अब सबा कूचा-ए-जानाँ में गुज़रे है कि नहीं तुझ को इस फ़ित्ना-ए-आलम की ख़बर है कि नहीं बुझ गया मेहर का फ़ानूस कि रौशन है अभी अब उन आँखों में लगावट का असर है कि नहीं अब मेरे नाम का पढ़ता है वज़ीफ़ा कोई अब मिरा ज़िक्र-ए-वफ़ा दर्द-ए-सहर है कि नहीं अब भी तकती हैं मिरी राह वो काफ़िर आँखें अब भी दुज़्दीदा नज़र जानिब-ए-दर है कि नहीं छुप के रातों को मिरी याद में रोता है कोई मौजज़न आँख में अब ख़ून-ए-जिगर है कि नहीं हुस्न को पुर्सिश-ए-बीमार का है अब भी ख़याल मेहर की ज़र्रा ख़ाकी पे नज़र है कि नहीं बे-ख़बर मुझ को ज़माने से किया है जिस ने कुछ उसे मेरी तबाही की ख़बर है कि नहीं खाए जाता है मुझे दर्द-ए-ग़रीब-उल-वतनी दिल पर इस जान-ए-वतन के भी असर है कि नहीं 'जोश' ख़ामोश भी हो पूछ रहा है क्या क्या कुछ तुझे ताड़ने वालों की ख़बर है कि नहीं
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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क्या हाल कहें उस मौसम का जब जिंस-ए-जवानी सस्ती थी जिस फूल को चूमो खुलता था जिस शय को देखो हँसती थी जीना सच्चा जीना था हस्ती ऐन हस्ती थी अफ़्साना जादू अफ़्सूँ था ग़फ़लत नींदें मस्ती थी उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी ग़फ़लत नींदें हस्ती थी आँखें क्या पैमाने थे हर रोज़ जवानी बिकती थी हर शाम-ओ-सहर बैआ'ने थे हर ख़ार में इक बुत-ख़ाना था हर फूल में सौ मय-ख़ाने थे काली काली ज़ुल्फ़ें थीं गोरे गोरे शाने थे उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी गोरे गोरे शाने थे हल्की-फुल्की बाँहें थीं हर-गाम पे ख़ल्वत-ख़ाने थे हर मोड़ पे इशरत-गाहें थीं तुग़्यान ख़ुशी के आँसू थे तकमील-ए-तरब की आहें थीं इश्वे चुहलें ग़म्ज़े थे पल्तीं ख़ुशियाँ चाहीं थीं उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी
Josh Malihabadi
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ज़ोफ़ से आँखों के नीचे तितलियाँ फिरती हुई औज-ए-ख़ुद्दारी से दिल पर बिजलियाँ गिरती हुई लाश काँधे पर ख़ुद अपने जज़्बा-ए-तकरीम की मुल्तजी चेहरे पे लहरें सी उम्मीद-ओ-बीम की इज़्ज़त-ए-अज्दाद के सर पर दमा-दम ठोकरें रिश्ता-ए-आवाज़ पर लफ़्ज़ों की पैहम ठोकरें चहरा-ए-अफ़्सुर्दा पर ठंडा पसीना शर्म का सुस्त नब्ज़ें भीक का लहजे के अंदर ठीकरा क़र्ज़ की दरख़्वास्त की उलझी हुई तक़रीर में कपकपी आसाब की बेचैन दिल की लरज़िशें इक तरफ़ हाजत की शिद्दत इक तरफ़ ग़ैरत का जोश नुत्क़ पर हर्फ़-ए-तमन्ना दिल में ग़ुस्से का ख़रोश जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ के ज़ेर-ए-साया नादारी की रात जौहर-ए-इंसानियत जोड़े हुए आँखों में हात साँस दहशत से ज़मीं की आसमाँ रोके हुए मुफ़लिसी मर्दाना लहजे की इनाँ रोके हुए लब पे ख़ुश्की रुख़ पे ज़र्दी आँख शरमाई हुई चश्म ओ अबरू में ख़ुदी की आग कजलाई हुई नफ़स में शे'राना तेवर आरज़ू रूबा-मिज़ाज एहतियाज ओ एहतियाज ओ एहतियाज ओ एहतियाज!
Josh Malihabadi
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ऐ शम-ए-'जोश' ओ मशअ'ल-ए-ऐवान-ए-आरज़ू ऐ मेहर-ए-नाज़ ओ माह-ए-शबिस्तान-ए-आरज़ू ऐ जान-ए-दर्द-मंदी ओ ईमान-ए-आरज़ू ऐ शम-ए-तूर ओ यूसुफ़-ए-कनआ'न-ए-आरज़ू ज़र्रे को आफ़्ताब तो काँटे को फूल कर ऐ रूह-ए-शे'र सज्दा-ए-शाइ'र क़ुबूल कर दरिया का मोड़ नग़्मा-ए-शीरीं का ज़ेर-ओ-बम चादर शब-ए-नुजूम की शबनम का रख़्त-ए-नम तितली का नाज़-ए-रक़्स ग़ज़ाला का हुस्न-ए-रम मोती की आब गुल की महक माह-ए-नौ का ख़म इन सब के इम्तिज़ाज से पैदा हुई है तू कितने हसीं उफ़ुक़ से हुवैदा हुई है तू होता है मह-वशों का वो आलम तिरे हुज़ूर जैसे चराग़-ए-मुर्दा सर-ए-बज़्म-ए-शम-ए-तूर आ कर तिरी जनाब में ऐ कार-साज़-ए-नूर पलकों में मुँह छुपाते हैं झेंपे हुए ग़ुरूर आती है एक लहर सी चेहरों पर आह की आँखों में छूट जाती हैं नब्ज़ें निगाह की रफ़्तार है कि चाँदनी रातों में मौज-ए-गंग या भैरवीं की पिछले पहर क़ल्ब में उमंग ये काकुलों की ताब है ये आरिज़ों का रंग जिस तरह झुट-पुटे में शब-ओ-रोज़ की तरंग रू-ए-मुबीं न गेसू-ए-सुम्बुल-क़वाम है वो बरहमन की सुब्ह ये साक़ी की शाम है आवाज़ में ये रस ये लताफ़त ये इज़्तिरार जैसे सुबुक महीन रवाँ रेशमी फुवार लहजे में ये खटक है कि है नेश्तर की धार और गिर रहा है धार से शबनम का आबशार चहकी जो तू चमन में हवाएँ महक गईं गुल-बर्ग-ए-तर से ओस की बूँदें टपक गईं जादू है तेरी सौत का गुल पर हज़ार पर जैसे नसीम-ए-सुब्ह की रौ जू-ए-बार पर नाख़ुन किसी निगार का चाँदी के तार पर मिज़राब-ए-अक्स-ए-क़ौस रग-ए-आबशार पर मौजें सबा की बाग़ पे सहबा छिड़क गईं जुम्बिश हुई लबों को तो कलियाँ चटक गईं चश्म-ए-सियाह में वो तलातुम है नूर का जैसे शराब-ए-नाब में जौहर सुरूर का या चहचहों के वक़्त तमव्वुज तुयूर का बाँधे हुए निशाना कोई जैसे दूर का हर मौज-ए-रंग-ए-क़ामत-ए-गुलरेज़ रम में है गोया शराब-ए-तुंद बिलोरीं क़लम में है तुझ से नज़र मिलाए ये किस की भला मजाल तेरे क़दम का नक़्श हसीनों के ख़द्द-ओ-ख़ाल अल्लाह रे तेरे हुस्न-ए-मलक-सोज़ का जलाल जब देखती हैं ख़ुल्द से हूरें तिरा जमाल परतव से तेरे चेहरा-ए-पर्वीं-सरिश्त के घबरा के बंद करती हैं ग़ुर्फ़े बहिश्त के चेहरे को रंग-ओ-नूर का तूफ़ाँ किए हुए शम-ओ-शराब-ओ-शे'र का उनवाँ किए हुए हर नक़्श-ए-पा को ताज-ए-गुलिस्ताँ किए हुए सौ तूर इक निगाह में पिन्हाँ किए हुए आती है तू चमन में जब इस तर्ज़-ओ-तौर से गुल देखते हैं बाग़ में बुलबुल को ग़ौर से मेरे बयाँ में सेहर-बयानी तुझी से है रू-ए-सुख़न पे ख़ून-ए-जवानी तुझी से है लफ़्ज़ों में रक़्स-ओ-रंग-ओ-रवानी तुझी से है फ़क़्र-ए-गदा में फ़र्र-ए-कियानी तुझी से है फ़िदवी के इस उरूज पे करती है ग़ौर क्या तेरी ही जूतियों का तसद्दुक़ है और क्या ऐ किर्दगार-ए-मा'नी ओ ख़ल्लाक़-ए-शेर-ए-तर ऐ जान-ए-ज़ौक़ ओ मुहसिना-ए-लैली-ए-हुनर खुल जाए गर ये बात कि उर्दू ज़बान पर तेरी निगाह-ए-नाज़ का एहसाँ है किस क़दर चारों तरफ़ से नारा-ए-सल्ले-अला उठे तेरे मुजस्समों से ज़मीं जगमगा उठे मेरे हुनर में सर्फ़ हुई है तिरी नज़र ख़ेमा है मेरे नाम का बाला-ए-बहर-ओ-बर शोहरत की बज़्म तुझ से मुनव्वर नहीं मगर फ़र्क़-ए-गदा पे ताज है सुल्ताँ बरहना-सर परवाने को वो कौन है जो मानता नहीं और शम्अ'' किस तरफ़ है कोई जानता नहीं दिल तेरी बज़्म-ए-नाज़ में जब से है बारयाब हर ख़ार एक गुल है तो हर ज़र्रा आफ़्ताब इक लश्कर-ए-नशात है हर ग़म के हम-रिकाब ज़ेर-ए-नगीं है आलम-ए-तमकीन-ओ-इज़तिराब बाद-ए-मुराद ओ चश्मक-ए-तूफ़ाँ लिए हुए हूँ बू-ए-ज़ुल्फ़-ओ-जुंबिश-ए-मिज़्गाँ लिए हुए तेरे लबों से चश्मा-ए-हैवाँ मिरा कलाम तेरी लटों से मौजा-ए-तूफ़ाँ मिरा कलाम तेरी नज़र से तूर-ब-दामाँ मिरा कलाम तेरे सुख़न से नग़्मा-ए-यज़्दाँ मिरा कलाम तू है पयाम-ए-आलम-ए-बाला मिरे लिए इक वही-ए-ज़ी-हयात है गोया मिरे लिए ऐ माह-ए-शेर-परवर ओ मेहर-ए-सुख़न-वरी ऐ आब-ओ-रंग-ए-'हाफ़िज़' ओ ऐ हुस्न-ए-'अनवरी' तू ने ही सब्त की है ब-सद नाज़-ए-दावरी मेरे सुख़न की पुश्त पे मोहर-ए-पयम्बरी तेरी शमीम-ए-ज़ुल्फ़ की दौलत लिए हुए मेरा नफ़स है बू-ए-रिसालत लिए हुए दुर-हा-ए-आब-दार ओ शरर-हा-ए-दिल-नशीं शब-हा-ए-तल्ख़-ओ-तुर्श ओ सहर-हा-ए-शक्करीं अक़्ल-ए-नशात-ख़ेज़ ओ जुनून-ए-ग़म-आफ़रीं दौलत वो कौन है जो मिरी जेब में नहीं टकराई जब भी मुझ से ख़जिल सरवरी हुई यूँँ है तिरे फ़क़ीर की झोली भरी हुई नग़्में पले हैं दौलत-ए-गुफ़्तार से तिरी पाया है नुत्क़ चश्म-ए-सुख़न-बार से तिरी ताक़त है दिल में नर्गिस-ए-बीमार से तिरी क्या क्या मिला है 'जोश' को सरकार से तिरी बाँके ख़याल हैं ख़म-ए-गर्दन लिए हुए हर शे'र की कलाई है कंगन लिए हुए ऐ लैली-ए-नहुफ़्ता ओ ऐ हुस्न-ए-शर्मगीं तुझ पर निसार दौलत-ए-दुनिया मता-ए-दीं मंसूब मुझ से है जो ब-अंदाज़-ए-दिल-नशीं तेरी वो शाइ'री है मिरी शाइ'री नहीं आवाज़ा चर्ख़ पर है जो इस दर्द-मंद का गोया वो अक्स है तिरे क़द्द-ए-बुलंद का मेरे बयाँ में ये जो वफ़ूर-ए-सुरूर है ताक़-ए-सुख़न-वरी में जो ये शम-ए-तूर है ये जो मिरे चराग़ की ज़ौ दूर दूर है सरकार ही की मौज-ए-तबस्सुम का नूर है शे'रों में करवटें ये नहीं सोज़-ओ-साज़ की लहरें हैं ये हुज़ूर की ज़ुल्फ़-ए-दराज़ की मुझ रिंद-ए-हुस्न-कार की मय-ख़्वारियाँ न पूछ इस ख़्वाब-ए-जाँ-फ़रोज़ की बेदारियाँ न पूछ करती है क्यूँँ शराब ख़िरद-बारियाँ न पूछ बे-होशियों में क्यूँँ है ये हुश्यारियाँ न पूछ पीता हूँ वो जो ज़ुल्फ़ की रंगीं घटाओं में खिंचती है उन घनी हुई पलकों की छाँव में हुश्यार इस लिए हूँ कि मय-ख़्वार हूँ तिरा सय्याद-ए-शे'र हूँ कि गिरफ़्तार हूँ तिरा लहजा मलीह है कि नमक-ख़्वार हूँ तिरा सह्हत ज़बान में है कि बीमार हूँ तिरा तेरे करम से शेर-ओ-अदब का इमाम हूँ शाहों पे ख़ंदा-ज़न हूँ कि तेरा ग़ुलाम हूँ मैं वो हूँ जिस के ग़म ने तिरे दिल में राह की इक उम्र जिस के इश्क़ में ख़ुद तू ने आह की सोया है शौक़ सेज पे तेरी निगाह की रातें कटी हैं साए में चश्म-ए-सियाह की क्यूँँ कर न शाख़-ए-गुल की लचक हो बयान में तेरी कमर का लोच है मेरी ज़बान में तर्शे हुए लबों के बहकते ख़िताब से ज़रतार काकुलों के महकते सहाब से सरशार अँखड़ियों के दहकते शबाब से मौज-ए-नफ़स के इत्र से मुखड़े की आब से बारह बरस तपा के ज़माना सुहाग का सींचा है तू ने बाग़ मिरे दिल की आग का गर्मी से जिस की बर्फ़ का देवता डरे वो आग शो'लों में ओस को जो मुबद्दल करे वो आग लौ से जो ज़महरीर का दामन भरे वो आग हद है जो नाम नार-ए-सक़र पर धरे वो आग जिस की लपट गले में जलाती है राग को पाला है क़ल्ब-ए-नाज़ में तू ने उस आग को
Josh Malihabadi
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अलस्सबाह कि थी काएनात सर-ब-सुजूद फ़लक पे शोर-ए-अज़ाँ था ज़मीं पे बाँग-ए-दुरूद बहार शबनम-आसूदा थी कि रूह-ए-ख़लील फ़रोग़-ए-लाला-ओ-गुल था कि आतिश-ए-नमरूद जला रही थी हवा बज़्म-ए-जाँ में शम-ए-तरब मिटा रही थी सबा लौह-ए-दिल से नक़्श-ए-जुमूद गुलों के रंग में थी शान-ए-ख़ंदा-ए-यूसुफ़ कली के साज़ में था लुत्फ़-ए-नग़्मा-ए-दाऊद हर इक जबीं पे दरख़्शाँ था नय्यर-ए-इक़बाल हर एक फ़र्क़ पे ताबाँ था ताला-ए-मसऊद फ़ज़ा-ए-चर्ख़ में दौड़ी हुई थी रूह-ए-ज़ुहूर बिसात-ए-ख़ाक पे छाया हुआ था रंग-ए-नुमूद हसीन ख़्वाब से चौंके थे रसमसाए हुए मचल रही थी हवाओं में बू-ए-अम्बर-ओ-बूद ये रंग देख कर आया मुझे ख़याल-ए-नमाज़ मिरी नमाज़ कि है शाहिद-ओ-शराब-ओ-सुरूद मिरी नमाज़ कि है नग़मा-ए-हुवल-बाक़ी मिरी नमाज़ कि है नारा-ए-हुवल-मौजूद मिरी नमाज़ कि है इश्क़-ए-नाज़िर-ओ-मंज़ूर मिरी नमाज़ कि है हुब्ब-ए-शाहिद-ओ-मशहूद मिरी नमाज़ कि है एक साज़-ए-ला-फ़ानी मरी नमाज़ कि है एक सोज़-ए-ला-महदूद मिरी नमाज़ कि है दीद रू-ए-नाशुस्ता मिरी नमाज़ कि है तौफ़-ए-हुस्न-ए-ख़्वाब-आलूद मिरी नमाज़ ''नज़र'' शैख़ की नमाज़ ''अल्फ़ाज़'' यहाँ चराग़ वहाँ सिर्फ़ शम-ए-कुश्ता का दूद यहाँ है रिश्ता-ए-अन्फ़ास में तरन्नुम-ए-दोस्त यहाँ लताफ़त-ए-एहसास से ज़ियाँ है न सूद फ़ुग़ाँ कि ''जुम्बिश-ए-आज़ा'' वहाँ असास-ए-नमाज़ ख़ोशा कि लर्ज़िश-ए-दिल है यहाँ क़याम ओ क़ूऊद किसी मक़ाम पे हासिल नहीं क़रार मुझे सहर को हूँ जो बरहमन तो शाम को महमूद ग़रज़ कि आते ही वक़्त-ए-सहर ख़याल-ए-नमाज़ जबीं थी पा-ए-सनम पर ज़बाँ पे ''या-माबूद!'' तमाम राज़-ए-निहाँ खुल गए मिरे दिल पर ज़े-तकिया-गाह-ए-अदम ता-ब-कारगाह-ए-वजूद सर-ए-नियाज़ से ज़ाहिर हुआ तबस्सुम-ए-नाज़ बुतून-ए-ख़ाक से पैदा हुआ दुर-ए-मक़सूद उठा के फिर सर-ए-पुर-शौक़ पा-ए-जानाँ से कहा ये मैं ने कि ऐ सर्व-ए-बोस्वतान-ए-जूद बिया बिया कि तिरा तंग दर कनार कुशेम ज़े-बोसा-मेहर-कुनम बर-लब-ए-शकर-आलूद मिरे लबों को भी दे रुख़्सत-ए-तराना-ए-हम्द हर एक ज़र्रा है इस वक़्त आशना-ए-दुरूद ये सुन के शर्म से कोई जवाब बन न पड़ा झुकी निगाह-ए-जबीं हो गई अरक़-आलूद हया ने बढ़ के पुकारा ये ''काहिशें बे-कार'' नज़र ने झुक के सदा दी ये ''काविशें बे-सूद'' ''दहान-ए-यार कि दरमान-ए-दर्द-ए-'हाफ़िज़' दाश्त फ़ुग़ाँ कि वक़्त-ए-मुरव्वत चे तंग हौसला बूद''
Josh Malihabadi
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ऐ दिल-ए-अफ़सुर्दा वो असरार-ए-बातिन क्या हुए सोज़ की रातें कहाँ हैं साज़ के दिन क्या हुए आँसुओं की वो झड़ी वो ग़म का सामाँ क्या हुआ तेरा सावन का महीना चश्म-ए-गिर्यां क्या हुआ क्या हुई बाला-ए-सर वो लुत्फ़-ए-यज़्दाँ की घटा आसमान-ए-दिल पे वो घनघोर इरफ़ाँ की घटा अब वो नालों की गरज है अब न वो शोर-ए-फ़ुग़ाँ अब न उठता है कलेजा से मोहब्बत का धुआँ अपने अफ़आ'ल-ए-सियह पर अब पशेमानी नहीं अब पसीने के सितारे ज़ेब-ए-पेशानी नहीं दर्द की मुद्दत से अब दिल में चमक होती नहीं वो तपक छालों की कौंदे की लपक होती नहीं ज़िक्र-ए-मौला से लबों पर अब वो नर्मी ही नहीं भाप सीने से उठे क्या दिल में गर्मी ही नहीं अब शरारे सोज़-ए-ग़म के दिल में रहते ही नहीं अश्क अब पिछले पहर आँखों से बहते ही नहीं मअ'रिफ़त दिल में न अब वो रूह में एहसास है लोग कहते हैं कि है लेकिन हमें तो यास है अब न वो आँखों में अश्क-ए-ख़ूँ न वो दिल में गुदाज़ अब न वो शाम-ए-तमन्ना है न वो सुब्ह-ए-नियाज़ ख़ुश्क हैं आँखें जबीनें तंग सीने सर्द हैं अब न वो दुखते हुए दिल हैं न चेहरे ज़र्द हैं आह की और दिल उमँड आया ये होता ही नहीं डूब कर ज़ौक़-ए-फ़ना में कोई रोता ही नहीं फूल दाग़ों से खिले थे जिस दिल-ए-सरशार में ख़ाक अब मुद्दत से उड़ती है उसी गुलज़ार में आँसुओं से नम जो रहता था वो दामाँ जल गया लहलहाता था जो सीने में गुलिस्ताँ जल गया रूह में बालीदगी की क़ुव्वतें मादूम हैं दोनों आँखें आँसुओं के फ़ैज़ से महरूम हैं पेच-ओ-ख़म से बहने वाला दिल का दरिया ख़ुश्क है वो भरी बरसात या'नी चश्म-ए-बीना ख़ुश्क है ख़ून है दिल में मगर पहली सी तुग़्यानी नहीं अब्र है बाद-ए-मुख़ालिफ़ से मगर पानी नहीं जब ये आलम है तो बारिश की शिकायत किस लिए बे-महल ये हसरत-ए-बारान-ए-रहमत किस लिए इक मुजस्सम ख़ुश्क-साली ख़ुद हमारी ज़ात है ज़िद हमारी हस्तियों की अब्र है बरसात है रहमतों से जोश में आने की ख़्वाहिश क्या करें ख़ुद सरापा क़हत हैं उम्मीद-ए-बारिश क्या करें
Josh Malihabadi
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