नज़्म: मोहब्बत मोहब्बत में कोई लड़का मोहब्बत में कोई लड़की कभी जब मुब्तला होते तो अपनों से जुदा होते जो हासिल हो तो पागलपन जो ला-हासिल तो पागलपन मोहब्बत में अज़िय्यत है मुझे इस सेे शिकायत है मोहब्बत शख़्सियत है जो बहुत ख़ुदगर्ज़ होती है बहुत कमज़र्फ़ होती है भुला देती है दुनिया को बसा लेती नई दुनिया मोहब्बत मैं नहीं करता मोहब्बत का मुख़ालिफ़ हूँ मैं डरता हूँ मोहब्बत से मोहब्बत दर्द देती है मोहब्बत जान लेती है मोहब्बत बेवकूफ़ी है
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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"हमीं से मोहब्बत नहीं की गई" हमारी यूँँ ही ज़िन्दगी ली गई हमीं से मोहब्बत नहीं की गई हमीं से हमेशा क़रीबी रही हमीं से मोहब्बत नहीं की गई हमीं उन के चक्कर में रुसवा हुए हमीं से मोहब्बत नहीं की गई हमीं से मोहब्बत का वा'दा हुआ हमीं से मोहब्बत नहीं की गई हमीं ने मोहब्बत का नारा दिया हमीं से मोहब्बत नहीं की गई कभी आशिक़ों के मसीहा थे हम हमीं से मोहब्बत नहीं की गई हमीं ने सभी से मोहब्बत किया हमीं से मोहब्बत नहीं की गई
S M Afzal Imam
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वो लड़की याद आती है बला की ख़ूब-सूरत थी वो चलती फिरती मूरत थी मिरे दिल की ज़रूरत थी वो लड़की याद आती है सलीक़े से ज़रा शहरी समुंदर सी मगर गहरी नज़र मेरी जहाँ ठहरी वो लड़की याद आती है कि जिस बिन दिल नहीं बहले ज़बाँ के बिन भी सब कह ले जिसे देखा बहुत पहले वो लड़की याद आती है बहुत फ़ुर्सत से देखा था बहुत उलफ़त से देखा था बड़ी शिद्दत से देखा था वो लड़की याद आती है बहकते दिन हसीं रातें सभी दिलकश मुलाक़ातें वो उस की बे-सबब बातें वो लड़की याद आती है जब उस का नाम सुनता हूँ जब उस के ख़्वाब बुनता हूँ सुनहरे लम्हें चुनता हूँ वो लड़की याद आती है
S M Afzal Imam
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"तुम्हारी याद" तुम्हारी याद आते ही दिल को थाम लेता हूँ तुम्हें ही याद करता हूँ तुम्हारा नाम लेता हूँ तुम्हारी याद लाती है तबस्सुम मेरे चेहरे पर ख़यालों में संवरता हूँ निकल आते सुनहरे पर तुम्हारा याद आना ज़िन्दगी दुश्वार होना है तुम्हारी याद खो जाना मेरा बीमार होना है तुम्हारी याद आती है तो सब कुछ भूल जाता हूँ मैं जब कुछ भूल जाता हूँ तुम्हारी याद आती है तुम्हारी याद आती है तो आँखें बंद करता हूँ मैं आँखें बंद करता हूँ तुम्हारी याद आती है तुम्हारी याद आने से तुम्हारी याद जाने तक जो वक़्फा भी गुजऱता है तुम्हारी याद आती है
S M Afzal Imam
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"वो जितनी ख़ूब-सूरत है" वो जितनी ख़ूब-सूरत है उसे क्यूँँकर ज़रूरत है के ज़ुल्फ़ों को सँवारे वो के आदत को सुधारे वो लगाए सुर्ख़ी होंटों पर हो फ़िल्टर जैसे फो़टो पर के ख़ुद को बारहा देखे के घण्टों आइना देखे वो जितनी ख़ूब-सूरत है उसे क्यूँँंकर ज़रूरत है के लहजा नर्म हो उस का शराफ़त धर्म हो उस का के होंटों को ज़रा भींचे नज़र अपनी रखे नीचे कोई वा'दा निभाये वो किसी से दिल लगाए वो वो जितनी ख़ूब-सूरत है उसे क्यूँँंँकर ज़रूरत है
S M Afzal Imam
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