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मैं कैसे भूलूँ वो रातें एक रस्ता चाँद बनाता था जो ख़्वाबों तक ले जाता था हम घंटों करते थे बातें मैं कैसे भूलूँ वो रातें नन्हे तारों के साथ कभी जब आँख-मिचौली करते थे कुछ हँसते थे कुछ चिढ़ते थे कुछ बातें भोली करते थे देखीं थीं हम ने साथ कई नन्हे तारों की बारातें मैं कैसे भूलूँ वो रातें

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था

Jaun Elia

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

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अरे आओ बे-फ़िक्र हो के आओ मेरी ज़िंदगी में घबराओ नहीं कोई टूट-फूट नहीं होगी तुम से आओ तो दर-अस्ल यहाँ कुछ बाक़ी ही नहीं टूटने को हाँ कुछ पुराने ख़्वाबों की किर्चें हैं तुम्हारे आने तक साफ़ हो जाएँगी उस के बा'द जो होगा सब तुम्हारा ही होगा जाते वक़्त जो कुछ सलामत बचे ले जाना ख़्वाबों की किर्चें गर रह गईं तुम्हारे बा'द तो समेट के रख देना मेरे होंठों पे मुस्कुराहटों में बाँध के

Geetanjali Rai

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मेरे लिए तुम्हारा प्यार बिल्कुल वैसा था जैसे चाय के आख़िरी घूँट में दूसरे कप की तलब दूसरा कप जिस की क़िस्मत में अक्सर लिखा होता है मेज़ के किनारे पड़े पड़े ठंडा होना ख़ैर यही फ़र्क़ है इंसान और चाय में कि इंसान को पहली मोहब्बत में ही दूसरे कप वाली बे-रुख़ी मिल जाती कभी

Geetanjali Rai

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मैं ने पूछा था सितारों से और उस पीले गुलाब की पंखुड़ियों से भी उन का सब का मानना था कि वो हवा का झोंका सच कह रहा था कि तुम आओगे फिर मैं ने बाक़ी सब से भी पूछा वो नीम का दरख़्त उस में रहने वाली वो चिड़िया उस के साथ खेलने वाली नर्म धूप और टहनियों में छुपने वाला चाँद एक एक कर सब से बात की मैं ने और सब कहते हैं तुम आओगे सिवाए तुम्हारे

Geetanjali Rai

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सुब्हों जैसे लोग बहुत अच्छे लगते हैं ना लगता है कि बहुत अलग हैं बाक़ी लोगों से लेकिन उम्मीदों के बाइ'से वो लोग भी अक्सर एक अर्से बा'द किसी आम दिन की तरह ढल के ना-उम्मीदी की लंबी रात बन जाते हैं इन से बेहतर तो वो लोग होते हैं जो ख़ामोश शामों की तरह उम्मीदें नहीं मगर सुकून ज़रूर देते हैं तुम आए तो थे एक ख़ामोश शाम की तरह लेकिन उस रात के बा'द मैं ने तुम में एक सुब्ह देखनी शुरूअ' कर दी थी जाने क्यूँँ शायद आज भी तुम एक ख़ामोश शाम ही हो ये तो मैं हूँ जो तुम में अपनी सुब्ह ढूँढ़ने की नाकाम कोशिश में है क्यूँँकि सुब्हों जैसे लोग बहुत अच्छे लगते हैं ना

Geetanjali Rai

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क्या हर मौत के लिए ज़रूरी होती हैं रुकी हुई साँसें पथराई आँखें चार कंधे और घर से शमशान तक की आख़िरी दुनिया-दारी कभी कभी मौत की निशानी होतीं है उम्र से ज़्यादा समझदारी वाली बातें हमेशा हँसने वाले चेहरे और कभी ना लड़ने वाली मोहब्बतें

Geetanjali Rai

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