"लम्स-ए-आफ़रीन" नुकूश-ए-दिल भी मिट गए ख़याल-ए-जाँ भी अब नहीं जुदाइयों के मरहले जहाँ में बे-सबब नहीं अजीब रुत का हिज्र है हमारे लाशऊर को बस इक तुम्हारी फ़िक्र है तुम्हारी फ़िक्र के तमाम दाएरों की वुसअतों से मैं ही बाख़बर रहा ज़ेर-ए-तेग़-ए-सर रहा हिज्र में भी डर रहा शब-ए-फ़िराक़ में विसाल के गिलास भर रहा नहीं है तू क़रीं मेरे मगर ऐ हम नशीं मेरे मैं घुप अँधेरी रात की तीरगी में जागकर रौशनी के लिए तुझे ही याद कर रहा ऐ मेरी रतजगों में नींद के वजूद को शिकस्त देने वाली गुफ़्तगू के पैरहन अज़ीज़-ए-मन थकन शिकन पलट के आ रुकी हुई हयात को लम्स-ए-आफ़रीन के रिमोट से रिज़्यूम कर
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है
ZafarAli Memon
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"सख़्त लम्हें" वक़्त थोड़ा मुश्किल है रात थोड़ी भारी है आँख के कटोरे से अश्कबारी जारी है वस्ल की उम्मीदों पर बेबसी के साए हैं गुलशनों की राहों पर नाचती ख़िज़ाएँ है ये जो सख़्त लम्हें हैं ये जो स्याह मंज़र है इस के ख़त्म होने का वक़्त एक मुक़र्रर है वक़्त के थपेड़ों का सामना किया जाए अब हुसूल-ए-मक़सद का हौसला किया जाए क़ब्ल अपने मरने से थोड़ा जी लिया जाए
Salman Yusuf
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"एक लम्हा" सारी दुनिया जिसे दिन समझ कर कारख़ानों की जानिब चली जा रही है इस को क्या ही ख़बर है कि चेहरे पे इस के वक़्त के हाथों कालिख़ मली जा रही है किस को मअ'लूम है हम जिसे दिन समझते हैं वो रात हो मैं तो सूरज के उगने को, दुनिया के उठने को गाड़ियों के हार्न से होने वाले शोर और शराबे को इस जहाँ के ख़राबे को रात गरदान्ता हूँ और वो लम्हा कि जब चाँद की परत पर एक चेहरा नमूदार हो जाता है होश खो जाता है मैं उसी एक लम्हे को दिन मानता हूँ
Salman Yusuf
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"इक आस" उम्मीदें सिसकियाँ लेती हैं दिल के गहरे कोने में तसल्ली धड़कनें देती हैं नाज़ुक हाथ की मानिंद पलक पर अश्क के मेले यहाँ हर रोज़ लगते हैं लबों पर प्यास की शम्में यहाँ हर शाम जलती हैं मुसलसल दर्द बहता है तो पलकें भीग जाती हैं हुजूम-ए-आदमीयत में फ़क़त मैं ही हूँ तन्हा सा कटे से पैरहन पर कुछ पुराने छींट के धब्बे यही पैग़ाम देते हैं मुझे दुनिया से नफ़रत है मैं एक बोसीदा सी टूटी हुई दीवार के भीतर ख़ुद अपने आप के साए से यूँँ ही लिपटा रहता हूँ हक़ीक़त में मैं ख़ुद इक लाश की मानिंद हूँ लेकिन अभी कुछ साँस बाक़ी हैं अभी इक आस बाक़ी है कि तुम फिर लौट आओगे कि तुम फिर लौट आओगे
Salman Yusuf
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"अपनी कहानी" मैं अपनी कहानी क़लमबंद करने की कोशिश तो करता रहा हूँ मगर मेरा माज़ी तो नाकामियों के अँधेरों से उजड़ा हुआ है नहीं याद मुझ को कि उम्र-ए-गुज़िश्ता के इक मरहले में हयात-ए-रवां से रक़ीब-ए-अमाँ से भी वहम-ओ-गुमाँ में कभी जीत पाया मैं लिखने को लिख दूँ कि मैं ने ज़माने से जो कुछ भी चाहा नहीं मिल सका कँवल मेरे ख़्वाबों का हक़ीक़त की बंजर ज़मीनो पे हरगिज़ नहीं खिल सका मैं लड़ता रहा पर हमेशा कि मैं ने कभी भी सर-ए-तस्लीम-ए-ख़म ना किया मैं टूटा मैं बिखरा मैं हारा मगर हौसला फिर भी कम ना किया मैं फिर से चला हूँ सवा लाख कोशिश को एक रंग देने मैं लिखने को लिख दूँ मगर ये कहानी भी पढ़नी है किस ने सभी को तो दुनिया में सक्सेस का नुस्ख़ा ही लाहक रहा है जो हारा नालायक़ जो जीता हमेशा वही तो ज़माने की असली कसौटी पे लायक़ रहा है मेरे फ़ेलियर के तजरबात मुझ को बताने लगे हैं कि मेरी कहानी अधूरी है अबतक इसे दरकिनार है सक्सेस की दस्तक वो सक्सेस जो बहरो के कानों में चीख़े चिल्लाए उन्हे ये बताए कि चलने से पहले कई मर्तबा तुम को गिरना पड़ेगा
Salman Yusuf
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लिखना ज़रूरी है लिखो लिखना ज़रूरी है मगर लिखने से पहले ये अख़ज़ कर लो कि क्या लिखना ज़रूरी है वही जो कुछ तुम्हारे दरमियाँ में घट रहा है मुहब्बत का गला क्यूँँ कट रहा है समाज बँट रहा है अख़ुव्वत आजिज़ी और इंकिसारी स भरा बादल फ़ज़ा में नफ़रतों की घुल रहा है छँट रहा है मुहाफ़िज़ इस्मतों के इस्मतों का क़त्ल करते हैं अमीर-ए-शहर ग़रीबों के लहू से पेट भरते हैं लिखो लिखना ज़रूरी है लिखो अब बे-हयाई ने फ़्रीडम नाम रखा है जो ज़िल्लत ख़त्म होनी थी उसी को थाम रखा है हमारे मुंसिफ़ों ने ही हमारे सर हमारे क़त्ल का इल्ज़ाम रखा है सभी तो सर-ब-सज्दा हैं फुहश तहज़ीब के आगे सभी तो ज़ुल्म की ताईद में परचम उठाए हैं मगर कुछ हैं अभी जो कुव्वत-ए-इज़हार रखते हैं वो लहजा तीर रखते हैं ज़बाँ तलवार रखते हैं हमेशा ज़ुल्म की गर्दन पे आहनी वार करते हैं यज़ीद-ए-वक़्त की ताईद से इनकार करते हैं अभी कुछ लोग ज़िंदा हैं लिखो लिखना ज़रूरी है!
Salman Yusuf
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