“मेरा गुनाह” तूफ़ान ने भी मुझ को ही इल्ज़ाम दिया कमज़ोर दरख़्त था इस लिए गिर गया अभी तो मैं पूरा सूखा भी नहीं था कि लोगों ने शाख़ों को काट लिया जिन्हें राह में मैं ने छाया दी और फल दिए बारिश से बचाया और भीगने नहीं दिया वो घर उठा ले गए मुझे अर्थी की तरह उन्होंने भी मुझ पर कोई तरस नहीं किया शाम को अँगीठी में ठूँसा और आग दिखाई ख़ुद को ठंड से बचाने को मुझे जला दिया फिर भी उन की नज़रों में मैं ने गुनाह किया कि गिरने के बा'द कोई फल नहीं दिया
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए
Abrar Kashif
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"मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं" मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं मेरे पेच खुल चुके हैं मेरे ख़म बिगड़ रहे हैं कहीं चुपके चुपके चुपके मेरी बात चल रही है कहीं कुछ अज़ीज़ मेरे, मेरे पावँ पड़ रहे हैं मेरा काम कर चुका है, मेरा ख़्वाब मर चुका है मेरी ख़ुश्क ख़ुश्क आँखों में सराब गड़ रहे हैं मेरी पसलियाँ चटक कर मेरे मुँह को आ गई हैं ग़म-ए-तिश्नगी के मारे मेरे दाँत झड़ रहे हैं मेरी आस्तीं फटी है मुझे चोट लग रही है मेरी धज्जियाँ उड़ी हैं, मेरे तार उधड़ रहे हैं मेरे ख़ून की सफ़ेदी तुम्हें क्या बता रही है ये मुझे जता रही है, मेरे ज़ख़्म सड़ रहे हैें मेरे सर पे चढ़ के अब तक वही ख़ौफ़ नाचता है कि तू कब का जा चुका है कि तू कब का जा चुका है
Ammar Iqbal
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चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया जिस ने हिजाज़ियों से दश्त-ए-अरब छुड़ाया मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है यूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया था सारे जहाँ को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया था मिट्टी को जिस की हक़ ने ज़र का असर दिया था तुर्कों का जिस ने दामन हीरों से भर दिया था मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमाँ से फिर ताब दे के जिस ने चमकाए कहकशाँ से वहदत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकाँ से मीर-ए-अरब को आई ठंडी हवा जहाँ से मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है बंदे कलीम जिस के पर्बत जहाँ के सीना नूह-ए-नबी का आ कर ठहरा जहाँ सफ़ीना रिफ़अत है जिस ज़मीं की बाम-ए-फ़लक का ज़ीना जन्नत की ज़िंदगी है जिस की फ़ज़ा में जीना मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
Allama Iqbal
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"कभी वक़्त था" कभी वक़्त था देखा था उसे शर्माते हुए अपने आँचल को मेरे हाथों से बचाते हुए अकेले मिलने पर मुझ को रिझाते हुए मेरे हाथों से अपनी उँगलियाँ छुआते हुए सुनसान जगह पर ख़ुद को पीछे हटाते हुए जानी पहचानी जगह पर शोख़ी बढ़ाते हुए वो दौर था ख़ुश थे एक दूजे को सताते हुए और थक जाते थे नाराज़ को मनाते हुए प्यार है या नहीं डरते थे ये बताते हुए क़रीब रहते थे अपने अरमाँ जगाते हुए वही वक़्त फिर से चाहता है 'अर्जुन' बाँहों में ले-ले वो मुझ पे हक़ जताते हुए
arjun chamoli
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आप के लिए कभी हँसता था खिल-खिल कर कभी थी ज़िंदगी मेरी ये मजबूरी ये रुस्वाई ये बर्बादी हुई मेरी मैं अपने आप में अब तन्हा पहचाने हैं अनजाने घुटन के साथ अब है ये सिमटती ज़िंदगी मेरी गुनाहों की सज़ा होती तो सह लेता ख़ुशी से मैं ख़ता के बिन जहन्नम सी है नज़्म-ए-ज़िंदगी मेरी मुझे क्या इल्म था इल्ज़ाम झूठा भी लगाते हैं जलन दुनिया की इतनी क़त्ल कर दी शख़्सियत मेरी न घुटकर मौत आती है न घुटकर कोई जी सकता मुझे महसूस होता है ये ज़िंदा लाश है मेरी कभी दुश्मन नहीं थे सब कभी थी दोस्ती सब से न कोई दोस्त लगता अब न कोई दुश्मनी मेरी मेरे दिल में न कुछ बाक़ी जो अब भी टूट सकता हो ये टुकड़े जी रहे क्यूँँ-कर हैं हैरानी बढ़ी मेरी मुझे नफ़रत हुई ख़ुदस मैं क्यूँ कमज़ोर हूँ इतना मैं ख़ुद आया तेरे दर पे या क़िस्मत लाई है मेरी बहुत कुछ कह नहीं पाता बहुत कुछ कह भी जाता हूँ समझ में जो नहीं आए वो बस तस्लीम है मेरी तुझे आग़ाज़ करना है तुझे अंजाम है देना मिले मंज़िल नहीं मुझ को तो ये तक़दीर है मेरी मुझे मंज़ूर है मिटना मुझे मंज़ूर मरना पर मुझे जीने की ख़ातिर चाहिए आवारगी मेरी तू उतरी आसमाँ से है यहाँ धरती पे आई है फ़रिश्ता लग रही है तू ज़रूरत बन गई मेरी चलो ये बात छोड़ें अब चलो वो बात करते हैं कि ख़ुशबू बन के फैले कामयाबी की महक तेरी
arjun chamoli
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"महबूब की एक झलक" रूह में उतर गई शक्ल उस की जब नज़र उठाई तरफ़ उस की रेशमी लिबास में ज़ीनत थी वो दूध की तरह थी कमर उस की कान पर झूलती उस की बाली चूमती जाती थी गर्दन उस की तन से लिपटी ख़म भरी साड़ी दिखाती थी सुंदर कटि उस की आँखों की बनावट बादाम जैसी पूरे शबाब पर थी नज़र उस की गोरे रंग के बीच गले का ख़म कह रहा था चू में नर्मी उस की ज़िस्म की गढ़न थी यूँँ ढली मूरत आरज़ू हो कोई संग-तराश उस की हाथ थे बुतों की तरह तराशे हुए मक्खन जैसी फिसलन उस की बालों की लंबी लटकन छूती जाती कमर उस की पैरों ने पाई थी सीधी गठन केले के पेड़ सी उपमा उस की खिंचता हुआ उठा सीना था कसी हुई थी कमान उस की खिलते लब भरे-भरे से थे शहद से भरी पंखुड़ी उस की फूल की तरह का परी-चेहरा उजले रंग में सूरत उस की और क्या मिसाल दें हम 'अर्जुन' आफ़ताब जैसी झलक उस की
arjun chamoli
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"छोटी सी मुलाक़ात" हम बचपन में खेलते हुए यूँँ जवाँ हो गए अरमाँ बिना कहे ही सब बयाँ हो गए बचपन में खेलते थे जो छुपने का खेल हम चाहते थे न ढूँढ़ पाए कोई छुपते थे ऐसे हम एक दिन पता चला कि हारा नहीं है कोई ढूँढा तो एक ने था पकड़े गए थे हम साँसें तो छू रही थी चुप चुप खड़े थे हम माना कि धड़कनों को रोके रहे थे हम दिल ने न मानी बात पसीने से नहा गए धड़कन थी इतनी तेज़ डरने लगे थे हम ऐसी मुलाक़ात कभी महसूस न की थी दोनों ने कभी ऐसी कोई बात न की थी ख़फ़ा हूँ ज़िन्दगी से वो वक़्त बीत क्यूँ गया उस के गुज़र जाने की कोई बात न की थी उस के गुज़र जाने की कोई बात न की थी
arjun chamoli
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"वो आँसू जो तेरे क़दम पे गिराए" वो आँसू जो तेरे क़दम पे गिराए थे पूजा में अर्पण तुझी को चढ़ाए वो आँसू जो तेरे क़दम पे गिराए थे पूजा में अर्पण तुझी को चढ़ाए मैं बेबस नहीं हूँ मुझे ये पता है तिरे आगे कमज़ोर दिल बन ये जाए मोहब्बत को तरसा हूँ मैं ज़िन्दगी में कहानी भरी दुख की कैसे सुनाए मैं जीकर भी जीवन में हर पल मरा हूँ मिरी लाश को कोई कैसे जिलाए सुकूँ से भरा कोई दिन गर मिले तो तिरा साथ हो और दुनिया भुलाए तुझे पूजना चाहता है मिरा दिल बुझे दिल से 'अर्जुन' दिया क्या जलाए वो आँसू जो तेरे क़दम पे गिराए थे पूजा में अर्पण तुझी को चढ़ाए
arjun chamoli
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