बाहर एक आवाज़ है तमाम आवाज़ों से मुख़्तलिफ़ फ़ज़ा की मुर्दा शिरयानों में एक ताज़ा सच्चाई भर देने वाली आवाज़ बे-हिस मकानों मंडलाती हुई मेरे दरवाज़े पर दस्तक देती हुई कभी मद्धम कभी तेज़ एक बेचैन दस्तक मुझ से कुछ कहना चाहती है मुझ तक पहुँचाना चाहती है थोड़े ही फ़ासले पर खड़े एक मौसम की बात शायद मेरी ही कोई बात लेकिन मैं दरवाज़े तक कैसे जाऊँ उसे कैसे खोलूँ बाहर खड़े मौसम को अंदर कैसे लाऊँ मैं तो अर्सा हुआ अपने हाथ पाँव ब-तौर-ए-ज़मानत रख चुका हूँ किस जुर्म में किस के पास रख चुका हूँ बिल्कुल भूल चुका हूँ
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"ज़िंदगी'' ज़िंदगी एक लड़के का मन है जिसे बस अकेले ही बीरां के गुबंद के पीछे बने लॉन में रक़्स करती हुई और बिखरती हुई नीम के पेड़ की पत्तियाँ देखनी हैं ज़िंदगी एक बच्चे की ज़िद है जिसे कोई दुनिया नहीं सिर्फ़ फूलों पे बैठी हुई तितलियाँ देखनी हैं ज़िंदगी एक जोगन के पैरों के पड़ने पे निकली हुई ताल से मात खाता हुआ एक मृदंग है ज़िंदगी ज़िंदगी के नशे में ही डूबे हुए एक मुसव्विर की कूची से छिटका हुआ रंग है ज़िंदगी अपने महबूब को अपनी बाँहों में बे-ख़ौफ़ सोते हुए देखना है और उसे चूमने की ख़्वाहिश का दिल में न आना है ज़िंदगी इक नदी के किनारे पे चुप-चाप बैठे हुए दिन बिताना है ज़िंदगी ज़िंदा रहने का अच्छा बहाना है ज़िंदगी मेरे कमरे के बाहर बनी बाल्कनी में बदलते हुए मौसमों का मज़ा ले रही बिल्लियाँ हैं ज़िंदगी बार बार आईना देख कर ख़ुद पे मरती हुई अपनी तस्वीरें लेती हुई बावली लड़कियाँ हैं ज़िंदगी अपनी मस्ती में डूबी हुई गुनगुनाती हुई लकड़ियाँ बीनने दूर जाती हुई एक पहाड़न के गालों पे बिखरी हुई धूप है ग़ौर से देखने पर पता चलता है ज़िंदगी हर जगह हर दफ़ा अपना ख़ुद का ही बदला हुआ रूप है ये किताबों का दुनिया का लोगों का कोई गणित उस के बिल्कुल भी पल्ले नहीं पड़ रहा ज़िंदगी एक नाराज़ बच्चा है जो मार खाकर भी स्कूल बस में नहीं चढ़ रहा ज़िंदगी मेरा दिल है जो हर इक नए ज़ख़्म पर मुझ सेे बिल्कुल नई शा'इरी चाहता है ज़िंदगी शा'इरी से भी आगे का कुछ है जहाँ लिखने वाला लिखे इस सेे पहले कई रोज़ तक ख़ामुशी चाहता है ज़िंदगी से मैं ज़्यादा मिला तो नहीं पर मुझे इतनी पहचान है ज़िंदगी शाहजादी के झुमके नहीं उस की मुस्कान है ज़िंदगी मेरे सीने में बरसों से फैला बयाबान है ज़िंदगी अपनी सूरत में सब कुछ है लेकिन इस पे अब भी यही एक इल्ज़ाम है ज़िंदगी मौत का दूसरा नाम है ख़ैर अब मैं चलूँ मुझ को तन्हाइयों से बहुत काम है
Vikram Gaur Vairagi
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'हार नहीं मैं मानूँगा' महफ़िल हो तन्हाई हो कैसी भी रुसवाई हो या दुनिया हरजाई हो कोई क़यामत आई हो अंगारों में पलना हो या काँटों पर चलना हो पैरों में ज़ंजीर हो या चाहे जुदा तक़दीर हो या पीछे मुड़ के न देखूँगा पथ पर अपने निकलूँगा हार नहीं मैं मानूँगा चाहे ग़म के मेले हों या घनघोर अँधेरे हों तूफ़ाँ हो या बिजली हो चाहे रात घनेरी हो चाहे दुनिया बैरी हो कोई भी मजबूरी हो चाहे बिजली गरजती हो तूफ़ानों की बारिश हो चाहे सूना आँगन हो अच्छा बुरा अब जो भी हो काम न कल पर टालूँगा मंजिल पर ही दम लूँगा हार नहीं मैं मानूँगा चाहे भाला ले कर आ तन पर ख़ंजर भी दौड़ा या राहों में गिरा कर जा जो चाहे वो कर के जा दुश्मन मेरी जान बने या घर कब्रिस्तान बने मौत मिरी मेहमान बने रोटी मेरी छीन ले तू पानी मेरा छीन ले तू मेरी भूख भी छीन ले तू मेरी प्यास भी छीन ले तू मेरा चैन भी छीन ले तू मेरी जान भी छीन ले तू मेरी नींद भी छीन ले तू हँसी-ख़ुशी सब दे दूँगा भूखे प्यासे रह लूँगा लेकिन पथ पर निकलूँगा हार नहीं मैं मानूँगा दुश्मन या घर वाले हों या फिर बाहर वाले हों राह में खाई खुदवाओ या शोलों पर चलवाओ चाहे आग में तड़पाओ चाहे कारावास मिले या मुझ को बन-बास मिले रूखी सूखी चटनी हो या ज़ेल का काला पानी हो चाहे आग के शो'ले हों चाहे दर्द की ज़ेलें हों थोड़ी देर को हँस लूँगा थोड़ी देर को रो लूँगा राज़ी ख़ुशी सब ले लूँगा लेकिन पथ पर निकलूँगा हार नहीं मैं मानूँगा सूली पर चढ़वा देना या काँटों पर चलवा लेना कितना भी तड़पा लेना तन पर कपड़े हों या न हों चाहे दुनिया हँसती हो पाँव में चप्पल हो या न हो या फिर पाँव में छाले हों कैसी भी अब हालत हो चाहे कोई गाली दे चाहे ज़हर की प्याली दे मैं चुप-चाप ही ले लूँगा मैं हर हाल में जी लूँगा लेकिन पथ पर निकलूँगा हार नहीं मैं मानूँगा मेरे जैसे जितने हैं बूढ़े हैं या बच्चे हैं बैरी हैं या अच्छे हैं साथ सभी को ले लूँगा हाथ में हाथ पकड़ लूँगा दर्द सभी के झेलूँगा साथ उन्हीं के हँस लूँगा साथ उन्हीं के रो लूँगा लेकिन पथ पर निकलूँगा हार नहीं मैं मानूँगा तेरी आस अधूरी हो चाहे प्यास अधूरी हो चाहे साँस अधूरी हो या रिश्तो में दूरी हो दुश्मन अब भगवान बने या कोई इंसान बने या कोई शैतान बने कोई मरे या कोई जिए चाहे ग़म का ज़हर पिए मुझ को नहीं है मतलब अब कितने भी जाल अब लगवाओ कितने भी शो'ले बरसाओ मुझ को काँटों पर ले जाओ कितने भी अब ज़ुल्म कराओ जान पे अपनी खेलूँगा मंज़िल पर ही दम लूँगा दुनिया को मैं जीतूँगा हार नहीं मैं मानूँगा
Prashant Kumar
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"बाबा" तेरे कमरे से जो आती थी हमेशा बाबा वो आवाज़ पुकारती नहीं मुझ को बाबा तेरे काँधों पर बैठ कर जो देखे थे कभी वो मेले लगते हैं अब सूने विरान बाबा ये ज़माने की निगाहें सौदागर है वहशी है ये नोच खाएगी जिस्मों को हमारे बाबा तू घर में हमारे माली-ए-गुलशन था हम तो तेरे आँगन की कली थे बाबा तेरे काँधों पर आख़िरी वक़्त रोना था हमें तेरे साए में इस घर से विदा होना था बाबा तेरी ही निशानी है तुझ सा दिखता भी है भाई भी कब बेटियों सा समझता है बाबा तू जो गया माँ के चेहरे की रंगत भी ले गया वो भी उदास है बहुत कम बोलती है बाबा दिल से अब बस यही दुआ निकलती है हमें तुम मुस्कुराते मिलो जन्नत में बाबा
ALI ZUHRI
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"नसरी नज़्म" नस्र अब्बा नज़्म अमाँ दोनों को इनकार है ये जो नसरी नज़्म है ये किस की पैदा-वार है सिर्फ़ लफ्फ़ाज़ी पे मब्नी है ये तजरीदी कलाम जिस में अन्क़ा हैं मआ'नी लफ़्ज़ पर्दा-दार है नस्र है गर नस्र तो वो नज़्म हो सकती नहीं नज़्म जो हो नस्र की मानिंद वो बे-कार है क़ाफ़िए की कोई पाबंदी न है क़ैद-ए-रदीफ़ बे-दर-ओ-दीवार का ये घर भी क्या पुरकार है बहरस आज़ाद क़ैद-ए-वज़न से है बे-नियाज़ वाह क्या मदर पिदर आज़ाद ये दिलदार है मर्तबे में 'मीर' ओ 'मोमिन' से है हर कोई बुलंद इन में हर बे-बहर ग़ालिब से बड़ा फ़नकार है जिस के चमचे जितने ज़्यादा हों वो उतना ही अज़ीम आज कल मिसरा उठाना एक कारोबार है दाद सिर्फ़ अपनों को देते हैं गिरोह-अंदर-गिरोह उन के टोले से जो बाहर हो गया मुरदार है बन गया उस्ताद-ओ-अल्लामा यहाँ हर बे-शुऊर कोर-चश्म अहल-ए-नज़र होने का दावेदार है शा'इरी जुज़-शाइरी है है ज़रा मेहनत-तलब और मेहनत ही वो शय है जिस से उन को आर है पाप-म्यूज़िक के लिए मौज़ूँ है नसरी शा'इरी हर रिवायत से बग़ावत की ये दावेदार है तब्अ-ए-मौज़ूँ गर न बख़्शी हो ख़ुदा ने आप को शा'इरी क्यूँँ कीजे आख़िर क्या ख़ुदा की मार है दाद देना ऐसी नज़्मों को बड़ी बे-दाद है जो न समझा और कहे समझा बड़ा मक्कार है
Aasi Rizvi
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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बड़ी मुश्किलों से दर्द-ए-ज़ेह में मुब्तला चुप ने एक आवाज़ को जनम दिया मैं ने उसे गोद ले लिया पाल-पोस कर बड़ा किया और उस की ज़बान पर एक लफ़्ज़ रखा मगर वो गूँगी निकली मैं ने मायूसी में उसे क़त्ल कर दिया और पकड़ा गया लाश ठिकाने लगाते वक़्त मुझ पर मुक़द्दमा चला क़त्ल के इल्ज़ाम में मगर मुझे फाँसी की सज़ा हुई एक लफ़्ज़ किसी ज़बान पर रखने के जुर्म में
Javed Shaheen
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बीवी मुझ से कहती है सारा दिन लेटे रहने और नज़्में लिखने से घर कैसे चलेगा नज़्में रोटियाँ तो नहीं कि बच्चों का पेट भर सकें तुम तो अपना पेट शाएरी की तलवार से काट कर मुस्तक़बिल की खूँटी से लटका चुके हो लेकिन हमारे पेट इतने शाइराना नहीं सोचता हूँ बीवी ठीक कहती है नज़्में तो ग़ैब से उतर आती हैं लेकिन रोटियाँ ग़ैब के तन्नूर में नहीं पकतीं वैसे भी शाएरी को ज़िंदा रखने के लिए पेट पर रोटी बाँधनी ज़रूरी है लेकिन मैं उसे दरख़्वास्त करूँँगा वो मुझे एक नज़्म और लिख लेने दे आख़िरी नज़्म जिस में आने वाली कल के लिए कोई ता'रीफ़ नहीं होगी जिस में गुज़र जाने वाली कल के लिए कोई पछतावा नहीं होगा जिस में आज के किसी दुख का मातम नहीं होगा हर लिहाज़ से मुकम्मल नज़्म
Javed Shaheen
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हवा मेरी बात नहीं समझती हवा तुम्हारी बात नहीं समझती हवा हम दोनों से हमारी बात नहीं करती हमारे लफ़्ज़ उस की समा'अत से फिसल जाते हैं वो बे-म'अनी आँखों से हमें देखती रहती है मैं उन का हाल कैसे जानूँ उन्हें अपना हाल कैसे बताऊँ जिन के घर वीरान हैं जिन की सुब्हें रंग से ख़ाली और रातें चाँदनी से महरूम हैं जिन की खिड़कियों पर भारी पर्दे पड़े हैं और दरवाज़ों पर ताले लेकिन हवा ये बातें नहीं समझती वो तो ख़ाली हाथ आती जाती है और ख़ाली हाथ आने और ख़ाली हाथ जाने वालों से हमें क्या लेना
Javed Shaheen
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एक रौशनी बे-हद शफ़्फ़ाफ़ बीमार रौशनियों के बोझ-तले दबी हुई रिहाई की कोशिश में मसरूफ़ उम्मीद के ज़ीने पर खड़ी मुझे देखती है मेरी तरफ़ सरकती है अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाती है लेकिन फिसल कर अँधेरों में गिर जाती है अंधी रौशनी मेरे मफ़्लूज हाथ देखने से मा'ज़ूर रौशनी
Javed Shaheen
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अगर सर्दियों की किसी रात को कोई भूका गदागर मिरे घर पे आवाज़ दे उस को रोटी का टुकड़ा न दूँगा झुलसती हुई सख़्त दोपहर में कोई बे-कस मुसाफ़िर कहीं प्यास से गिर पड़े उस को पानी का क़तरा न दूँगा मिरा कोई हम-साया मुल्क-ए-अदम को सिधारे तो उस के जनाज़े को कंधा न दूँगा किसी ने मिरी बे-हिसी का सबब मुझ से पूछा तो उस से कहूँगा मिरे शहर में जिस क़दर नेकियाँ थीं वो इक शख़्स की बे-वफ़ाई पे रो कर कहीं आसमानों में गुम हो गई हैं
Javed Shaheen
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