ज़ोफ़ से आँखों के नीचे तितलियाँ फिरती हुई औज-ए-ख़ुद्दारी से दिल पर बिजलियाँ गिरती हुई लाश काँधे पर ख़ुद अपने जज़्बा-ए-तकरीम की मुल्तजी चेहरे पे लहरें सी उम्मीद-ओ-बीम की इज़्ज़त-ए-अज्दाद के सर पर दमा-दम ठोकरें रिश्ता-ए-आवाज़ पर लफ़्ज़ों की पैहम ठोकरें चहरा-ए-अफ़्सुर्दा पर ठंडा पसीना शर्म का सुस्त नब्ज़ें भीक का लहजे के अंदर ठीकरा क़र्ज़ की दरख़्वास्त की उलझी हुई तक़रीर में कपकपी आसाब की बेचैन दिल की लरज़िशें इक तरफ़ हाजत की शिद्दत इक तरफ़ ग़ैरत का जोश नुत्क़ पर हर्फ़-ए-तमन्ना दिल में ग़ुस्से का ख़रोश जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ के ज़ेर-ए-साया नादारी की रात जौहर-ए-इंसानियत जोड़े हुए आँखों में हात साँस दहशत से ज़मीं की आसमाँ रोके हुए मुफ़लिसी मर्दाना लहजे की इनाँ रोके हुए लब पे ख़ुश्की रुख़ पे ज़र्दी आँख शरमाई हुई चश्म ओ अबरू में ख़ुदी की आग कजलाई हुई नफ़स में शे'राना तेवर आरज़ू रूबा-मिज़ाज एहतियाज ओ एहतियाज ओ एहतियाज ओ एहतियाज!
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"पहला इश्क़" तअर्रुफ़ हुआ था अभी ही उन से वक़्त कहाँ ज़्यादा गुज़रा है बातें होती थी बहुत ही उन से वक़्त कहाँ ज़्यादा सुधरा है अंकों में दिलचस्पी मुझे उर्दू का थोड़ा-सा ज्ञान था वो अंग्रेज़ी से वाक़िफ़ बहुत लेकिन शून्य सा अभिमान था पसंद उन की आँखों में काजल और उन पर वो चश्मा था उन्हें पसंद मेरी घनी दाढ़ी और आँखों में सुरमा था कभी ये ला दो तो कभी वो ला दो मैं ने की हर ख़्वाहिश पूरी लेकिन महरम बनाने की मेरी ख़्वाहिश रह गई अधूरी कहा था उन्होंने पहले ही मुझ से रख दो अपने माँ-बाप को अर्ज़ी पर ज़फ़र डरता खोने से उन को और कहा जैसी रब की मर्ज़ी न जाने कौन सा लज़ीज़ वक़्त था की इश्क़ की रसोई को हम ने पकाया अगर अलाहिदा करना ही था मक़्सद तो फिर क्यूँँ हम दोनों को मिलाया
ZafarAli Memon
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"लव ट्राईऐंगल" जब ख़यालों में मैं उस के पीछे पीछे जाता भाव खाती देखो फिर मैं उस सेे रुठ जाता ऐसे वैसे कैसे कैसे मुझ को वो मनाती जान थी मेरी वो कैसे मैं ना मान पाता अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता तू सवाल और तेरा मैं जवाब होता काश जो तू मेरी आँखों में वो झाँक जाती तेरे पास में जो महका मैं गुलाब होता अगर ये ख़्वाब सच हुआ तो सुनले ऐ हसीं मैं पूरी उम्र तेरे दिल में ही गुज़ार दूँ तू जो चले तो दिन हो जब रूके तो रात हो ये काएनात तेरे क़दमों में उतार दूँ अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता काश जो तू बोले तेरी मैं आवाज़ होता तू शबाब तेरी धुन में मैं शराब होता सबके चेहरों को तो तू यूँँ निहार जाती तेरे नैनों का कभी तो मैं शिकार होता अपने लव का ट्राईऐंगल काश जो ना बनता
Rohit tewatia 'Ishq'
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"शनासाई" रात के हाथ पे जलती हुई इक शम-ए-वफ़ा अपना हक़ माँगती है दूर ख़्वाबों के जज़ीरे में किसी रौज़न से सुब्ह की एक किरन झाँकती है वो किरन दरपा-ए-आज़ार हुई जाती है मेरी ग़म-ख़्वार हुई जाती है आओ किरनों को अँधेरों का कफ़न पहनाएँ इक चमकता हुआ सूरज सर-ए-मक़्तल लाएँ तुम मिरे पास रहो और यही बात कहो आज भी हर्फ़-ए-वफ़ा बाइस-ए-रुस्वाई है अपने क़ातिल से मिरी ख़ूब शनासाई है
Akhtar Payami
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मैं रात उठूँ और अपने सारे पुराने यारों को फ़ोन कर के उन्हें जगाऊँ उन्हें जगाऊँ उन्हें बताऊँ कि यार तुम सब बदल गए हो बहुत ही आगे निकल गए हो जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली जो रातें तुम ने पसंद की हैं वो सख़्त काली हैं सख़्त काली ज़रा सा माज़ी बईद देखो हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ पे हम से अगर हमारा कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर निकालते थे हँसी की बातें, अजीब क़िस्से, अजीब सस्ते से जोक कह के किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे और आज आलम है ऐसा हम सब ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं हमारी लाइफ़ में कोई लड़की हमारी लाइफ़ बनी हुई है हमारी आँखों पे प्यार नामक सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे किसी का नंबर लगाऊँ कैसे मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ??
Shadab Javed
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अब सबा कूचा-ए-जानाँ में गुज़रे है कि नहीं तुझ को इस फ़ित्ना-ए-आलम की ख़बर है कि नहीं बुझ गया मेहर का फ़ानूस कि रौशन है अभी अब उन आँखों में लगावट का असर है कि नहीं अब मेरे नाम का पढ़ता है वज़ीफ़ा कोई अब मिरा ज़िक्र-ए-वफ़ा दर्द-ए-सहर है कि नहीं अब भी तकती हैं मिरी राह वो काफ़िर आँखें अब भी दुज़्दीदा नज़र जानिब-ए-दर है कि नहीं छुप के रातों को मिरी याद में रोता है कोई मौजज़न आँख में अब ख़ून-ए-जिगर है कि नहीं हुस्न को पुर्सिश-ए-बीमार का है अब भी ख़याल मेहर की ज़र्रा ख़ाकी पे नज़र है कि नहीं बे-ख़बर मुझ को ज़माने से किया है जिस ने कुछ उसे मेरी तबाही की ख़बर है कि नहीं खाए जाता है मुझे दर्द-ए-ग़रीब-उल-वतनी दिल पर इस जान-ए-वतन के भी असर है कि नहीं 'जोश' ख़ामोश भी हो पूछ रहा है क्या क्या कुछ तुझे ताड़ने वालों की ख़बर है कि नहीं
Josh Malihabadi
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अलस्सबाह कि थी काएनात सर-ब-सुजूद फ़लक पे शोर-ए-अज़ाँ था ज़मीं पे बाँग-ए-दुरूद बहार शबनम-आसूदा थी कि रूह-ए-ख़लील फ़रोग़-ए-लाला-ओ-गुल था कि आतिश-ए-नमरूद जला रही थी हवा बज़्म-ए-जाँ में शम-ए-तरब मिटा रही थी सबा लौह-ए-दिल से नक़्श-ए-जुमूद गुलों के रंग में थी शान-ए-ख़ंदा-ए-यूसुफ़ कली के साज़ में था लुत्फ़-ए-नग़्मा-ए-दाऊद हर इक जबीं पे दरख़्शाँ था नय्यर-ए-इक़बाल हर एक फ़र्क़ पे ताबाँ था ताला-ए-मसऊद फ़ज़ा-ए-चर्ख़ में दौड़ी हुई थी रूह-ए-ज़ुहूर बिसात-ए-ख़ाक पे छाया हुआ था रंग-ए-नुमूद हसीन ख़्वाब से चौंके थे रसमसाए हुए मचल रही थी हवाओं में बू-ए-अम्बर-ओ-बूद ये रंग देख कर आया मुझे ख़याल-ए-नमाज़ मिरी नमाज़ कि है शाहिद-ओ-शराब-ओ-सुरूद मिरी नमाज़ कि है नग़मा-ए-हुवल-बाक़ी मिरी नमाज़ कि है नारा-ए-हुवल-मौजूद मिरी नमाज़ कि है इश्क़-ए-नाज़िर-ओ-मंज़ूर मिरी नमाज़ कि है हुब्ब-ए-शाहिद-ओ-मशहूद मिरी नमाज़ कि है एक साज़-ए-ला-फ़ानी मरी नमाज़ कि है एक सोज़-ए-ला-महदूद मिरी नमाज़ कि है दीद रू-ए-नाशुस्ता मिरी नमाज़ कि है तौफ़-ए-हुस्न-ए-ख़्वाब-आलूद मिरी नमाज़ ''नज़र'' शैख़ की नमाज़ ''अल्फ़ाज़'' यहाँ चराग़ वहाँ सिर्फ़ शम-ए-कुश्ता का दूद यहाँ है रिश्ता-ए-अन्फ़ास में तरन्नुम-ए-दोस्त यहाँ लताफ़त-ए-एहसास से ज़ियाँ है न सूद फ़ुग़ाँ कि ''जुम्बिश-ए-आज़ा'' वहाँ असास-ए-नमाज़ ख़ोशा कि लर्ज़िश-ए-दिल है यहाँ क़याम ओ क़ूऊद किसी मक़ाम पे हासिल नहीं क़रार मुझे सहर को हूँ जो बरहमन तो शाम को महमूद ग़रज़ कि आते ही वक़्त-ए-सहर ख़याल-ए-नमाज़ जबीं थी पा-ए-सनम पर ज़बाँ पे ''या-माबूद!'' तमाम राज़-ए-निहाँ खुल गए मिरे दिल पर ज़े-तकिया-गाह-ए-अदम ता-ब-कारगाह-ए-वजूद सर-ए-नियाज़ से ज़ाहिर हुआ तबस्सुम-ए-नाज़ बुतून-ए-ख़ाक से पैदा हुआ दुर-ए-मक़सूद उठा के फिर सर-ए-पुर-शौक़ पा-ए-जानाँ से कहा ये मैं ने कि ऐ सर्व-ए-बोस्वतान-ए-जूद बिया बिया कि तिरा तंग दर कनार कुशेम ज़े-बोसा-मेहर-कुनम बर-लब-ए-शकर-आलूद मिरे लबों को भी दे रुख़्सत-ए-तराना-ए-हम्द हर एक ज़र्रा है इस वक़्त आशना-ए-दुरूद ये सुन के शर्म से कोई जवाब बन न पड़ा झुकी निगाह-ए-जबीं हो गई अरक़-आलूद हया ने बढ़ के पुकारा ये ''काहिशें बे-कार'' नज़र ने झुक के सदा दी ये ''काविशें बे-सूद'' ''दहान-ए-यार कि दरमान-ए-दर्द-ए-'हाफ़िज़' दाश्त फ़ुग़ाँ कि वक़्त-ए-मुरव्वत चे तंग हौसला बूद''
Josh Malihabadi
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क्या हाल कहें उस मौसम का जब जिंस-ए-जवानी सस्ती थी जिस फूल को चूमो खुलता था जिस शय को देखो हँसती थी जीना सच्चा जीना था हस्ती ऐन हस्ती थी अफ़्साना जादू अफ़्सूँ था ग़फ़लत नींदें मस्ती थी उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी ग़फ़लत नींदें हस्ती थी आँखें क्या पैमाने थे हर रोज़ जवानी बिकती थी हर शाम-ओ-सहर बैआ'ने थे हर ख़ार में इक बुत-ख़ाना था हर फूल में सौ मय-ख़ाने थे काली काली ज़ुल्फ़ें थीं गोरे गोरे शाने थे उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी गोरे गोरे शाने थे हल्की-फुल्की बाँहें थीं हर-गाम पे ख़ल्वत-ख़ाने थे हर मोड़ पे इशरत-गाहें थीं तुग़्यान ख़ुशी के आँसू थे तकमील-ए-तरब की आहें थीं इश्वे चुहलें ग़म्ज़े थे पल्तीं ख़ुशियाँ चाहीं थीं उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी
Josh Malihabadi
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छा गई बरसात की पहली घटा अब क्या करूँँ ख़ौफ़ था जिस का वो आ पहुँची बला अब क्या करूँँ हिज्र को बहला चली थी गर्म मौसम की सुमूम ना-गहाँ चलने लगी ठंडी हवा अब क्या करूँँ आँख उठी ही थी कि अब्र-ए-लाला-गूँ की छाँव में दर्द से कहने लगा कुछ झुटपुटा अब क्या करूँँ अश्क अभी थमने न पाए थे कि बे-दर्दी के साथ बूंदियों से बोस्ताँ बजने लगा अब क्या करूँँ ज़ख़्म अब भरने न पाए थे कि बादल चर्ख़ पर आ गया अंगड़ाइयाँ लेता हुआ अब क्या करूँँ आ चुकी थी नींद सी ग़म को कि मौसम ना-गहाँ बहर-ओ-बर में करवटें लेने लगा अब क्या करूँँ चर्ख़ की बे-रंगियों से सुस्त थी रफ़्तार-ए-ग़म यक-ब-यक हर ज़र्रा गुलशन बन गया अब क्या करूँँ क़ुफ़्ल-ए-बाब-ए-शौक़ थीं माहौल की ख़ामोशियाँ दफ़अ'तन काफ़िर पपीहा बोल उठा अब क्या करूँँ हिज्र का सीने में कुछ कम हो चला था पेच-ओ-ताब बाल बिखराने लगी काली घटा अब क्या करूँँ आँख झपकाने लगी थी दिल में याद-ए-लहन-ए-याद मोर की आने लगी बन से सदा अब क्या करूँँ घट चला था ग़म की रंगीं बदलियों की आड़ से उन का चेहरा सामने आने लगा अब क्या करूँँ आ रही हैं अब्र से उन की सदाएँ 'जोश' 'जोश' ऐ ख़ुदा अब क्या करूँँ बार-ए-ख़ुदा अब क्या करूँँ
Josh Malihabadi
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फ़िरदौस बनाए हुए सावन के महीने इक गुल-रुख़ ओ नस्रीं-बदन ओ सर्व-ए-सही ने माथे पे इधर काकुल-ए-ज़ोलीदा की लहरें गर्दूं पे उधर अब्र-ए-ख़िरामाँ के सफ़ीने मेंह जितना बरसता था सर-ए-दामन-ए-कोहसार इतने ही ज़मीं अपनी उगलती थी दफ़ीने अल्लाह-रे ये फ़रमान कि इस मस्त हवा में हम मुँह से न बोलेंगे अगर पी न किसी ने वो मूनिस-ओ-ग़म-ख़्वार था जिस के लिए बरसों माँगी थीं दुआएँ मिरे आग़ोश-ए-तही ने गुल-रेज़ थे साहिल के लचकते हुए पौदे गुल-रंग थे तालाब के तर्शे हुए ज़ीने बारिश थी लगातार तो यूँँ गर्द थी मफ़क़ूद जिस तरह मय-ए-नाब से धुल जाते हैं सीने दम भर को भी थमती थीं अगर सर्द हवाएँ आते थे जवानी को पसीने पे पसीने भर दी थी चटानों में भी ग़ुंचों की सी नर्मी इक फ़ित्ना-ए-कौनैन की नाज़ुक-बदनी ने गेती से उबलते थे तमन्ना के सलीक़े गर्दूं से बरसते थे मोहब्बत के क़रीने क्या दिल की तमन्नाओं को मरबूत किया था सब्ज़े पे चमकती हुई सावन की झड़ी ने बदली थी फ़लक पर कि जुनूँ-ख़ेज़ जवानी बूँदें थीं ज़मीं पर कि अँगूठी के नगीने शाख़ों पे परिंदे थे झटकते हुए शहपर नहरों में बतें अपने उभारे हुए सीने इस फ़स्ल में इस दर्जा रहा बे-ख़ुद ओ सरशार मयख़ाने से बाहर मुझे देखा न किसी ने क्या लम्हा-ए-फ़ानी था कि मुड़ कर भी न देखा दी कितनी ही आवाज़ हयात-ए-अबदी ने
Josh Malihabadi
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