ज़िंदगी को देखा है ज़िंदगी से भागे हैं रौशनी के आँचल में तीरगी के धागे हैं तीरगी के धागों में ख़ून की रवानी है दर्द है मोहब्बत है हुस्न है जवानी है हर तरफ़ वही अंधा खेल है अनासिर का तैरता चले साहिल डूबता चले दरिया चाँद हो तो काकुल की लहर और चढ़ती है रात और घटती है बात और बढ़ती है ये कशिश मगर क्या है रेशमी लकीरों में शाम कैसे होती है नाचते जज़ीरों में हर क़दम नई उलझन सौ तरह की ज़ंजीरें फ़लसफ़ों के वीराने दूसरों की जागीरें आँधियाँ उजालों की घन-गरज सियासत की काँपते हैं सय्यारे रात है क़यामत की जंग से जले दुनिया चाँद को चले पागल आँख पर गिरे बिजली कान में पड़े काजल दौर है परिंदों का छेड़ है सितारों से काएनात आजिज़ है हम गुनाहगारों से
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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किसी हँसती बोलती जीती-जागती चीज़ पर ये घमंड क्या ये गुमान क्यूँँ कहीं और आप की जान क्यूँँ ये तो सिलसिले हैं उसी फ़रेब-ए-ख़याल के ग़म ज़ात-ओ-ख़ैर-ओ-जमाल के वही फेर अहल-ए-सवाल के अजी ठीक है ये वफ़ा का ज़हर न घोलिए अरे आप झूट ही बोलिए नहीं सब के भेद न खोलिए कोई क्या करे न मिलें जो रंग ही रंग से डरो अपने जी की उमंग से कटे क्यूँँ निगाह पतंग से कभी बेकसी को पुकारते हैं शजर हजर मिरे पास कुछ भी नहीं मगर बड़ी ज़िंदगी है इधर-उधर ये सँभलते हाथों मैं काँपती है कमान क्यूँँ ये सरक रही है मचान क्यूँँ ये खिसक रहे हैं मकान क्यूँँ
Mahboob Khizan
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रात उस को ख़्वाब में देख कर मैं ने कुछ नहीं कहा चार साल की थकन जवाँ हुई तिश्नगी बढ़ के बे-कराँ हुई हाँ मगर जब आँसुओं की नर्म गर्म ताज़गी आस-पास दिलकशी बिखर गई और एक साया सा सिरहाने आ के थम गया मैं ने ये कहा कि ऐ मिरे ख़ुदा तू बड़ा रहीम है उस का दिल दो नीम है उस के रंग उस के हुस्न को निखार दे उस के दिल का बोझ उतार दे तू उसे सुकून दे मुझे जुनून दे उस के दुख उस के दर्द छीन ले उस के रोग मुझ को दे मैं गुनाहगार हूँ रात उस को ख़्वाब में देख कर चार साल जैसे फिर उसी तरह गुज़र गए चार साल किस तरह गुज़र गए दिल ये सोचता रहा मैं ने कुछ नहीं कहा
Mahboob Khizan
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वक़्त की बात है हर ग़ुंचा-ए-सर-बस्ता मगर वक़्त क्या चीज़ है पैमाना-ए-बे-साख़्ता है ये शब-ओ-रोज़ जवानी ये मह-ओ-साल रवाँ रूह क्यूँँ जिस्म के आगे सिपर-अंदाख़्ता है शाख़ दर शाख़ नज़र आती है जीने की उमंग चोर की तरह सरकती है रगों में कोई आग सोचने के लिए शायद ये मह-ओ-साल नहीं ऐ मिरे दीदा-ए-बे-ख़्वाब मोहब्बत से न भाग हुस्न की आग ग़नीमत है कि इस से पहले रग-ए-अय्याम थी इक जू-ए-फ़सुर्दा सर-ए-शाम सब इसी आग का ईंधन हैं गुज़रने वाले एक ही लर्ज़िश-ए-सद-ए-रंग का परतव है तमाम
Mahboob Khizan
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मैं सोचता हूँ कि इस ख़ैर-ओ-शर के बा'द है क्या फ़ज़ा तमाम नज़र है नज़र के बा'द है क्या शब इंतिज़ार-ए-सहर है सहर के बा'द है क्या दुआ बरा-ए-असर है असर के बा'द है क्या ये रहगुज़र है तो इस रहगुज़र के बा'द है क्या
Mahboob Khizan
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वो हसीन थी मह-ए-जबीन थी बे-गुमान थी बे-यक़ीन थी ज़िंदगी की नरम नरम आहटें बे-सबब यूँँही मुस्कुराहटें उँगलियों में बाल को लपेटना दामन-ए-ख़याल को लपेटना हर घड़ी वही मिलने वालियाँ बे-ख़यालियां ख़ुश-ख़यालियां नर्म उलझनें कम-सिनी के ख़्वाब अंग अंग में छेड़ा इंक़लाब मुँह पर ओढ़नी जी कभी नहीं मैं तो आप से बोलती नहीं और फिर हया ज़िंदगी की मार मा'रिफ़त का बोझ जब्र-ओ-इख़्तियार एक जान और सैंकड़ों वबाल जिस्म की दुखन रूह का ख़याल ज़िंदगी बढ़ी रौशनी लिए रौशनी बढ़ी तीरगी लिए इंकिसार में इक ग़ुरूर सा कुछ ख़ुमार सा कुछ सुरूर सा दाएरे यहाँ दाएरे वहाँ रक़्स में नज़र रक़्स में जहाँ गुफ़्तुगू में बल ख़ामुशी में लोच रात करवटें करवटों में सोच दिल बुझा बुझा तिश्नगी की आँच अजनबी थकन ज़िंदगी की आँच उस के काम आएँ उस का दुख बटाएँ उस को छेड़ दें और मुस्कुराएँ उस की आँख में कितना दर्द है रंग ज़र्द है रूह ज़र्द है वो उदास है क्यूँँ उदास है उस की ज़िंदगी किस के पास है ये गुनाह क्यूँँ भूल क्यूँँ नहीं बाग़ में तमाम फूल क्यूँँ नहीं
Mahboob Khizan
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