nazmKuch Alfaaz

रात उस को ख़्वाब में देख कर मैं ने कुछ नहीं कहा चार साल की थकन जवाँ हुई तिश्नगी बढ़ के बे-कराँ हुई हाँ मगर जब आँसुओं की नर्म गर्म ताज़गी आस-पास दिलकशी बिखर गई और एक साया सा सिरहाने आ के थम गया मैं ने ये कहा कि ऐ मिरे ख़ुदा तू बड़ा रहीम है उस का दिल दो नीम है उस के रंग उस के हुस्न को निखार दे उस के दिल का बोझ उतार दे तू उसे सुकून दे मुझे जुनून दे उस के दुख उस के दर्द छीन ले उस के रोग मुझ को दे मैं गुनाहगार हूँ रात उस को ख़्वाब में देख कर चार साल जैसे फिर उसी तरह गुज़र गए चार साल किस तरह गुज़र गए दिल ये सोचता रहा मैं ने कुछ नहीं कहा

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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किसी हँसती बोलती जीती-जागती चीज़ पर ये घमंड क्या ये गुमान क्यूँँ कहीं और आप की जान क्यूँँ ये तो सिलसिले हैं उसी फ़रेब-ए-ख़याल के ग़म ज़ात-ओ-ख़ैर-ओ-जमाल के वही फेर अहल-ए-सवाल के अजी ठीक है ये वफ़ा का ज़हर न घोलिए अरे आप झूट ही बोलिए नहीं सब के भेद न खोलिए कोई क्या करे न मिलें जो रंग ही रंग से डरो अपने जी की उमंग से कटे क्यूँँ निगाह पतंग से कभी बेकसी को पुकारते हैं शजर हजर मिरे पास कुछ भी नहीं मगर बड़ी ज़िंदगी है इधर-उधर ये सँभलते हाथों मैं काँपती है कमान क्यूँँ ये सरक रही है मचान क्यूँँ ये खिसक रहे हैं मकान क्यूँँ

Mahboob Khizan

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ज़िंदगी को देखा है ज़िंदगी से भागे हैं रौशनी के आँचल में तीरगी के धागे हैं तीरगी के धागों में ख़ून की रवानी है दर्द है मोहब्बत है हुस्न है जवानी है हर तरफ़ वही अंधा खेल है अनासिर का तैरता चले साहिल डूबता चले दरिया चाँद हो तो काकुल की लहर और चढ़ती है रात और घटती है बात और बढ़ती है ये कशिश मगर क्या है रेशमी लकीरों में शाम कैसे होती है नाचते जज़ीरों में हर क़दम नई उलझन सौ तरह की ज़ंजीरें फ़लसफ़ों के वीराने दूसरों की जागीरें आँधियाँ उजालों की घन-गरज सियासत की काँपते हैं सय्यारे रात है क़यामत की जंग से जले दुनिया चाँद को चले पागल आँख पर गिरे बिजली कान में पड़े काजल दौर है परिंदों का छेड़ है सितारों से काएनात आजिज़ है हम गुनाहगारों से

Mahboob Khizan

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मैं सोचता हूँ कि इस ख़ैर-ओ-शर के बा'द है क्या फ़ज़ा तमाम नज़र है नज़र के बा'द है क्या शब इंतिज़ार-ए-सहर है सहर के बा'द है क्या दुआ बरा-ए-असर है असर के बा'द है क्या ये रहगुज़र है तो इस रहगुज़र के बा'द है क्या

Mahboob Khizan

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बे-कस चमेली फूले अकेली आहें भरे दिल-जली भूरी पहाड़ी ख़ाकी फ़सीलें धानी कभी साँवली जंगल में रस्ते रस्तों में पत्थर पत्थर पे नीलम-परी लहरीली सड़कें चलते मनाज़िर बिखरी हुई ज़िंदगी बादल चटानें मख़मल के पर्दे पर्दों पे लहरें पड़ीं काकुल पे काकुल ख़ेमों पे ख़े में सिलवट पे सिलवट हरी बस्ती में गंदी गलियों के ज़ीने लड़के धमा-चौकड़ी बरसे तो छागल ठहरे तो हलचल राहों में इक खलबली गिरते घरौंदे उठती उमंगें हाथों में गागर भरी कानों में बाले चाँदी के हाले पलकें घनी खुरदुरी हड्डी पे चेहरे चेहरों पे आँखें आई जवानी चली टीलों पे जौबन रेवड़ के रेवड़ खेतों पे झालर चढ़ी वादी में भीगे रोड़ों की पेटी चश्मों की चंपाकली साँचे नए और बातें पुरानी मिट्टी की जादूगरी

Mahboob Khizan

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वक़्त की बात है हर ग़ुंचा-ए-सर-बस्ता मगर वक़्त क्या चीज़ है पैमाना-ए-बे-साख़्ता है ये शब-ओ-रोज़ जवानी ये मह-ओ-साल रवाँ रूह क्यूँँ जिस्म के आगे सिपर-अंदाख़्ता है शाख़ दर शाख़ नज़र आती है जीने की उमंग चोर की तरह सरकती है रगों में कोई आग सोचने के लिए शायद ये मह-ओ-साल नहीं ऐ मिरे दीदा-ए-बे-ख़्वाब मोहब्बत से न भाग हुस्न की आग ग़नीमत है कि इस से पहले रग-ए-अय्याम थी इक जू-ए-फ़सुर्दा सर-ए-शाम सब इसी आग का ईंधन हैं गुज़रने वाले एक ही लर्ज़िश-ए-सद-ए-रंग का परतव है तमाम

Mahboob Khizan

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