nazmKuch Alfaaz

"लिमिट" कोई आबाद सितारे की कोई हद हो तो वो सितारा किसी तस्वीर में होगा आसमाँ में नहीं हो सकता और उस आसमाँ का कोई भी फ़्रेम नहीं होता होगा भी कैसे? उस के पेंटर ने उसे ऐसे बनाया है जैसे कमरे की कोई छत है जिस पे तारों के डिज़ाइन बने है और वो सारे डिज़ाइन शाम के बा'द नज़र आते है जिन को सब तोड़ने की क़स में भी खाते हैं और वो सारी की सारी क़स में झूठी हैं क्या कोई फूलों के रंगों को मिटा पाया है क्या किसी ख़्वाब ने सच दिखाया है या किसी बे-वफ़ा ने सच्ची मोहब्बत की हो या गुलाबों ने भी इज़हार किया हो आदमी, आदमी से प्यार किया हो या कभी पानी को पानी में डूबते देखा हो और तब पानी में उस सितारे की सभी रातों की हद क्या है? तुम बताओ मिरी इन बातों की हद क्या है? या मिरी बातें भी उन सितारों की तरह ही किसी फ़्रेम का हिस्सा है?

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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"यार" यार था मैं तुम्हारा या महज़ कोई सीढ़ी मंज़िल तक पहूँच गए, पीछे देखा तक नहीं जो सीख किसी ने नहीं वो सीख पेड़ों ने दी छाओं लेते रहे मगर तुम्हारी आरी रुकी नहीं बचपन में खेला करते साथ हम साँप सीढ़ी उतरा ये ज़िंदगी में कब, भनक तक लगी नहीं सपने भी साथ बुने थे बहुत उमीदें भी थी कई बादलों की सैर पर निकल गए तुम, पर मैं नहीं अगर रुकसत की होती ख़बर ज़रा सी भी तब माँ से दो रोटी ज़्यादा, बनवाता नहीं ‘अर्पित’ मैं ने घूम फिर कर यही बात है मानी कई मिलेंगे इन के जैसे, ये ज़ालिम अकेले नहीं

Arpit Sharma

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"जंगल" रोज़ शाम आती है और वो बताती है पहले सब मुकम्मल था ये उजाड़ जंगल था जो तमाम पत्थर हैं शोर के वो मंज़र हैं शोर भी मशीनों का पेड़ों का ज़मीनों का और हसरतों का था शोर नफ़रतों का था जो उठा था ग़ारों से उजड़े इन दयारों से एक शोर पल पल था ये उजाड़ जंगल था

Ajay Kumar

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"तुम्हारी याद आती है मुझे" तुम्हारी याद आती है मुझे हर रोज़ हर पल में नया आगाज़ करने में पुराने ख़त जलाने में नए अश'आर कहने में कोई क़िस्सा सुनाने में तुम्हारी याद आती है मुझे किसी के छोड़ जाने से किसी से दिल लगाने में किसी के रूठ जाने से किसी को अब मनाने में तुम्हारी याद आती है मुझे कोई लम्बा सफ़र हो तो किसी को साथ लाने में कोई घर लौट आए तो गले उस को लगाने में तुम्हारी याद आती है मुझे

Ajay Kumar

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"लिस्नर" कभी ख़ामोश रह कर देखना इस ज़िंदगी को तुम तुम्हें औरों के होंटों पर कई रंगों के अफ़्साने मिलेंगे जो सह में सह में से कुछ कहना चाहेंगे मगर तुम बोलना मत उन्हें सुनने की कोशिश करना हो सकता है तुम्हारा बात करने को जी चाहे हो सकता है कि इतनी देर चुप रहने से तुम्हें तो उल्टियाँ होने लगे मगर तुम बे-क़रारी को सँभाले हुए रंगों की ख़ुशबू ओढ़ लेना और उसी दुनिया में खो कर अपना मन आबाद कर लेना ये ख़ामोशी तुम्हारे सामने कई तन्हा से लफ़्ज़ों की रिहाई के दरीचे खोल देगी तुम्हारे पेट की सब तितलियाँ भी उन्हीं बातों को दुनिया मान लेगी जो भी उस कैनवस का हिस्सा होंगी वहाँ से सारे सन्नाटे रवाँ हो कर नए रस्ते की जानिब चल पड़ेंगे जहाँ कोई सियाही से तुम्हारी ज़िंदगी के रंगों को नए आयाम दे कर छोड़ देगा जहाँ उन रंगों की सब परतें खुल जाएँगी वहीं पर उन के होंटों की सहेली सैंकड़ों इशारे कर रही होंगी जहाँ से उस कहानी के सभी किरदार अपनी अदाकारी से बाक़ी सीन को पूरा करेंगे ये सारी बातें तो होती रही हैं सालों से मगर इस बार की सतरें भी धीमी करवटें ले कर तुम्हारे मन पटल पर नया ख़ाका बना कर छोड़ देगी जो शायद यूँँ नहीं था पहले!

Ajay Kumar

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