nazmKuch Alfaaz

“मराहिल रुख़्सती के” ये चंचल नज़रों की अबरू ये मुसकाता रुख़ ये गेसू और इक बार मैं इनको देखूँ ये गिरवीदा सी रंगीं शब जुंबिश से लबरेज़ हुए लब इनको अब मैं रुख़्सत कर दूँ ज़ुल्मत में अश्कों की शिरकत नम आँखों की फीकी रंगत इन में अम्न की स्याही भर दूँ सहरा-ए-दिल में ये ख़राबा और उस में ये शोर-शराबा आज इस में ख़ामोशी कर दूँ ज़ख़्म हरा करते ये सारे दिल में कुछ बेचैन शरारे इन की आग बुझा कर रख दूँ ये बद-हाली बेबस नज़्में बुझते शो'ले सूनी बज़्में इक परवाने को मैं दे दूँ रंज-ओ-ग़म में डूबी रातें रूखी-रस्मी सी ये बातें बिल-आख़िर ख़ून इनका कर दूँ

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मैं मेरा कमरा और तन्हाई मैं हूँ मेरा कमरा है इक पसरी हुई तन्हाई है कुछ बिखरे से अस्बाब हैं धुॅंदली सी तेरी याद है इक टूटा हुआ आइना है टूटा हुआ मेरा दिल ढलते हुए शब की मेरी बुझती हुई परछाई है कुछ ख़्वाबों की लाशें हैं क़तरा-क़तरा मैं उन लाशों में कुछ दफ़्न किए कुछ जलाए सर्द सियह रातों में बिस्तर मेरा रोता है बेबस आँखों में आँसू मेरे जाएँ तो कहाँँ किस के काँधों पर कोई आंँचल नहीं जो इन्हें छुपाए या पी जाए किसी मय की तरह अब कोई नहीं कौन चाहेगा मुझे मेरी तरह इक क़ब्र ख़यालों का है भीतर मेरे ऐसा कोई हर दिन नई ऊंँचाई पर होता है मगर गहरा भी ख़ामोशी मेरी चीख़ती चिल्लाती है कुछ इस तरह जैसे कोई गूंँगा किसी अपने को पुकारे मगर सुन भी ले तो समझे न कोई उस की सदा जिस तरह कमरा मेरा आलम के मुंसिफ़ नज़रों के जैसा नहीं ये मेरी ख़मोशी को भी चाहता है मेरे ग़म को भी ये मुझ को न कोई भरम देता है न उम्मीद ही बातिल दुनिया की तरह कमरा मेरा सहरा नहीं दिल मेरा अकेला है गर तो क्या हुआ तन्हा नहीं

Tausif Raza

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"तुम से बे-पनाह मोहब्बत" मेरे नूर-ए-नज़र आ भी जा तू नज़र कब सुनाएगा मुझ को तू अच्छी ख़बर तेरा आशिक़ बेचारा परेशान है तुझ से नाराज़ है और हैरान है क़ासिद-ए-मोतबर ले जा मेरी ख़बर तेरी नज़रों से मिलती हैं ख़ामोशियाँ दिल में क्यूँ रखता है इतनी सरगोशियाँ खोल दे अब ज़बाँ ऐ मेरे हम सफ़र मेरे दिल की तमन्ना यहीं हैं सनम मैं रहूँ साथिया बन के सातों जनम बात हो जाए सच तू जो कह दे अगर टूट कर मेरा दिल ये बिखर जाएगा तू न होगा तो ''दानिश'' ये मर जाएगा सूख जाएगा ये ज़िंदगी का शजर

Danish Balliavi

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"शाइराना मिज़ाज" अबकि पास आए हो ख़ुश्बूओं के साए हो कल तलक तो मेरे थे आज तुम पराए हो उम्र भर की चाहत की रुख़्सती नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते सादगी से आओगे बे-रुखी से जाओगे मेरे पास आए हो किस का दिल दुखाओगे दिलजलों से जान-ए-जानाँ दिल-लगी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते ख़ार मुस्कुराए थे फूल मुँह बनाए थे मैं ने ख़्वाब बेंचा था मैं ने दिल उगाए थे मैं कि जैसे करता था आदमी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते बे-वफ़ाई आदत है बे-हयाई फ़ितरत है मेरे जैसे आशिक़ हैं आशिक़ी पे लानत है जानाँ मेरे जैसों से मुँह-लगी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते हुस्न पे लिबादा है दर्द भी कुशादा है ज़ेहन का तो फिर भी ठीक दिल नहीं अमादा है यूँँ पराई रौशनी से रौशनी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते ख़ार बोए जाएँगे ख़ाक अब उड़ाएँगे मैं ने तुम को चाहा था और अब भुलाएँगे तुम सेे बैर नहीं करते प्यार भी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते दिल से आगे जाना है पेट चुन के आना है हाथ जिस का थामा है उम्र भर निभाना है उम्र भर के साथी को यूँँ दुखी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते

Rakesh Mahadiuree

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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

Kaifi Azmi

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मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी मुझ को रातों की सियाही के सिवा कुछ न मिला मैं वो नग़्मा हूँ जिसे प्यार की महफ़िल न मिली वो मुसाफ़िर हूँ जिसे कोई भी मंज़िल न मिली ज़ख़्म पाए हैं बहारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी किसी गेसू किसी आंचल का सहारा भी नहीं रास्ते में कोई धुंदला सा सितारा भी नहीं मेरी नज़रों ने नज़ारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी दिल में नाकाम उमीदों के बसेरे पाए रौशनी लेने को निकला तो अंधेरे पाए रंग और नूर के धारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी मेरी राहों से जुदा हो गईं राहें उन की आज बदली नज़र आती हैं निगाहें उन की जिन से इस दिल ने सहारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी प्यार माँगा तो सिसकते हुए अरमान मिले चैन चाहा तो उमडते हुए तूफ़ान मिले डूबते दिल ने किनारों की तमन्ना की थी मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी

Sahir Ludhianvi

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"तदबीर" आजकल ज़िंदगी मुझे क्यूँँ ये आश्नाओं सी रास आती है रोज़ बाद-ए-सबा यहाँ कैसे ख़्वाब जैसे पयाम लाती है सुब्ह बुझते हुए सभी तारे इन दिनों हाल पूछ लेते हैं गर्म-चश्में कड़क सी सर्दी में किस तरह मुझ को खोज लेते हैं मेरी राहों के फूल-पत्ते ये सब मिरे साथ में टहलते हैं आज ऊँचे दरख़्त भी झुक कर छाँव मुझ को शदीद देते हैं वादियाँ और ये पहाड़ सभी गर्म-जोशी के साथ मिलते हैं चाँद-सूरज नए लिबासों में कुछ अदब से सलाम करते हैं काम सब भूल कर ये पंछी भी ख़ास नग़्में नुमायाँ करते हैं इत्तिफ़ाक़न नहीं मुझे तो ये सब तिरे इंतिज़ाम लगते हैं

kapil verma

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"आसमानी क़र्ज़" अंबर तुम इतने आला हो लेकिन तुम भी हमारे जैसे बे-हद क़र्ज़ में क्यूँँ जीते हो धरती से न मिलो हरगिज़ तुम पर ख़ासी यारी रखते हो उस की बेहद दौलत पर क्यूँँ आँख गड़ाए तुम रहते हो अब ये तुम ही जानो कैसे ये इफ़रात उधारी ले कर तुम बुनते हो तारे उन सेे दो-शाला अपना सीते हो सुनते आए हैं बचपन से सदियों से ऐसा करते हो अच्छा वो सब ठीक है लेकिन अंबर बस इतना बतला दो धरती का ये क़र्ज़ चुकाने की परवाह कभी करते हो

kapil verma

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"तसलसुल" इस अनजान सफ़र में डर है दूर बहुत निकल आया हूँ मैं दूर भी इतना मैं ने होश-ओ-हवा से की हद तक पार की है जाते लम्हों वाली ट्रेन में देखूँ जब गुम-सुम से बैठे ख़ुद को तो दौड़ लगा कर खिड़की से ही ढाढस की इक चाय के साथ काग़ज़ पर लिख कर कुछ नज़्में दे आता हूँ अक्सर ख़ुद को वैसे ट्रेन की इस बोगी में कुछ बुत जैसे लगने वाले लोग भी बैठे रहते हैं इनसे जब पूछो कि कहाँ तक पहुँचे हैं तो भी कुछ न बताते हैं ये बड़े अजीब से हैं ये सब लोग वो तो छोड़ो गाहे-गाहे लोग ये जाने क्यूँँ इक दम से शक्ल तुम्हारी ले लेते हैं एक अजब सी राह में हूँ मैं अब तो समझने की कोशिश भी छोड़ चुका हूँ इतना सा ही समझ आता है दूर बहुत निकल आया हूँ मैं दूर भी इतना ज़ेहन से गुम ये हो जाता है ट्रेन भला है कौन सी आख़िर ट्रेन ख़्यालों वाली है ये ख़्वाबों की है या लम्हों की ख़ैर मुझे परवाह नहीं है जो भी हो मैं ने तो बस इतना ही जाना है इक दिन सरपट धुआँ सा इन साँसों का भरती हुई ये ट्रेन यकायक रुक जाएगी जैसे बे-मतलब ही किसी ने इस की चैन को खींच दिया हो उस दिन से पहले तुम आना हवा का झोंका सा बनकर और तब मेरी ये नींद उड़ाकर ट्रेन तुम्हारे लम्हों की है जो उस में अपने साथ बिठा लेना दरअस्ल ऐसा है मुझ को इस अनजान सफ़र में डर है दूर बहुत निकल आया हूँ मैं दूर भी इतना मैं ने होश-ओ-हवा से की हद तक पार की है

kapil verma

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'फ़ुर्सत' अलसायी सी दुपहरी में फ़िक्रों की तेज़ धूप से बचकर बेफ़िक्री की छाँव में जब तुम बैठोगे थोड़ी देर तब सुनना अपने अंदर गुज़रे सालों से छनकर नज़्म सी इक बन कर बचपन के घर तुम सेे ये पूछेंगे- यार कहाँ गुम थे इतने दिन से मिले नहीं तुम शायद ये बोलोगे यारों दूर बहुत पड़ते हो एक जगह फ़ुर्सत में कहीं बैठा हूँ तब जा कर मैं अब तुम तक आ पाया हूँ।

kapil verma

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"सैर अजायबघर की" ये इक इंसानी फ़ितरत है जब तक वो नाम न दे कोई शय को उस का तब तक कोई संजीदा शय मानेगा न उसे नाम नहीं तो जैसे कुछ हस्ती ही नहीं तो सोचा ये क्यूँ न मैं अपनी हस्ती को कोई नाम अता करने का काम करूँ मिरे ख़याल में तो ये नाम अजायबघर अच्छा होगा शायद सारी इंसानियत का तो मैं क्या बोलूँ कम से कम मैं मेरी ज़ात के डेरों का इक मज्मूआ सा हूँ वो इस लिए ही क्यूँँकि मैं जब भी किसी मक़ाम पे इक अपने से बिछड़ा तो फिर इक हिस्सा मेरा वही पे क़ैद हुआ अपने के इंतिज़ार में या उस के साथ जैसे अजायबघर की चौकी हो कोई उन डेरों में मैं दरबान सा हर पास आते साए में बिछड़े शख़्स को खोजा करता हूँ हर दम ये सोच कर के शायद इस में वो मिल जाए वैसे मेरी इक दरख़्वास्त थी तुम सेे ये गर तुम भी मुझ सेे मिलने आते हो तो क्या तुम उन चौकियों को अपने साथ समेट ले आओगे या कम से कम उन को देख ही आना तुम ऐसा है गर उन चौकियों से पार नहीं गुजरे तो तुम मुझ सेे नहीं मिले हो बल्कि मेरे नाम के इक पैकर से मिले हो फिर ख़ैर ये भी है मुझ सेे मिल के क्या होगा जो तुम भी बिछड़े तो इस मजमूए में शामिल हो कर रह जाओगे अपनी चौकी में आराम से रहना फिर क्या है ना कि नए सब अपनों में अक्सर ख़ूब तलाशे तुम जाओगे

kapil verma

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