वो हसीन थी मह-ए-जबीन थी बे-गुमान थी बे-यक़ीन थी ज़िंदगी की नरम नरम आहटें बे-सबब यूँँही मुस्कुराहटें उँगलियों में बाल को लपेटना दामन-ए-ख़याल को लपेटना हर घड़ी वही मिलने वालियाँ बे-ख़यालियां ख़ुश-ख़यालियां नर्म उलझनें कम-सिनी के ख़्वाब अंग अंग में छेड़ा इंक़लाब मुँह पर ओढ़नी जी कभी नहीं मैं तो आप से बोलती नहीं और फिर हया ज़िंदगी की मार मा'रिफ़त का बोझ जब्र-ओ-इख़्तियार एक जान और सैंकड़ों वबाल जिस्म की दुखन रूह का ख़याल ज़िंदगी बढ़ी रौशनी लिए रौशनी बढ़ी तीरगी लिए इंकिसार में इक ग़ुरूर सा कुछ ख़ुमार सा कुछ सुरूर सा दाएरे यहाँ दाएरे वहाँ रक़्स में नज़र रक़्स में जहाँ गुफ़्तुगू में बल ख़ामुशी में लोच रात करवटें करवटों में सोच दिल बुझा बुझा तिश्नगी की आँच अजनबी थकन ज़िंदगी की आँच उस के काम आएँ उस का दुख बटाएँ उस को छेड़ दें और मुस्कुराएँ उस की आँख में कितना दर्द है रंग ज़र्द है रूह ज़र्द है वो उदास है क्यूँँ उदास है उस की ज़िंदगी किस के पास है ये गुनाह क्यूँँ भूल क्यूँँ नहीं बाग़ में तमाम फूल क्यूँँ नहीं
Related Nazm
मैं रात उठूँ और अपने सारे पुराने यारों को फ़ोन कर के उन्हें जगाऊँ उन्हें जगाऊँ उन्हें बताऊँ कि यार तुम सब बदल गए हो बहुत ही आगे निकल गए हो जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली जो रातें तुम ने पसंद की हैं वो सख़्त काली हैं सख़्त काली ज़रा सा माज़ी बईद देखो हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ पे हम से अगर हमारा कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर निकालते थे हँसी की बातें, अजीब क़िस्से, अजीब सस्ते से जोक कह के किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे और आज आलम है ऐसा हम सब ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं हमारी लाइफ़ में कोई लड़की हमारी लाइफ़ बनी हुई है हमारी आँखों पे प्यार नामक सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे किसी का नंबर लगाऊँ कैसे मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ??
Shadab Javed
12 likes
"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
27 likes
"मुकम्मल इश्क़" मुकम्मल इश्क़ मेरा मेरे बा'द किसी ग़ैर का ना रहा सब सज्दे मुकम्मल हुए बस तेरा आना विफल रहा तेरी नुमाइश पसंद आँखों का बढ़ा यहाँ पहरा रहा तुझे हर नज़र से बचाने को मैं तेरे साथ ठहरा रहा तुझे स्याही मानकर मैं अपनी किताब लिखता रहा तुझे उस में पाकर मैं उसे ज़िंदगी भर पढ़ता रहा तुझे इन्हीं लफ़्ज़ों से ताज का मुमताज़ बनाता रहा अपनी हर कहानी में हीर से राँझे को दूर कराता रहा तू बस इंतिज़ार कर, मैं ख़ुद को यही समझाता रहा तू बस ठहराव निकली वक़्त का, जो गुज़र जाता रहा
Devansh gupta
6 likes
"ज़िंदगी'' ज़िंदगी एक लड़के का मन है जिसे बस अकेले ही बीरां के गुबंद के पीछे बने लॉन में रक़्स करती हुई और बिखरती हुई नीम के पेड़ की पत्तियाँ देखनी हैं ज़िंदगी एक बच्चे की ज़िद है जिसे कोई दुनिया नहीं सिर्फ़ फूलों पे बैठी हुई तितलियाँ देखनी हैं ज़िंदगी एक जोगन के पैरों के पड़ने पे निकली हुई ताल से मात खाता हुआ एक मृदंग है ज़िंदगी ज़िंदगी के नशे में ही डूबे हुए एक मुसव्विर की कूची से छिटका हुआ रंग है ज़िंदगी अपने महबूब को अपनी बाँहों में बे-ख़ौफ़ सोते हुए देखना है और उसे चूमने की ख़्वाहिश का दिल में न आना है ज़िंदगी इक नदी के किनारे पे चुप-चाप बैठे हुए दिन बिताना है ज़िंदगी ज़िंदा रहने का अच्छा बहाना है ज़िंदगी मेरे कमरे के बाहर बनी बाल्कनी में बदलते हुए मौसमों का मज़ा ले रही बिल्लियाँ हैं ज़िंदगी बार बार आईना देख कर ख़ुद पे मरती हुई अपनी तस्वीरें लेती हुई बावली लड़कियाँ हैं ज़िंदगी अपनी मस्ती में डूबी हुई गुनगुनाती हुई लकड़ियाँ बीनने दूर जाती हुई एक पहाड़न के गालों पे बिखरी हुई धूप है ग़ौर से देखने पर पता चलता है ज़िंदगी हर जगह हर दफ़ा अपना ख़ुद का ही बदला हुआ रूप है ये किताबों का दुनिया का लोगों का कोई गणित उस के बिल्कुल भी पल्ले नहीं पड़ रहा ज़िंदगी एक नाराज़ बच्चा है जो मार खाकर भी स्कूल बस में नहीं चढ़ रहा ज़िंदगी मेरा दिल है जो हर इक नए ज़ख़्म पर मुझ सेे बिल्कुल नई शा'इरी चाहता है ज़िंदगी शा'इरी से भी आगे का कुछ है जहाँ लिखने वाला लिखे इस सेे पहले कई रोज़ तक ख़ामुशी चाहता है ज़िंदगी से मैं ज़्यादा मिला तो नहीं पर मुझे इतनी पहचान है ज़िंदगी शाहजादी के झुमके नहीं उस की मुस्कान है ज़िंदगी मेरे सीने में बरसों से फैला बयाबान है ज़िंदगी अपनी सूरत में सब कुछ है लेकिन इस पे अब भी यही एक इल्ज़ाम है ज़िंदगी मौत का दूसरा नाम है ख़ैर अब मैं चलूँ मुझ को तन्हाइयों से बहुत काम है
Vikram Gaur Vairagi
5 likes
“मोहब्बत” न कोई फ़साना है न कोई कहानी है मेरी मैं कोई राजा तो नहीं,पर एक रानी है मेरी ज़्यादा लंबी नहीं एक मुख़्तसर सी कहानी है मेरी एक वो हसीना जिस में था रूह कब्ज़ करने का हुनर उस के क़ब्ज़े में हम आ गए बस यहीं परेशानी है मेरी फिर उस सेे आख़िर में हम को इश्क़ हो गया शायद यही हम से एक जु़र्म हो गया ये सब करने के बा'द बस एक तजुर्बा हाथ आया जो कहते हैं मोहब्बत में कुछ नहीं उन को देने के लिए एक जवाब हाथ आया भाव बढ़ जाते हैं इज़हार-ए-मोहब्बत से इन के ये तजुर्बा भी हम को ये काम करने के बा'द आया किसी दीवार पे लिखा था मोहब्बत जु़र्म है मैं ने उस को उतारा और फाड़ आया आख़िर मुझे इस सेे तजुर्बा जो हाथ आया
Shivang Tiwari
5 likes
More from Mahboob Khizan
ज़िंदगी को देखा है ज़िंदगी से भागे हैं रौशनी के आँचल में तीरगी के धागे हैं तीरगी के धागों में ख़ून की रवानी है दर्द है मोहब्बत है हुस्न है जवानी है हर तरफ़ वही अंधा खेल है अनासिर का तैरता चले साहिल डूबता चले दरिया चाँद हो तो काकुल की लहर और चढ़ती है रात और घटती है बात और बढ़ती है ये कशिश मगर क्या है रेशमी लकीरों में शाम कैसे होती है नाचते जज़ीरों में हर क़दम नई उलझन सौ तरह की ज़ंजीरें फ़लसफ़ों के वीराने दूसरों की जागीरें आँधियाँ उजालों की घन-गरज सियासत की काँपते हैं सय्यारे रात है क़यामत की जंग से जले दुनिया चाँद को चले पागल आँख पर गिरे बिजली कान में पड़े काजल दौर है परिंदों का छेड़ है सितारों से काएनात आजिज़ है हम गुनाहगारों से
Mahboob Khizan
0 likes
रात उस को ख़्वाब में देख कर मैं ने कुछ नहीं कहा चार साल की थकन जवाँ हुई तिश्नगी बढ़ के बे-कराँ हुई हाँ मगर जब आँसुओं की नर्म गर्म ताज़गी आस-पास दिलकशी बिखर गई और एक साया सा सिरहाने आ के थम गया मैं ने ये कहा कि ऐ मिरे ख़ुदा तू बड़ा रहीम है उस का दिल दो नीम है उस के रंग उस के हुस्न को निखार दे उस के दिल का बोझ उतार दे तू उसे सुकून दे मुझे जुनून दे उस के दुख उस के दर्द छीन ले उस के रोग मुझ को दे मैं गुनाहगार हूँ रात उस को ख़्वाब में देख कर चार साल जैसे फिर उसी तरह गुज़र गए चार साल किस तरह गुज़र गए दिल ये सोचता रहा मैं ने कुछ नहीं कहा
Mahboob Khizan
0 likes
किसी हँसती बोलती जीती-जागती चीज़ पर ये घमंड क्या ये गुमान क्यूँँ कहीं और आप की जान क्यूँँ ये तो सिलसिले हैं उसी फ़रेब-ए-ख़याल के ग़म ज़ात-ओ-ख़ैर-ओ-जमाल के वही फेर अहल-ए-सवाल के अजी ठीक है ये वफ़ा का ज़हर न घोलिए अरे आप झूट ही बोलिए नहीं सब के भेद न खोलिए कोई क्या करे न मिलें जो रंग ही रंग से डरो अपने जी की उमंग से कटे क्यूँँ निगाह पतंग से कभी बेकसी को पुकारते हैं शजर हजर मिरे पास कुछ भी नहीं मगर बड़ी ज़िंदगी है इधर-उधर ये सँभलते हाथों मैं काँपती है कमान क्यूँँ ये सरक रही है मचान क्यूँँ ये खिसक रहे हैं मकान क्यूँँ
Mahboob Khizan
0 likes
मैं सोचता हूँ कि इस ख़ैर-ओ-शर के बा'द है क्या फ़ज़ा तमाम नज़र है नज़र के बा'द है क्या शब इंतिज़ार-ए-सहर है सहर के बा'द है क्या दुआ बरा-ए-असर है असर के बा'द है क्या ये रहगुज़र है तो इस रहगुज़र के बा'द है क्या
Mahboob Khizan
0 likes
बे-कस चमेली फूले अकेली आहें भरे दिल-जली भूरी पहाड़ी ख़ाकी फ़सीलें धानी कभी साँवली जंगल में रस्ते रस्तों में पत्थर पत्थर पे नीलम-परी लहरीली सड़कें चलते मनाज़िर बिखरी हुई ज़िंदगी बादल चटानें मख़मल के पर्दे पर्दों पे लहरें पड़ीं काकुल पे काकुल ख़ेमों पे ख़े में सिलवट पे सिलवट हरी बस्ती में गंदी गलियों के ज़ीने लड़के धमा-चौकड़ी बरसे तो छागल ठहरे तो हलचल राहों में इक खलबली गिरते घरौंदे उठती उमंगें हाथों में गागर भरी कानों में बाले चाँदी के हाले पलकें घनी खुरदुरी हड्डी पे चेहरे चेहरों पे आँखें आई जवानी चली टीलों पे जौबन रेवड़ के रेवड़ खेतों पे झालर चढ़ी वादी में भीगे रोड़ों की पेटी चश्मों की चंपाकली साँचे नए और बातें पुरानी मिट्टी की जादूगरी
Mahboob Khizan
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Mahboob Khizan.
Similar Moods
More moods that pair well with Mahboob Khizan's nazm.







