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“नए बरस के पहले पहले” हम ने अबकी सोच रखा है नए बरस के पहले पहले अपने दिल का लाश कहीं पर दफ़ना देंगे या फिर इस को समझा देंगे जाहिल अपनी हद में रह कर इश्क़ किया कर सही ग़लत सब देख लिया कर वरना प्यारे इस दुनिया के लोग बहुत बेग़ैरत हैं तुझ को क़दम क़दम पे तोड़ेंगे बर्बाद करेंगे ये तुझ को फिर तूँ तन्हा यहाँ वहाँ भटकेगा धक-धक धड़केगा इस सेे बेहतर नए साल से इश्क़ विश्क़ के पागलपन से दूर रहेंगे काम करेंगे। हम ने अबकी सोच रखा है नए बरस में नाम करेंगे

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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तमाम रात सितारों से बात रहती थी कि सुब्ह होते ही घर से फूल आते थे वो किस के नक़्श उभरते थे तेग़ पर अपनी वो किस ख़याल में हम जंग जीत जाते थे हमें भी क़हत में एक चश्म-ए-ज़र मुयस्सर थी कोई हथेलियाँ भर-भर के मय पिलाता था भरा हुआ था समुंदर इन्हीं ख़जानों से निकाल लेते थे जो ख़्वाब रास आता था वो मेरे साथ रहा करता ख़ुशदिली से बहुत कि उन दिनों मेरा दुनिया पर हाथ पड़ता था हमारी जेब भरी रहती दास्तानों से हमें ख़याल का जंगल भी साथ पड़ता था वो सारे दिन का थका ख़्वाब-गाह में आता थपक थपक के सुलाता तो हाथ सो जाते नसीम-ए-सुब्ह किसी लहर में जगाती हमें और उठते उठते हमें दिन के एक हो जाते सरों से खेंच लिया वक़्त ने वफ़ा का लिहाफ़ वो पर्दे उठ गए जो तायनात रहते थे बिछड़ गया है वो संगीन मौसमों में कहीं वो मेरे दिल पर सदा जिस के हाथ रहते थे वो बू-ए-गुल हमें जिस गुलिस्ताँ में लाई थी वहाँ भी जा के उस का निशान देख लिया ये शाख़-ए-वस्ल दुबारा हरी नहीं होती हवा-ए-हिज्र ने मेरा मकान देख लिया वो अब्र जिस की तग-ओ-दौ में जिस्म सूख गए दुबारा छत पे है और छत पे सीढ़ी जाती है ठहर ठहर के उस सम्त ऐसे बढ़ रहा हूँ कि जैसे हामला औरत कदम उठाती है ये ज़हर बादा-ए-इशरत है और दे मेरे रब वो फिर चला गया मैं फिर ज़मीन चाटूँगा मैं फिर से हाथ में तेशा उठाए सोचता हूँ मैं कोहकन वही ख़ुश-ख़त पहाड़ काटूँगा बदन की बर्फ़ पिघलने के बा'द पूछेंगे बहुत पता है तहम्मुल के साथ बहते हो अज़ल के हाथ पे खेंची हुई समय की लकीर किसी से पहले मिटी है जो मुझ सेे कहते हो

Tehzeeb Hafi

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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"भूल जाऊँगा?" मोहब्बत के सारे सितम भूल जाऊँगा? बे-असर से ज़ख़्मों के मरहम भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे के तुझ को मैं मेरे सनम भूल जाऊँगा तेरा लहरों सा चलना ज़ेहन में बसा है उन आँखों की कैसे शरम भूल जाऊँगा? चलो ना होश रहा के शुरुआत कैसे हुई कैसे कब हुआ मैं ख़तम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे तेरी पायल का शोर जैसे शहनाई कोई जो पाक़ लगे वो क़दम भूल जाऊँगा? वो सादग़ी तेरी जो नज़रें तक ना मिलीं हँसकर सह गया जो मैं ग़म भूल जाऊँगा? माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे हम जुदा नहीं बस फ़ासले दौरानियाँ हैं तुझे याद कर हर जनम भूल जाऊँगा? प्यार मिलता नहीं जीते जी ये सुना है मैं बेहोशी में ये भरम भूल जाऊँगा माना टूटा हूँ पर तू ने सोचा भी कैसे

Rohit tewatia 'Ishq'

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"सौदाई" अजब दिल है न जीता है न मरता है न सीने में ठहरता है न बाहर ही निकलता है अजब जाँ है तरसती है कि तू आए झिझकती है कि तू आए तो ना-मालूम क्या होगा परेशाँ है कि दुनिया क्या कहेगी पशेमाँ है कि अपने बा-हमी रिश्ते में वो दम है न वो ख़म है मगर फिर भी बिलखती है कि तन्हाई ने ऐसा मार रक्खा है न तू आई तो मेरा क्या बनेगा अजब तू है न अपनों में न ग़ैरों में न ग़म-अंदोज़ ख़ल्वत में न जाँ-अफ़रोज़ जल्वत में मुझे डर है कि तुझ सेे मेल होगा तो कहाँ होगा किसी सर-सब्ज़ वादी में के इस वीरान कुटिया में इसी दुनिया में या फिर सरहदों के पार उक़्बा में अजब मैं हूँ मुफ़क्किर भी मुहक़्क़िक़ भी मुसन्निफ़ भी मगर अफ़सोस आशिक़ भी गया-गुज़रा सा शाइ'र भी बईद-अज़-अक़्ल भी और रस्म-ए-दुनिया से भी बे-गाना जो अनजाने में तुझ सेे ढेर सारा प्यार कर बैठा ब-हर-सूरत अगर कुछ वाक़िया है तो फ़क़त ये है मिरा दिल तुझ पे शैदा है मिरी जाँ तुझ पे वारी है मगर फिर भी ये हसरत है कि कोई मरहम-ए-दिल दिल को समझाए कोई गिरवीदा-ए-जाँ जाँ को बतलाए कि तू इक पैकर-ए-दिलकश नहीं है एक नागन है जो अपनों ही को डसने के लिए बेताब रहती है ये सब कुछ जान कर भी मैं तिरे इन गेसुओं के पेच-ओ-ख़म का सिर-फिरा क़ैदी तड़पता रहता हूँ मैं इस लिए शायद के तू आए तू आ कर मुझ को पहले की तरह दोबारा डस जाए

Dharmesh bashar

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आह-ओ-फ़ुग़ाँ - किसी से बिछड़ने का मातम मनाने का मौका मिलेगा तभी तो ये शाइ'र ग़ज़ल कह सकेगा वगरना मुझे क्या बदन ही बदन हैं यहाँ शे'र पढ़ दूँ वहाँ वाह सुन लूँ इधर साथ छोड़ूँ उधर हाथ थामूँ पुरानी ग़ज़ल में नए शे'र जोड़ूँ कहीं दिल लगा लूँ कहीं दिल को तोड़ूँ मुझे क्या मुझे तो जिए जाना है बस मुहब्बत मुहब्बत किए जाना है बस मगर मेरे लोगों ज़रा ये तो सोचो मुहब्बत की मारी ये नस्लें तुम्हारी बिछड़ने के दुख से निकल भी सकेंगी अगर लड़खड़ाईं सँभल भी सकेंगी भला किस के लिक्खे ग़ज़ल पढ़ के इनको लगेगा कि आह-ओ-फ़ुग़ाँ और भी है

Gaurav Singh

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“औरत” दुनिया क्या है इक औरत है फिर ये धरती गोद है उस की चाँद सितारे उस के साथी आसमान फिर घर हो शायद बारिश क्या है उस के आँसू पतझड़ क्या है उस के दुख हैं झीलें क्या हैं दिल है शायद पानी क्या है उस की ममता फसलें पौधे औलादें हैं फूल-परिन्दें ये भी शायद तेज हवाएँ बहनें होंगी हम सब क्या हैं बुरा वक़्त हैं बुरा वक़्त हैं टल जाएँगे फिर ये औरत बच जाएगी

Gaurav Singh

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