नाक़ूस से ग़रज़ है न मतलब अज़ाँ से है मुझ को अगर है इश्क़ तो हिन्दोस्ताँ से है तहज़ीब-ए-हिन्द का नहीं चश्मा अगर अज़ल ये मौज-ए-रंग-रंग फिर आई कहाँ से है ज़र्रे में गर तड़प है तो इस अर्ज़-ए-पाक से सूरज में रौशनी है तो इस आसमाँ से है है इस के दम से गर्मी-ए-हंगामा-ए-जहाँ मग़रिब की सारी रौनक़ इसी इक दुकाँ से है
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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जब वो मुझ को कहती थी एक शे'र सुनाओ उस के उपरी लब को चूम के हट जाता था उस के ज़ेहन में क्या आता था? तैश में आ कर कहती थी - “शे'र मुकम्मल कौन करेगा? सानी मिसरा कौन पढ़ेगा?”
Zubair Ali Tabish
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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प्रयाग में मिली है जमुना से आ के गंगा पिघला हुआ ये नीलम बहता हुआ वो हीरा इन की जुदाइयों ने खींचा है नक़्श-ए-जौज़ा इन की रवानियाँ हैं शान-ए-ख़ुदा-एयकता संगम की सीढ़ियों पर मोती लुढ़क रहा है
Zafar Ali Khan
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ज़िंदा-बाश ऐ इंक़लाब ऐ शोला-ए-फ़ानूस-ए-हिन्द गर्मियाँ जिस की फ़रोग़-ए-मंक़ल-ए-जाँ हो गईं बस्तियों पर छा रही थीं मौत की ख़ामोशियाँ तू ने सूर अपना जो फूँका महशरिस्ताँ हो गईं जितनी बूँदें थीं शहीदान-ए-वतन के ख़ून की क़स्र-आज़ादी की आराइश का सामाँ हो गईं मर्हबा ऐ नौ-गिरफ़्तारान-ए-बेदाद-ए-फ़रंग जिन की ज़ंजीरें ख़रोश-अफ़ज़ा-ए-ज़िंदाँ हो गईं ज़िंदगी उन की है दीन उन का है दुनिया उन की है जिन की जानें क़ौम की इज़्ज़त पे क़ुर्बां हो गईं
Zafar Ali Khan
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अश्नान करने घर से चले लाला-लाल-चंद और आगे आगे लाला के उन की बहू गई पूछा जो मैं ने लाला लल्लाइन कहाँ गईं नीची नज़र से कहने लगे वो भी चू गई मैं ने दिया जवाब उन्हें अज़-रह-ए-मज़ाक़ क्या वो भी कोई छत थी कि बारिश से चू गई कहने लगे कि आप भी हैं मस्ख़रे अजब अब तक भी आप से न तमस्ख़ुर की ख़ू गई चू होशियार पर मैं नदी से है ये मुराद बीबी तमीज़ भी हैं वहीं करने वुज़ू गई मैं ने कहा कि चू से अगर है मुराद जू फिर यूँँ कहो कि ता-ब-लब-ए-आब-जू गई क्यूँँ ऐंठें हैं माश के आटे की तरह आप धोती से आप की नहीं हल्दी की बू गई लुत्फ़-ए-ज़बाँ से क्या हो सरोकार आप को दामन को आप के नहीं तहज़ीब छू गई हिन्दी ने आ के जीम कूचे से बदल दिया चू आई कोहसार से गुलशन से जू गई लहजा हुआ दुरुश्त ज़बाँ हो गई करख़्त लुत्फ़-ए-कलाम-ओ-शिस्तगी-ए-गुफ़्तुगू गई मा'नी को है गिला कि हुआ बे-हिजाब मैं शिकवा है लफ़्ज़ को कि मिरी आबरू गई अफ़्सोस मुल्क में न रही फ़ारसी की क़द्र मस्ती उड़ी शराब से फूलों की बू गई
Zafar Ali Khan
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बारहा देखा है तू ने आसमाँ का इंक़लाब खोल आँख और देख अब हिन्दोस्ताँ का इंक़लाब मग़रिब ओ मशरिक़ नज़र आने लगे ज़ेर-ओ-ज़बर इंक़लाब-ए-हिन्द है सारे जहाँ का इंक़लाब कर रहा है क़स्र-आज़ादी की बुनियाद उस्तुवार फ़ितरत-ए-तिफ़्ल-ओ-ज़न-ओ-पीर-ओ-जवाँ का इंक़लाब सब्र वाले छा रहे हैं जब्र की अक़्लीम पर हो गया फ़र्सूदा शमशीर-ओ-सिनाँ का इंक़लाब
Zafar Ali Khan
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ऐ नुक्ता-वरान-ए-सुख़न-आरा-ओ-सुख़न-संज ऐ नग़्मा-गिरान-ए-चमनिस्तान-ए-मआफ़ी माना कि दिल-अफ़रोज़ है अफ़्साना-ए-अज़रा माना कि दिल-आवेज़ है सलमा की कहानी माना कि अगर छेड़ हसीनों से चली जाए कट जाएगा इस मश्ग़ले में अहद-ए-जवानी गरमाएगा ये हमहमा अफ़्सुर्दा दिलों को बढ़ जाएगी दरिया-ए-तबीअत की रवानी माना कि हैं आप अपने ज़माने के 'नज़ीरी' माना कि हर इक आप में है उर्फ़ी-ए-सानी माना की हदीस-ए-ख़त-ओ-रुख़्सार के आगे बेकार है मश्शाइयों की फ़ल्सफ़ा-दानी माना कि यही ज़ुल्फ़ ओ ख़त-ओ-ख़ाल की रूदाद है माया-ए-गुल-कारी-ए-ऐवान-ए-मआफ़ी लेकिन कभी इस बात को भी आप ने सोचा ये आप की तक़्वीम है सदियों की पुरानी माशूक़ नए बज़्म नई रंग नया है पैदा नए ख़ा में हुए हैं और नए 'मानी' मिज़्गाँ की सिनाँ के एवज़ अब सुनती है महफ़िल काँटों की कथा बरहना-पाई की ज़बानी लज़्ज़त वो कहाँ लाल-ए-लब-ए-यार में है आज जो दे रही है पेट के भूखों की कहानी बदला है ज़माना तो बदलिए रविश अपनी जो क़ौम है बेदार ये है उस की निशानी ऐ हम-नफ़सो याद रहे ख़ूब ये तुम को बस्ती नई मशरिक़ में हमीं को है बसानी
Zafar Ali Khan
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