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मैं सोचता हूँ कि इस ख़ैर-ओ-शर के बा'द है क्या फ़ज़ा तमाम नज़र है नज़र के बा'द है क्या शब इंतिज़ार-ए-सहर है सहर के बा'द है क्या दुआ बरा-ए-असर है असर के बा'द है क्या ये रहगुज़र है तो इस रहगुज़र के बा'द है क्या

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम" मेरी शोहरत मेरा डंका मेरे ए'जाज़ का सुन कर कभी ये न समझ लेना मैं चोटी का लिखारी हूँ मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं छोटा सा ब्योपारी हूँ मेरी आरत पे बरसों से जो महँगे दाम बिकता है वो तेरे ग़म का सौदा है तेरी आँखें तेरे आँसू तेरी चाहत तेरे जज़्बे यहाँ सेल्फों पे रखे हैं वही तो मैं ने बेचे हैं तुम्हारी बात छिड़ जाए तो बातें बेच देता हूँ ज़रूरत कुछ ज़ियादा हो तो यादें बेच देता हूँ तुम्हारे नाम के सदके बहुत पैसा कमाया है नई गाड़ी ख़रीदी है नया बँगला बनाया है मगर क्यूँँ मुझ को लगता है मेरे अंदर का ब्योपारी तुम्हीं को बेच आया है मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम

Khalil Ur Rehman Qamar

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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पानी कौन पकड़ सकता है जब वो इस दुनिया के शोर और ख़मोशी से क़त'अ-तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरे की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिसे सिर्फ़ दहकने से मतलब है, वो इक ऐसा फूल है जिस पर अपनी ख़ुशबू बोझ बनी है, वो इक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है, उस को छूने की ख़्वाइश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाकिफ़ है बल्कि हर इक रंग के शजरे तक से वाकिफ़ है, उस को इल्म है किन ख़्वाबों से आँखें नीली पढ़ सकती हैं, हम ने जिन को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी-कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खींचती है सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है, सिर्फ़ उसी के हाथों से सारी दुनिया तरतीब में आ सकती है, हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाइश में ज़िंदा है लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ है, हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की किस्मत में वो जिस्म कहाँ है मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है, उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कॉलेज आ जाती है

Tehzeeb Hafi

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किसी हँसती बोलती जीती-जागती चीज़ पर ये घमंड क्या ये गुमान क्यूँँ कहीं और आप की जान क्यूँँ ये तो सिलसिले हैं उसी फ़रेब-ए-ख़याल के ग़म ज़ात-ओ-ख़ैर-ओ-जमाल के वही फेर अहल-ए-सवाल के अजी ठीक है ये वफ़ा का ज़हर न घोलिए अरे आप झूट ही बोलिए नहीं सब के भेद न खोलिए कोई क्या करे न मिलें जो रंग ही रंग से डरो अपने जी की उमंग से कटे क्यूँँ निगाह पतंग से कभी बेकसी को पुकारते हैं शजर हजर मिरे पास कुछ भी नहीं मगर बड़ी ज़िंदगी है इधर-उधर ये सँभलते हाथों मैं काँपती है कमान क्यूँँ ये सरक रही है मचान क्यूँँ ये खिसक रहे हैं मकान क्यूँँ

Mahboob Khizan

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रात उस को ख़्वाब में देख कर मैं ने कुछ नहीं कहा चार साल की थकन जवाँ हुई तिश्नगी बढ़ के बे-कराँ हुई हाँ मगर जब आँसुओं की नर्म गर्म ताज़गी आस-पास दिलकशी बिखर गई और एक साया सा सिरहाने आ के थम गया मैं ने ये कहा कि ऐ मिरे ख़ुदा तू बड़ा रहीम है उस का दिल दो नीम है उस के रंग उस के हुस्न को निखार दे उस के दिल का बोझ उतार दे तू उसे सुकून दे मुझे जुनून दे उस के दुख उस के दर्द छीन ले उस के रोग मुझ को दे मैं गुनाहगार हूँ रात उस को ख़्वाब में देख कर चार साल जैसे फिर उसी तरह गुज़र गए चार साल किस तरह गुज़र गए दिल ये सोचता रहा मैं ने कुछ नहीं कहा

Mahboob Khizan

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ज़िंदगी को देखा है ज़िंदगी से भागे हैं रौशनी के आँचल में तीरगी के धागे हैं तीरगी के धागों में ख़ून की रवानी है दर्द है मोहब्बत है हुस्न है जवानी है हर तरफ़ वही अंधा खेल है अनासिर का तैरता चले साहिल डूबता चले दरिया चाँद हो तो काकुल की लहर और चढ़ती है रात और घटती है बात और बढ़ती है ये कशिश मगर क्या है रेशमी लकीरों में शाम कैसे होती है नाचते जज़ीरों में हर क़दम नई उलझन सौ तरह की ज़ंजीरें फ़लसफ़ों के वीराने दूसरों की जागीरें आँधियाँ उजालों की घन-गरज सियासत की काँपते हैं सय्यारे रात है क़यामत की जंग से जले दुनिया चाँद को चले पागल आँख पर गिरे बिजली कान में पड़े काजल दौर है परिंदों का छेड़ है सितारों से काएनात आजिज़ है हम गुनाहगारों से

Mahboob Khizan

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वक़्त की बात है हर ग़ुंचा-ए-सर-बस्ता मगर वक़्त क्या चीज़ है पैमाना-ए-बे-साख़्ता है ये शब-ओ-रोज़ जवानी ये मह-ओ-साल रवाँ रूह क्यूँँ जिस्म के आगे सिपर-अंदाख़्ता है शाख़ दर शाख़ नज़र आती है जीने की उमंग चोर की तरह सरकती है रगों में कोई आग सोचने के लिए शायद ये मह-ओ-साल नहीं ऐ मिरे दीदा-ए-बे-ख़्वाब मोहब्बत से न भाग हुस्न की आग ग़नीमत है कि इस से पहले रग-ए-अय्याम थी इक जू-ए-फ़सुर्दा सर-ए-शाम सब इसी आग का ईंधन हैं गुज़रने वाले एक ही लर्ज़िश-ए-सद-ए-रंग का परतव है तमाम

Mahboob Khizan

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वो हसीन थी मह-ए-जबीन थी बे-गुमान थी बे-यक़ीन थी ज़िंदगी की नरम नरम आहटें बे-सबब यूँँही मुस्कुराहटें उँगलियों में बाल को लपेटना दामन-ए-ख़याल को लपेटना हर घड़ी वही मिलने वालियाँ बे-ख़यालियां ख़ुश-ख़यालियां नर्म उलझनें कम-सिनी के ख़्वाब अंग अंग में छेड़ा इंक़लाब मुँह पर ओढ़नी जी कभी नहीं मैं तो आप से बोलती नहीं और फिर हया ज़िंदगी की मार मा'रिफ़त का बोझ जब्र-ओ-इख़्तियार एक जान और सैंकड़ों वबाल जिस्म की दुखन रूह का ख़याल ज़िंदगी बढ़ी रौशनी लिए रौशनी बढ़ी तीरगी लिए इंकिसार में इक ग़ुरूर सा कुछ ख़ुमार सा कुछ सुरूर सा दाएरे यहाँ दाएरे वहाँ रक़्स में नज़र रक़्स में जहाँ गुफ़्तुगू में बल ख़ामुशी में लोच रात करवटें करवटों में सोच दिल बुझा बुझा तिश्नगी की आँच अजनबी थकन ज़िंदगी की आँच उस के काम आएँ उस का दुख बटाएँ उस को छेड़ दें और मुस्कुराएँ उस की आँख में कितना दर्द है रंग ज़र्द है रूह ज़र्द है वो उदास है क्यूँँ उदास है उस की ज़िंदगी किस के पास है ये गुनाह क्यूँँ भूल क्यूँँ नहीं बाग़ में तमाम फूल क्यूँँ नहीं

Mahboob Khizan

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