nazmKuch Alfaaz

"हमीं से मोहब्बत नहीं की गई" हमारी यूँँ ही ज़िन्दगी ली गई हमीं से मोहब्बत नहीं की गई हमीं से हमेशा क़रीबी रही हमीं से मोहब्बत नहीं की गई हमीं उन के चक्कर में रुसवा हुए हमीं से मोहब्बत नहीं की गई हमीं से मोहब्बत का वा'दा हुआ हमीं से मोहब्बत नहीं की गई हमीं ने मोहब्बत का नारा दिया हमीं से मोहब्बत नहीं की गई कभी आशिक़ों के मसीहा थे हम हमीं से मोहब्बत नहीं की गई हमीं ने सभी से मोहब्बत किया हमीं से मोहब्बत नहीं की गई

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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वो लड़की याद आती है बला की ख़ूब-सूरत थी वो चलती फिरती मूरत थी मिरे दिल की ज़रूरत थी वो लड़की याद आती है सलीक़े से ज़रा शहरी समुंदर सी मगर गहरी नज़र मेरी जहाँ ठहरी वो लड़की याद आती है कि जिस बिन दिल नहीं बहले ज़बाँ के बिन भी सब कह ले जिसे देखा बहुत पहले वो लड़की याद आती है बहुत फ़ुर्सत से देखा था बहुत उलफ़त से देखा था बड़ी शिद्दत से देखा था वो लड़की याद आती है बहकते दिन हसीं रातें सभी दिलकश मुलाक़ातें वो उस की बे-सबब बातें वो लड़की याद आती है जब उस का नाम सुनता हूँ जब उस के ख़्वाब बुनता हूँ सुनहरे लम्हें चुनता हूँ वो लड़की याद आती है

S M Afzal Imam

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नज़्म: मोहब्बत मोहब्बत में कोई लड़का मोहब्बत में कोई लड़की कभी जब मुब्तला होते तो अपनों से जुदा होते जो हासिल हो तो पागलपन जो ला-हासिल तो पागलपन मोहब्बत में अज़िय्यत है मुझे इस सेे शिकायत है मोहब्बत शख़्सियत है जो बहुत ख़ुदगर्ज़ होती है बहुत कमज़र्फ़ होती है भुला देती है दुनिया को बसा लेती नई दुनिया मोहब्बत मैं नहीं करता मोहब्बत का मुख़ालिफ़ हूँ मैं डरता हूँ मोहब्बत से मोहब्बत दर्द देती है मोहब्बत जान लेती है मोहब्बत बेवकूफ़ी है

S M Afzal Imam

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"वो जितनी ख़ूब-सूरत है" वो जितनी ख़ूब-सूरत है उसे क्यूँँकर ज़रूरत है के ज़ुल्फ़ों को सँवारे वो के आदत को सुधारे वो लगाए सुर्ख़ी होंटों पर हो फ़िल्टर जैसे फो़टो पर के ख़ुद को बारहा देखे के घण्टों आइना देखे वो जितनी ख़ूब-सूरत है उसे क्यूँँंकर ज़रूरत है के लहजा नर्म हो उस का शराफ़त धर्म हो उस का के होंटों को ज़रा भींचे नज़र अपनी रखे नीचे कोई वा'दा निभाये वो किसी से दिल लगाए वो वो जितनी ख़ूब-सूरत है उसे क्यूँँंँकर ज़रूरत है

S M Afzal Imam

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"तुम्हारी याद" तुम्हारी याद आते ही दिल को थाम लेता हूँ तुम्हें ही याद करता हूँ तुम्हारा नाम लेता हूँ तुम्हारी याद लाती है तबस्सुम मेरे चेहरे पर ख़यालों में संवरता हूँ निकल आते सुनहरे पर तुम्हारा याद आना ज़िन्दगी दुश्वार होना है तुम्हारी याद खो जाना मेरा बीमार होना है तुम्हारी याद आती है तो सब कुछ भूल जाता हूँ मैं जब कुछ भूल जाता हूँ तुम्हारी याद आती है तुम्हारी याद आती है तो आँखें बंद करता हूँ मैं आँखें बंद करता हूँ तुम्हारी याद आती है तुम्हारी याद आने से तुम्हारी याद जाने तक जो वक़्फा भी गुजऱता है तुम्हारी याद आती है

S M Afzal Imam

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