ऐ दिल-ए-अफ़सुर्दा वो असरार-ए-बातिन क्या हुए सोज़ की रातें कहाँ हैं साज़ के दिन क्या हुए आँसुओं की वो झड़ी वो ग़म का सामाँ क्या हुआ तेरा सावन का महीना चश्म-ए-गिर्यां क्या हुआ क्या हुई बाला-ए-सर वो लुत्फ़-ए-यज़्दाँ की घटा आसमान-ए-दिल पे वो घनघोर इरफ़ाँ की घटा अब वो नालों की गरज है अब न वो शोर-ए-फ़ुग़ाँ अब न उठता है कलेजा से मोहब्बत का धुआँ अपने अफ़आ'ल-ए-सियह पर अब पशेमानी नहीं अब पसीने के सितारे ज़ेब-ए-पेशानी नहीं दर्द की मुद्दत से अब दिल में चमक होती नहीं वो तपक छालों की कौंदे की लपक होती नहीं ज़िक्र-ए-मौला से लबों पर अब वो नर्मी ही नहीं भाप सीने से उठे क्या दिल में गर्मी ही नहीं अब शरारे सोज़-ए-ग़म के दिल में रहते ही नहीं अश्क अब पिछले पहर आँखों से बहते ही नहीं मअ'रिफ़त दिल में न अब वो रूह में एहसास है लोग कहते हैं कि है लेकिन हमें तो यास है अब न वो आँखों में अश्क-ए-ख़ूँ न वो दिल में गुदाज़ अब न वो शाम-ए-तमन्ना है न वो सुब्ह-ए-नियाज़ ख़ुश्क हैं आँखें जबीनें तंग सीने सर्द हैं अब न वो दुखते हुए दिल हैं न चेहरे ज़र्द हैं आह की और दिल उमँड आया ये होता ही नहीं डूब कर ज़ौक़-ए-फ़ना में कोई रोता ही नहीं फूल दाग़ों से खिले थे जिस दिल-ए-सरशार में ख़ाक अब मुद्दत से उड़ती है उसी गुलज़ार में आँसुओं से नम जो रहता था वो दामाँ जल गया लहलहाता था जो सीने में गुलिस्ताँ जल गया रूह में बालीदगी की क़ुव्वतें मादूम हैं दोनों आँखें आँसुओं के फ़ैज़ से महरूम हैं पेच-ओ-ख़म से बहने वाला दिल का दरिया ख़ुश्क है वो भरी बरसात या'नी चश्म-ए-बीना ख़ुश्क है ख़ून है दिल में मगर पहली सी तुग़्यानी नहीं अब्र है बाद-ए-मुख़ालिफ़ से मगर पानी नहीं जब ये आलम है तो बारिश की शिकायत किस लिए बे-महल ये हसरत-ए-बारान-ए-रहमत किस लिए इक मुजस्सम ख़ुश्क-साली ख़ुद हमारी ज़ात है ज़िद हमारी हस्तियों की अब्र है बरसात है रहमतों से जोश में आने की ख़्वाहिश क्या करें ख़ुद सरापा क़हत हैं उम्मीद-ए-बारिश क्या करें
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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अब सबा कूचा-ए-जानाँ में गुज़रे है कि नहीं तुझ को इस फ़ित्ना-ए-आलम की ख़बर है कि नहीं बुझ गया मेहर का फ़ानूस कि रौशन है अभी अब उन आँखों में लगावट का असर है कि नहीं अब मेरे नाम का पढ़ता है वज़ीफ़ा कोई अब मिरा ज़िक्र-ए-वफ़ा दर्द-ए-सहर है कि नहीं अब भी तकती हैं मिरी राह वो काफ़िर आँखें अब भी दुज़्दीदा नज़र जानिब-ए-दर है कि नहीं छुप के रातों को मिरी याद में रोता है कोई मौजज़न आँख में अब ख़ून-ए-जिगर है कि नहीं हुस्न को पुर्सिश-ए-बीमार का है अब भी ख़याल मेहर की ज़र्रा ख़ाकी पे नज़र है कि नहीं बे-ख़बर मुझ को ज़माने से किया है जिस ने कुछ उसे मेरी तबाही की ख़बर है कि नहीं खाए जाता है मुझे दर्द-ए-ग़रीब-उल-वतनी दिल पर इस जान-ए-वतन के भी असर है कि नहीं 'जोश' ख़ामोश भी हो पूछ रहा है क्या क्या कुछ तुझे ताड़ने वालों की ख़बर है कि नहीं
Josh Malihabadi
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क्या हाल कहें उस मौसम का जब जिंस-ए-जवानी सस्ती थी जिस फूल को चूमो खुलता था जिस शय को देखो हँसती थी जीना सच्चा जीना था हस्ती ऐन हस्ती थी अफ़्साना जादू अफ़्सूँ था ग़फ़लत नींदें मस्ती थी उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी ग़फ़लत नींदें हस्ती थी आँखें क्या पैमाने थे हर रोज़ जवानी बिकती थी हर शाम-ओ-सहर बैआ'ने थे हर ख़ार में इक बुत-ख़ाना था हर फूल में सौ मय-ख़ाने थे काली काली ज़ुल्फ़ें थीं गोरे गोरे शाने थे उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी गोरे गोरे शाने थे हल्की-फुल्की बाँहें थीं हर-गाम पे ख़ल्वत-ख़ाने थे हर मोड़ पे इशरत-गाहें थीं तुग़्यान ख़ुशी के आँसू थे तकमील-ए-तरब की आहें थीं इश्वे चुहलें ग़म्ज़े थे पल्तीं ख़ुशियाँ चाहीं थीं उन बीते दिनों की बात है ये जब दिल की बस्ती बस्ती थी
Josh Malihabadi
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ज़ोफ़ से आँखों के नीचे तितलियाँ फिरती हुई औज-ए-ख़ुद्दारी से दिल पर बिजलियाँ गिरती हुई लाश काँधे पर ख़ुद अपने जज़्बा-ए-तकरीम की मुल्तजी चेहरे पे लहरें सी उम्मीद-ओ-बीम की इज़्ज़त-ए-अज्दाद के सर पर दमा-दम ठोकरें रिश्ता-ए-आवाज़ पर लफ़्ज़ों की पैहम ठोकरें चहरा-ए-अफ़्सुर्दा पर ठंडा पसीना शर्म का सुस्त नब्ज़ें भीक का लहजे के अंदर ठीकरा क़र्ज़ की दरख़्वास्त की उलझी हुई तक़रीर में कपकपी आसाब की बेचैन दिल की लरज़िशें इक तरफ़ हाजत की शिद्दत इक तरफ़ ग़ैरत का जोश नुत्क़ पर हर्फ़-ए-तमन्ना दिल में ग़ुस्से का ख़रोश जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ के ज़ेर-ए-साया नादारी की रात जौहर-ए-इंसानियत जोड़े हुए आँखों में हात साँस दहशत से ज़मीं की आसमाँ रोके हुए मुफ़लिसी मर्दाना लहजे की इनाँ रोके हुए लब पे ख़ुश्की रुख़ पे ज़र्दी आँख शरमाई हुई चश्म ओ अबरू में ख़ुदी की आग कजलाई हुई नफ़स में शे'राना तेवर आरज़ू रूबा-मिज़ाज एहतियाज ओ एहतियाज ओ एहतियाज ओ एहतियाज!
Josh Malihabadi
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ऐ शम-ए-'जोश' ओ मशअ'ल-ए-ऐवान-ए-आरज़ू ऐ मेहर-ए-नाज़ ओ माह-ए-शबिस्तान-ए-आरज़ू ऐ जान-ए-दर्द-मंदी ओ ईमान-ए-आरज़ू ऐ शम-ए-तूर ओ यूसुफ़-ए-कनआ'न-ए-आरज़ू ज़र्रे को आफ़्ताब तो काँटे को फूल कर ऐ रूह-ए-शे'र सज्दा-ए-शाइ'र क़ुबूल कर दरिया का मोड़ नग़्मा-ए-शीरीं का ज़ेर-ओ-बम चादर शब-ए-नुजूम की शबनम का रख़्त-ए-नम तितली का नाज़-ए-रक़्स ग़ज़ाला का हुस्न-ए-रम मोती की आब गुल की महक माह-ए-नौ का ख़म इन सब के इम्तिज़ाज से पैदा हुई है तू कितने हसीं उफ़ुक़ से हुवैदा हुई है तू होता है मह-वशों का वो आलम तिरे हुज़ूर जैसे चराग़-ए-मुर्दा सर-ए-बज़्म-ए-शम-ए-तूर आ कर तिरी जनाब में ऐ कार-साज़-ए-नूर पलकों में मुँह छुपाते हैं झेंपे हुए ग़ुरूर आती है एक लहर सी चेहरों पर आह की आँखों में छूट जाती हैं नब्ज़ें निगाह की रफ़्तार है कि चाँदनी रातों में मौज-ए-गंग या भैरवीं की पिछले पहर क़ल्ब में उमंग ये काकुलों की ताब है ये आरिज़ों का रंग जिस तरह झुट-पुटे में शब-ओ-रोज़ की तरंग रू-ए-मुबीं न गेसू-ए-सुम्बुल-क़वाम है वो बरहमन की सुब्ह ये साक़ी की शाम है आवाज़ में ये रस ये लताफ़त ये इज़्तिरार जैसे सुबुक महीन रवाँ रेशमी फुवार लहजे में ये खटक है कि है नेश्तर की धार और गिर रहा है धार से शबनम का आबशार चहकी जो तू चमन में हवाएँ महक गईं गुल-बर्ग-ए-तर से ओस की बूँदें टपक गईं जादू है तेरी सौत का गुल पर हज़ार पर जैसे नसीम-ए-सुब्ह की रौ जू-ए-बार पर नाख़ुन किसी निगार का चाँदी के तार पर मिज़राब-ए-अक्स-ए-क़ौस रग-ए-आबशार पर मौजें सबा की बाग़ पे सहबा छिड़क गईं जुम्बिश हुई लबों को तो कलियाँ चटक गईं चश्म-ए-सियाह में वो तलातुम है नूर का जैसे शराब-ए-नाब में जौहर सुरूर का या चहचहों के वक़्त तमव्वुज तुयूर का बाँधे हुए निशाना कोई जैसे दूर का हर मौज-ए-रंग-ए-क़ामत-ए-गुलरेज़ रम में है गोया शराब-ए-तुंद बिलोरीं क़लम में है तुझ से नज़र मिलाए ये किस की भला मजाल तेरे क़दम का नक़्श हसीनों के ख़द्द-ओ-ख़ाल अल्लाह रे तेरे हुस्न-ए-मलक-सोज़ का जलाल जब देखती हैं ख़ुल्द से हूरें तिरा जमाल परतव से तेरे चेहरा-ए-पर्वीं-सरिश्त के घबरा के बंद करती हैं ग़ुर्फ़े बहिश्त के चेहरे को रंग-ओ-नूर का तूफ़ाँ किए हुए शम-ओ-शराब-ओ-शे'र का उनवाँ किए हुए हर नक़्श-ए-पा को ताज-ए-गुलिस्ताँ किए हुए सौ तूर इक निगाह में पिन्हाँ किए हुए आती है तू चमन में जब इस तर्ज़-ओ-तौर से गुल देखते हैं बाग़ में बुलबुल को ग़ौर से मेरे बयाँ में सेहर-बयानी तुझी से है रू-ए-सुख़न पे ख़ून-ए-जवानी तुझी से है लफ़्ज़ों में रक़्स-ओ-रंग-ओ-रवानी तुझी से है फ़क़्र-ए-गदा में फ़र्र-ए-कियानी तुझी से है फ़िदवी के इस उरूज पे करती है ग़ौर क्या तेरी ही जूतियों का तसद्दुक़ है और क्या ऐ किर्दगार-ए-मा'नी ओ ख़ल्लाक़-ए-शेर-ए-तर ऐ जान-ए-ज़ौक़ ओ मुहसिना-ए-लैली-ए-हुनर खुल जाए गर ये बात कि उर्दू ज़बान पर तेरी निगाह-ए-नाज़ का एहसाँ है किस क़दर चारों तरफ़ से नारा-ए-सल्ले-अला उठे तेरे मुजस्समों से ज़मीं जगमगा उठे मेरे हुनर में सर्फ़ हुई है तिरी नज़र ख़ेमा है मेरे नाम का बाला-ए-बहर-ओ-बर शोहरत की बज़्म तुझ से मुनव्वर नहीं मगर फ़र्क़-ए-गदा पे ताज है सुल्ताँ बरहना-सर परवाने को वो कौन है जो मानता नहीं और शम्अ'' किस तरफ़ है कोई जानता नहीं दिल तेरी बज़्म-ए-नाज़ में जब से है बारयाब हर ख़ार एक गुल है तो हर ज़र्रा आफ़्ताब इक लश्कर-ए-नशात है हर ग़म के हम-रिकाब ज़ेर-ए-नगीं है आलम-ए-तमकीन-ओ-इज़तिराब बाद-ए-मुराद ओ चश्मक-ए-तूफ़ाँ लिए हुए हूँ बू-ए-ज़ुल्फ़-ओ-जुंबिश-ए-मिज़्गाँ लिए हुए तेरे लबों से चश्मा-ए-हैवाँ मिरा कलाम तेरी लटों से मौजा-ए-तूफ़ाँ मिरा कलाम तेरी नज़र से तूर-ब-दामाँ मिरा कलाम तेरे सुख़न से नग़्मा-ए-यज़्दाँ मिरा कलाम तू है पयाम-ए-आलम-ए-बाला मिरे लिए इक वही-ए-ज़ी-हयात है गोया मिरे लिए ऐ माह-ए-शेर-परवर ओ मेहर-ए-सुख़न-वरी ऐ आब-ओ-रंग-ए-'हाफ़िज़' ओ ऐ हुस्न-ए-'अनवरी' तू ने ही सब्त की है ब-सद नाज़-ए-दावरी मेरे सुख़न की पुश्त पे मोहर-ए-पयम्बरी तेरी शमीम-ए-ज़ुल्फ़ की दौलत लिए हुए मेरा नफ़स है बू-ए-रिसालत लिए हुए दुर-हा-ए-आब-दार ओ शरर-हा-ए-दिल-नशीं शब-हा-ए-तल्ख़-ओ-तुर्श ओ सहर-हा-ए-शक्करीं अक़्ल-ए-नशात-ख़ेज़ ओ जुनून-ए-ग़म-आफ़रीं दौलत वो कौन है जो मिरी जेब में नहीं टकराई जब भी मुझ से ख़जिल सरवरी हुई यूँँ है तिरे फ़क़ीर की झोली भरी हुई नग़्में पले हैं दौलत-ए-गुफ़्तार से तिरी पाया है नुत्क़ चश्म-ए-सुख़न-बार से तिरी ताक़त है दिल में नर्गिस-ए-बीमार से तिरी क्या क्या मिला है 'जोश' को सरकार से तिरी बाँके ख़याल हैं ख़म-ए-गर्दन लिए हुए हर शे'र की कलाई है कंगन लिए हुए ऐ लैली-ए-नहुफ़्ता ओ ऐ हुस्न-ए-शर्मगीं तुझ पर निसार दौलत-ए-दुनिया मता-ए-दीं मंसूब मुझ से है जो ब-अंदाज़-ए-दिल-नशीं तेरी वो शाइ'री है मिरी शाइ'री नहीं आवाज़ा चर्ख़ पर है जो इस दर्द-मंद का गोया वो अक्स है तिरे क़द्द-ए-बुलंद का मेरे बयाँ में ये जो वफ़ूर-ए-सुरूर है ताक़-ए-सुख़न-वरी में जो ये शम-ए-तूर है ये जो मिरे चराग़ की ज़ौ दूर दूर है सरकार ही की मौज-ए-तबस्सुम का नूर है शे'रों में करवटें ये नहीं सोज़-ओ-साज़ की लहरें हैं ये हुज़ूर की ज़ुल्फ़-ए-दराज़ की मुझ रिंद-ए-हुस्न-कार की मय-ख़्वारियाँ न पूछ इस ख़्वाब-ए-जाँ-फ़रोज़ की बेदारियाँ न पूछ करती है क्यूँँ शराब ख़िरद-बारियाँ न पूछ बे-होशियों में क्यूँँ है ये हुश्यारियाँ न पूछ पीता हूँ वो जो ज़ुल्फ़ की रंगीं घटाओं में खिंचती है उन घनी हुई पलकों की छाँव में हुश्यार इस लिए हूँ कि मय-ख़्वार हूँ तिरा सय्याद-ए-शे'र हूँ कि गिरफ़्तार हूँ तिरा लहजा मलीह है कि नमक-ख़्वार हूँ तिरा सह्हत ज़बान में है कि बीमार हूँ तिरा तेरे करम से शेर-ओ-अदब का इमाम हूँ शाहों पे ख़ंदा-ज़न हूँ कि तेरा ग़ुलाम हूँ मैं वो हूँ जिस के ग़म ने तिरे दिल में राह की इक उम्र जिस के इश्क़ में ख़ुद तू ने आह की सोया है शौक़ सेज पे तेरी निगाह की रातें कटी हैं साए में चश्म-ए-सियाह की क्यूँँ कर न शाख़-ए-गुल की लचक हो बयान में तेरी कमर का लोच है मेरी ज़बान में तर्शे हुए लबों के बहकते ख़िताब से ज़रतार काकुलों के महकते सहाब से सरशार अँखड़ियों के दहकते शबाब से मौज-ए-नफ़स के इत्र से मुखड़े की आब से बारह बरस तपा के ज़माना सुहाग का सींचा है तू ने बाग़ मिरे दिल की आग का गर्मी से जिस की बर्फ़ का देवता डरे वो आग शो'लों में ओस को जो मुबद्दल करे वो आग लौ से जो ज़महरीर का दामन भरे वो आग हद है जो नाम नार-ए-सक़र पर धरे वो आग जिस की लपट गले में जलाती है राग को पाला है क़ल्ब-ए-नाज़ में तू ने उस आग को
Josh Malihabadi
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अलस्सबाह कि थी काएनात सर-ब-सुजूद फ़लक पे शोर-ए-अज़ाँ था ज़मीं पे बाँग-ए-दुरूद बहार शबनम-आसूदा थी कि रूह-ए-ख़लील फ़रोग़-ए-लाला-ओ-गुल था कि आतिश-ए-नमरूद जला रही थी हवा बज़्म-ए-जाँ में शम-ए-तरब मिटा रही थी सबा लौह-ए-दिल से नक़्श-ए-जुमूद गुलों के रंग में थी शान-ए-ख़ंदा-ए-यूसुफ़ कली के साज़ में था लुत्फ़-ए-नग़्मा-ए-दाऊद हर इक जबीं पे दरख़्शाँ था नय्यर-ए-इक़बाल हर एक फ़र्क़ पे ताबाँ था ताला-ए-मसऊद फ़ज़ा-ए-चर्ख़ में दौड़ी हुई थी रूह-ए-ज़ुहूर बिसात-ए-ख़ाक पे छाया हुआ था रंग-ए-नुमूद हसीन ख़्वाब से चौंके थे रसमसाए हुए मचल रही थी हवाओं में बू-ए-अम्बर-ओ-बूद ये रंग देख कर आया मुझे ख़याल-ए-नमाज़ मिरी नमाज़ कि है शाहिद-ओ-शराब-ओ-सुरूद मिरी नमाज़ कि है नग़मा-ए-हुवल-बाक़ी मिरी नमाज़ कि है नारा-ए-हुवल-मौजूद मिरी नमाज़ कि है इश्क़-ए-नाज़िर-ओ-मंज़ूर मिरी नमाज़ कि है हुब्ब-ए-शाहिद-ओ-मशहूद मिरी नमाज़ कि है एक साज़-ए-ला-फ़ानी मरी नमाज़ कि है एक सोज़-ए-ला-महदूद मिरी नमाज़ कि है दीद रू-ए-नाशुस्ता मिरी नमाज़ कि है तौफ़-ए-हुस्न-ए-ख़्वाब-आलूद मिरी नमाज़ ''नज़र'' शैख़ की नमाज़ ''अल्फ़ाज़'' यहाँ चराग़ वहाँ सिर्फ़ शम-ए-कुश्ता का दूद यहाँ है रिश्ता-ए-अन्फ़ास में तरन्नुम-ए-दोस्त यहाँ लताफ़त-ए-एहसास से ज़ियाँ है न सूद फ़ुग़ाँ कि ''जुम्बिश-ए-आज़ा'' वहाँ असास-ए-नमाज़ ख़ोशा कि लर्ज़िश-ए-दिल है यहाँ क़याम ओ क़ूऊद किसी मक़ाम पे हासिल नहीं क़रार मुझे सहर को हूँ जो बरहमन तो शाम को महमूद ग़रज़ कि आते ही वक़्त-ए-सहर ख़याल-ए-नमाज़ जबीं थी पा-ए-सनम पर ज़बाँ पे ''या-माबूद!'' तमाम राज़-ए-निहाँ खुल गए मिरे दिल पर ज़े-तकिया-गाह-ए-अदम ता-ब-कारगाह-ए-वजूद सर-ए-नियाज़ से ज़ाहिर हुआ तबस्सुम-ए-नाज़ बुतून-ए-ख़ाक से पैदा हुआ दुर-ए-मक़सूद उठा के फिर सर-ए-पुर-शौक़ पा-ए-जानाँ से कहा ये मैं ने कि ऐ सर्व-ए-बोस्वतान-ए-जूद बिया बिया कि तिरा तंग दर कनार कुशेम ज़े-बोसा-मेहर-कुनम बर-लब-ए-शकर-आलूद मिरे लबों को भी दे रुख़्सत-ए-तराना-ए-हम्द हर एक ज़र्रा है इस वक़्त आशना-ए-दुरूद ये सुन के शर्म से कोई जवाब बन न पड़ा झुकी निगाह-ए-जबीं हो गई अरक़-आलूद हया ने बढ़ के पुकारा ये ''काहिशें बे-कार'' नज़र ने झुक के सदा दी ये ''काविशें बे-सूद'' ''दहान-ए-यार कि दरमान-ए-दर्द-ए-'हाफ़िज़' दाश्त फ़ुग़ाँ कि वक़्त-ए-मुरव्वत चे तंग हौसला बूद''
Josh Malihabadi
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