nazmKuch Alfaaz

वक़्त की बात है हर ग़ुंचा-ए-सर-बस्ता मगर वक़्त क्या चीज़ है पैमाना-ए-बे-साख़्ता है ये शब-ओ-रोज़ जवानी ये मह-ओ-साल रवाँ रूह क्यूँँ जिस्म के आगे सिपर-अंदाख़्ता है शाख़ दर शाख़ नज़र आती है जीने की उमंग चोर की तरह सरकती है रगों में कोई आग सोचने के लिए शायद ये मह-ओ-साल नहीं ऐ मिरे दीदा-ए-बे-ख़्वाब मोहब्बत से न भाग हुस्न की आग ग़नीमत है कि इस से पहले रग-ए-अय्याम थी इक जू-ए-फ़सुर्दा सर-ए-शाम सब इसी आग का ईंधन हैं गुज़रने वाले एक ही लर्ज़िश-ए-सद-ए-रंग का परतव है तमाम

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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किसी हँसती बोलती जीती-जागती चीज़ पर ये घमंड क्या ये गुमान क्यूँँ कहीं और आप की जान क्यूँँ ये तो सिलसिले हैं उसी फ़रेब-ए-ख़याल के ग़म ज़ात-ओ-ख़ैर-ओ-जमाल के वही फेर अहल-ए-सवाल के अजी ठीक है ये वफ़ा का ज़हर न घोलिए अरे आप झूट ही बोलिए नहीं सब के भेद न खोलिए कोई क्या करे न मिलें जो रंग ही रंग से डरो अपने जी की उमंग से कटे क्यूँँ निगाह पतंग से कभी बेकसी को पुकारते हैं शजर हजर मिरे पास कुछ भी नहीं मगर बड़ी ज़िंदगी है इधर-उधर ये सँभलते हाथों मैं काँपती है कमान क्यूँँ ये सरक रही है मचान क्यूँँ ये खिसक रहे हैं मकान क्यूँँ

Mahboob Khizan

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ज़िंदगी को देखा है ज़िंदगी से भागे हैं रौशनी के आँचल में तीरगी के धागे हैं तीरगी के धागों में ख़ून की रवानी है दर्द है मोहब्बत है हुस्न है जवानी है हर तरफ़ वही अंधा खेल है अनासिर का तैरता चले साहिल डूबता चले दरिया चाँद हो तो काकुल की लहर और चढ़ती है रात और घटती है बात और बढ़ती है ये कशिश मगर क्या है रेशमी लकीरों में शाम कैसे होती है नाचते जज़ीरों में हर क़दम नई उलझन सौ तरह की ज़ंजीरें फ़लसफ़ों के वीराने दूसरों की जागीरें आँधियाँ उजालों की घन-गरज सियासत की काँपते हैं सय्यारे रात है क़यामत की जंग से जले दुनिया चाँद को चले पागल आँख पर गिरे बिजली कान में पड़े काजल दौर है परिंदों का छेड़ है सितारों से काएनात आजिज़ है हम गुनाहगारों से

Mahboob Khizan

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वो हसीन थी मह-ए-जबीन थी बे-गुमान थी बे-यक़ीन थी ज़िंदगी की नरम नरम आहटें बे-सबब यूँँही मुस्कुराहटें उँगलियों में बाल को लपेटना दामन-ए-ख़याल को लपेटना हर घड़ी वही मिलने वालियाँ बे-ख़यालियां ख़ुश-ख़यालियां नर्म उलझनें कम-सिनी के ख़्वाब अंग अंग में छेड़ा इंक़लाब मुँह पर ओढ़नी जी कभी नहीं मैं तो आप से बोलती नहीं और फिर हया ज़िंदगी की मार मा'रिफ़त का बोझ जब्र-ओ-इख़्तियार एक जान और सैंकड़ों वबाल जिस्म की दुखन रूह का ख़याल ज़िंदगी बढ़ी रौशनी लिए रौशनी बढ़ी तीरगी लिए इंकिसार में इक ग़ुरूर सा कुछ ख़ुमार सा कुछ सुरूर सा दाएरे यहाँ दाएरे वहाँ रक़्स में नज़र रक़्स में जहाँ गुफ़्तुगू में बल ख़ामुशी में लोच रात करवटें करवटों में सोच दिल बुझा बुझा तिश्नगी की आँच अजनबी थकन ज़िंदगी की आँच उस के काम आएँ उस का दुख बटाएँ उस को छेड़ दें और मुस्कुराएँ उस की आँख में कितना दर्द है रंग ज़र्द है रूह ज़र्द है वो उदास है क्यूँँ उदास है उस की ज़िंदगी किस के पास है ये गुनाह क्यूँँ भूल क्यूँँ नहीं बाग़ में तमाम फूल क्यूँँ नहीं

Mahboob Khizan

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बे-कस चमेली फूले अकेली आहें भरे दिल-जली भूरी पहाड़ी ख़ाकी फ़सीलें धानी कभी साँवली जंगल में रस्ते रस्तों में पत्थर पत्थर पे नीलम-परी लहरीली सड़कें चलते मनाज़िर बिखरी हुई ज़िंदगी बादल चटानें मख़मल के पर्दे पर्दों पे लहरें पड़ीं काकुल पे काकुल ख़ेमों पे ख़े में सिलवट पे सिलवट हरी बस्ती में गंदी गलियों के ज़ीने लड़के धमा-चौकड़ी बरसे तो छागल ठहरे तो हलचल राहों में इक खलबली गिरते घरौंदे उठती उमंगें हाथों में गागर भरी कानों में बाले चाँदी के हाले पलकें घनी खुरदुरी हड्डी पे चेहरे चेहरों पे आँखें आई जवानी चली टीलों पे जौबन रेवड़ के रेवड़ खेतों पे झालर चढ़ी वादी में भीगे रोड़ों की पेटी चश्मों की चंपाकली साँचे नए और बातें पुरानी मिट्टी की जादूगरी

Mahboob Khizan

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रात उस को ख़्वाब में देख कर मैं ने कुछ नहीं कहा चार साल की थकन जवाँ हुई तिश्नगी बढ़ के बे-कराँ हुई हाँ मगर जब आँसुओं की नर्म गर्म ताज़गी आस-पास दिलकशी बिखर गई और एक साया सा सिरहाने आ के थम गया मैं ने ये कहा कि ऐ मिरे ख़ुदा तू बड़ा रहीम है उस का दिल दो नीम है उस के रंग उस के हुस्न को निखार दे उस के दिल का बोझ उतार दे तू उसे सुकून दे मुझे जुनून दे उस के दुख उस के दर्द छीन ले उस के रोग मुझ को दे मैं गुनाहगार हूँ रात उस को ख़्वाब में देख कर चार साल जैसे फिर उसी तरह गुज़र गए चार साल किस तरह गुज़र गए दिल ये सोचता रहा मैं ने कुछ नहीं कहा

Mahboob Khizan

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