिस्तान-ए-आरज़ू ऐ जान-ए-दर्द-मंदी ओ ईमान-ए-आरज़ू ऐ शम-ए-तूर ओ यूसुफ़-ए-कनआ'न-ए-आरज़ू ज़र्रे को आफ़्ताब तो काँटे को फूल कर ऐ रूह-ए-शे'र सज्दा-ए-शाइ'र क़ुबूल कर दरिया का मोड़ नग़्मा-ए-शीरीं का ज़ेर-ओ-बम चादर शब-ए-नुजूम की शबनम का रख़्त-ए-नम तितली का नाज़-ए-रक़्स ग़ज़ाला का हुस्न-ए-रम मोती की आब गुल की महक माह-ए-नौ का ख़म इन सब के इम्तिज़ाज से पैदा हुई है तू कितने हसीं उफ़ुक़ से हुवैदा हुई है तू होता है मह-वशों का वो आलम तिरे हुज़ूर जैसे चराग़-ए-मुर्दा सर-ए-बज़्म-ए-शम-ए-तूर आ कर तिरी जनाब में ऐ कार-साज़-ए-नूर पलकों में मुँह छुपाते हैं झेंपे हुए ग़ुरूर आती है एक लहर सी चेहरों पर आह की आँखों में छूट जाती हैं नब्ज़ें निगाह की रफ़्तार है कि चाँदनी रातों में मौज-ए-गंग या भैरवीं की पिछले पहर क़ल्ब में उमंग ये काकुलों की ताब है ये आरिज़ों का रंग जिस तरह झुट-पुटे में शब-ओ-रोज़ की तरंग रू-ए-मुबीं न गेसू-ए-सुम्बुल-क़वाम है वो बरहमन की सुब्ह ये साक़ी की शाम है आवाज़ में ये रस ये लताफ़त ये इज़्तिरार जैसे सुबुक महीन रवाँ रेशमी फुवार लहजे में ये खटक है कि है नेश्तर की धार और गिर रहा है धार से शबनम का आबशार चहकी जो तू चमन में हवाएँ महक गईं गुल-बर्ग-ए-तर से ओस की बूँदें टपक गईं जादू है तेरी सौत का गुल पर हज़ार पर जैसे नसीम-ए-सुब्ह की रौ जू-ए-बार पर नाख़ुन किसी निगार का चाँदी के तार पर मिज़राब-ए-अक्स-ए-क़ौस रग-ए-आबशार पर मौजें सबा की बाग़ पे सहबा छिड़क गईं जुम्बिश हुई लबों को तो कलियाँ चटक गईं चश्म-ए-सियाह में वो तलातुम है नूर का जैसे शराब-ए-नाब में जौहर सुरूर का या चहचहों के वक़्त तमव्वुज तुयूर का बाँधे हुए निशाना कोई जैसे दूर का हर मौज-ए-रंग-ए-क़ामत-ए-गुलरेज़ रम में है गोया शराब-ए-तुंद बिलोरीं क़लम में है तुझ से नज़र मिलाए ये किस की भला मजाल तेरे क़दम का नक़्श हसीनों के ख़द्द-ओ-ख़ाल अल्लाह रे तेरे हुस्न-ए-मलक-सोज़ का जलाल जब देखती हैं ख़ुल्द से हूरें तिरा जमाल परतव से तेरे चेहरा-ए-पर्वीं-सरिश्त के घबरा के बंद करती हैं ग़ुर्फ़े बहिश्त के चेहरे को रंग-ओ-नूर का तूफ़ाँ किए हुए शम-ओ-शराब-ओ-शे'र का उनवाँ किए हुए हर नक़्श-ए-पा को ताज-ए-गुलिस्ताँ किए हुए सौ तूर इक निगाह में पिन्हाँ किए हुए आती है तू चमन में जब इस तर्ज़-ओ-तौर से गुल देखते हैं बाग़ में बुलबुल को ग़ौर से मेरे बयाँ में सेहर-बयानी तुझी से है रू-ए-सुख़न पे ख़ून-ए-जवानी तुझी से है लफ़्ज़ों में रक़्स-ओ-रंग-ओ-रवानी तुझी से है फ़क़्र-ए-गदा में फ़र्र-ए-कियानी तुझी से है फ़िदवी के इस उरूज पे करती है ग़ौर क्या तेरी ही जूतियों का तसद्दुक़ है और क्या ऐ किर्दगार-ए-मा'नी ओ ख़ल्लाक़-ए-शेर-ए-तर ऐ जान-ए-ज़ौक़ ओ मुहसिना-ए-लैली-ए-हुनर खुल जाए गर ये बात कि उर्दू ज़बान पर तेरी निगाह-ए-नाज़ का एहसाँ है किस क़दर चारों तरफ़ से नारा-ए-सल्ले-अला उठे तेरे मुजस्समों से ज़मीं जगमगा उठे मेरे हुनर में सर्फ़ हुई है तिरी नज़र ख़ेमा है मेरे नाम का बाला-ए-बहर-ओ-बर शोहरत की बज़्म तुझ से मुनव्वर नहीं मगर फ़र्क़-ए-गदा पे ताज है सुल्ताँ बरहना-सर परवाने को वो कौन है जो मानता नहीं और शम्अ'' किस तरफ़ है कोई जानता नहीं दिल तेरी बज़्म-ए-नाज़ में जब से है बारयाब हर ख़ार एक गुल है तो हर ज़र्रा आफ़्ताब इक लश्कर-ए-नशात है हर ग़म के हम-रिकाब ज़ेर-ए-नगीं है आलम-ए-तमकीन-ओ-इज़तिराब बाद-ए-मुराद ओ चश्मक-ए-तूफ़ाँ लिए हुए हूँ बू-ए-ज़ुल्फ़-ओ-जुंबिश-ए-मिज़्गाँ लिए हुए तेरे लबों से चश्मा-ए-हैवाँ मिरा कलाम तेरी लटों से मौजा-ए-तूफ़ाँ मिरा कलाम तेरी नज़र से तूर-ब-दामाँ मिरा कलाम तेरे सुख़न से नग़्मा-ए-यज़्दाँ मिरा कलाम तू है पयाम-ए-आलम-ए-बाला मिरे लिए इक वही-ए-ज़ी-हयात है गोया मिरे लिए ऐ माह-ए-शेर-परवर ओ मेहर-ए-सुख़न-वरी ऐ आब-ओ-रंग-ए-'हाफ़िज़' ओ ऐ हुस्न-ए-'अनवरी' तू ने ही सब्त की है ब-सद नाज़-ए-दावरी मेरे सुख़न की पुश्त पे मोहर-ए-पयम्बरी तेरी शमीम-ए-ज़ुल्फ़ की दौलत लिए हुए मेरा नफ़स है बू-ए-रिसालत लिए हुए दुर-हा-ए-आब-दार ओ शरर-हा-ए-दिल-नशीं शब-हा-ए-तल्ख़-ओ-तुर्श ओ सहर-हा-ए-शक्करीं अक़्ल-ए-नशात-ख़ेज़ ओ जुनून-ए-ग़म-आफ़रीं दौलत वो कौन है जो मिरी जेब में नहीं टकराई जब भी मुझ से ख़जिल सरवरी हुई यूँँ है तिरे फ़क़ीर की झोली भरी हुई नग़्में पले हैं दौलत-ए-गुफ़्तार से तिरी पाया है नुत्क़ चश्म-ए-सुख़न-बार से तिरी ताक़त है दिल में नर्गिस-ए-बीमार से तिरी क्या क्या मिला है 'जोश' को सरकार से तिरी बाँके ख़याल हैं ख़म-ए-गर्दन लिए हुए हर शे'र की कलाई है कंगन लिए हुए ऐ लैली-ए-नहुफ़्ता ओ ऐ हुस्न-ए-शर्मगीं तुझ पर निसार दौलत-ए-दुनिया मता-ए-दीं मंसूब मुझ से है जो ब-अंदाज़-ए-दिल-नशीं तेरी वो शाइ'री है मिरी शाइ'री नहीं आवाज़ा चर्ख़ पर है जो इस दर्द-मंद का गोया वो अक्स है तिरे क़द्द-ए-बुलंद का मेरे बयाँ में ये जो वफ़ूर-ए-सुरूर है ताक़-ए-सुख़न-वरी में जो ये शम-ए-तूर है ये जो मिरे चराग़ की ज़ौ दूर दूर है सरकार ही की मौज-ए-तबस्सुम का नूर है शे'रों में करवटें ये नहीं सोज़-ओ-साज़ की लहरें हैं ये हुज़ूर की ज़ुल्फ़-ए-दराज़ की मुझ रिंद-ए-हुस्न-कार की मय-ख़्वारियाँ न पूछ इस ख़्वाब-ए-जाँ-फ़रोज़ की बेदारियाँ न पूछ करती है क्यूँँ शराब ख़िरद-बारियाँ न पूछ बे-होशियों में क्यूँँ है ये हुश्यारियाँ न पूछ पीता हूँ वो जो ज़ुल्फ़ की रंगीं घटाओं में खिंचती है उन घनी हुई पलकों की छाँव में हुश्यार इस लिए हूँ कि मय-ख़्वार हूँ तिरा सय्याद-ए-शे'र हूँ कि गिरफ़्तार हूँ तिरा लहजा मलीह है कि नमक-ख़्वार हूँ तिरा सह्हत ज़बान में है कि बीमार हूँ तिरा तेरे करम से शेर-ओ-अदब का इमाम हूँ शाहों पे ख़ंदा-ज़न हूँ कि तेरा ग़ुलाम हूँ मैं वो हूँ जिस के ग़म ने तिरे दिल में राह की इक उम्र जिस के इश्क़ में ख़ुद तू ने आह की सोया है शौक़ सेज पे तेरी निगाह की रातें कटी हैं साए में चश्म-ए-सियाह की क्यूँँ कर न शाख़-ए-गुल की लचक हो बयान में तेरी कमर का लोच है मेरी ज़बान में तर्शे हुए लबों के बहकते ख़िताब से ज़रतार काकुलों के महकते सहाब से सरशार अँखड़ियों के दहकते शबाब से मौज-ए-नफ़स के इत्र से मुखड़े की आब से बारह बरस तपा के ज़माना सुहाग का सींचा है तू ने बाग़ मिरे दिल की आग का गर्मी से जिस की बर्फ़ का देवता डरे वो आग शो'लों में ओस को जो मुबद्दल करे वो आग लौ से जो ज़महरीर का दामन भरे वो आग हद है जो नाम नार-ए-सक़र पर धरे वो आग जिस की लपट गले में जलाती है राग को पाला है क़ल्ब-ए-नाज़ में तू ने उस आग को

Josh Malihabadi

0 likes

अलस्सबाह कि थी काएनात सर-ब-सुजूद फ़लक पे शोर-ए-अज़ाँ था ज़मीं पे बाँग-ए-दुरूद बहार शबनम-आसूदा थी कि रूह-ए-ख़लील फ़रोग़-ए-लाला-ओ-गुल था कि आतिश-ए-नमरूद जला रही थी हवा बज़्म-ए-जाँ में शम-ए-तरब मिटा रही थी सबा लौह-ए-दिल से नक़्श-ए-जुमूद गुलों के रंग में थी शान-ए-ख़ंदा-ए-यूसुफ़ कली के साज़ में था लुत्फ़-ए-नग़्मा-ए-दाऊद हर इक जबीं पे दरख़्शाँ था नय्यर-ए-इक़बाल हर एक फ़र्क़ पे ताबाँ था ताला-ए-मसऊद फ़ज़ा-ए-चर्ख़ में दौड़ी हुई थी रूह-ए-ज़ुहूर बिसात-ए-ख़ाक पे छाया हुआ था रंग-ए-नुमूद हसीन ख़्वाब से चौंके थे रसमसाए हुए मचल रही थी हवाओं में बू-ए-अम्बर-ओ-बूद ये रंग देख कर आया मुझे ख़याल-ए-नमाज़ मिरी नमाज़ कि है शाहिद-ओ-शराब-ओ-सुरूद मिरी नमाज़ कि है नग़मा-ए-हुवल-बाक़ी मिरी नमाज़ कि है नारा-ए-हुवल-मौजूद मिरी नमाज़ कि है इश्क़-ए-नाज़िर-ओ-मंज़ूर मिरी नमाज़ कि है हुब्ब-ए-शाहिद-ओ-मशहूद मिरी नमाज़ कि है एक साज़-ए-ला-फ़ानी मरी नमाज़ कि है एक सोज़-ए-ला-महदूद मिरी नमाज़ कि है दीद रू-ए-नाशुस्ता मिरी नमाज़ कि है तौफ़-ए-हुस्न-ए-ख़्वाब-आलूद मिरी नमाज़ ''नज़र'' शैख़ की नमाज़ ''अल्फ़ाज़'' यहाँ चराग़ वहाँ सिर्फ़ शम-ए-कुश्ता का दूद यहाँ है रिश्ता-ए-अन्फ़ास में तरन्नुम-ए-दोस्त यहाँ लताफ़त-ए-एहसास से ज़ियाँ है न सूद फ़ुग़ाँ कि ''जुम्बिश-ए-आज़ा'' वहाँ असास-ए-नमाज़ ख़ोशा कि लर्ज़िश-ए-दिल है यहाँ क़याम ओ क़ूऊद किसी मक़ाम पे हासिल नहीं क़रार मुझे सहर को हूँ जो बरहमन तो शाम को महमूद ग़रज़ कि आते ही वक़्त-ए-सहर ख़याल-ए-नमाज़ जबीं थी पा-ए-सनम पर ज़बाँ पे ''या-माबूद!'' तमाम राज़-ए-निहाँ खुल गए मिरे दिल पर ज़े-तकिया-गाह-ए-अदम ता-ब-कारगाह-ए-वजूद सर-ए-नियाज़ से ज़ाहिर हुआ तबस्सुम-ए-नाज़ बुतून-ए-ख़ाक से पैदा हुआ दुर-ए-मक़सूद उठा के फिर सर-ए-पुर-शौक़ पा-ए-जानाँ से कहा ये मैं ने कि ऐ सर्व-ए-बोस्वतान-ए-जूद बिया बिया कि तिरा तंग दर कनार कुशेम ज़े-बोसा-मेहर-कुनम बर-लब-ए-शकर-आलूद मिरे लबों को भी दे रुख़्सत-ए-तराना-ए-हम्द हर एक ज़र्रा है इस वक़्त आशना-ए-दुरूद ये सुन के शर्म से कोई जवाब बन न पड़ा झुकी निगाह-ए-जबीं हो गई अरक़-आलूद हया ने बढ़ के पुकारा ये ''काहिशें बे-कार'' नज़र ने झुक के सदा दी ये ''काविशें बे-सूद'' ''दहान-ए-यार कि दरमान-ए-दर्द-ए-'हाफ़िज़' दाश्त फ़ुग़ाँ कि वक़्त-ए-मुरव्वत चे तंग हौसला बूद''

Josh Malihabadi

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Josh Malihabadi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Josh Malihabadi's nazm.